संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 जून : बंगाल में डॉक्टरी-हड़ताल, राज्य और बाकी देश को भी बहुत सोचने की जरूरत...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 जून : बंगाल में डॉक्टरी-हड़ताल, राज्य और बाकी देश को भी बहुत सोचने की जरूरत...
Date : 15-Jun-2019

पश्चिम बंगाल में तनाव और झगड़े थमने का नाम ही नहीं लेते हैं। कभी ऐसा लगता है कि बात इतनी बड़ी तो नहीं थी, तो ऐसे में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने निहायत गैरजरूरी हमलावर तेवरों के सार्वजनिक प्रदर्शन से बनती हुई बात को बिगाडऩे के लिए ओवरटाईम करती दिखती हैं, और नतीजा वैसा ही होता है जैसा कि अभी डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर हो रहा है। कोलकाता के सरकारी अस्पताल में एक मरीज के घरवालों ने डॉक्टरों को पीट दिया, और इस पर तुरंत ही डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। इस नौबत को देश भर में कई जगहों पर देखा जाता है, और सरकार गुनहगारों पर तुरंत कड़ी कार्रवाई करके, या डॉक्टरों की हिफाजत का इंतजाम करके मामले को सुलझाने की कोशिश करती है। लेकिन बंगाल में ममता बैनर्जी अस्पताल पहुंची तो वहां भी उनके गुस्सैल मिजाज ने बात को और बिगाड़ दिया, और अब डॉक्टर उनके दफ्तर जाकर बात करने को भी तैयार नहीं हैं, वे उनसे अस्पताल आकर अपनी चेतावनी वापिस लेने की बात कर रहे हैं। सैकड़ों डॉक्टरों ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, और कोलकाता के समर्थन में बाकी प्रदेश, और बाकी देश के डॉक्टर भी आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन के आज 5वें दिन इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एक और तनातनी खड़ी हो गई है, और ममता बैनर्जी राज्य के भीतर इस टकराहट को भाजपा की साम्प्रदायिक साजिश का नतीजा करार दे रही है। 

इस ताजा हालात के दो अलग-अलग पहलू हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि सरकारी हो या गैरसरकारी, अस्पतालों में किसी मरीज के इलाज को लेकर शिकायत, नाराजगी, और तोहमत के बाद मरीज के साथ के लोगों की तोडफ़ोड़ और मारपीट बहुत अनोखी बात नहीं है। कई बार ऐसा होता है, और छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले ऐसे ही तेवरों का हौसला पस्त करने के लिए राज्य सरकार ने एक कानून बनाकर ऐसे हमलावरों के लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम किया था जो कि आज भी लागू है। यह बात समझ में आती है कि अस्पतालों की कहीं पर लापरवाही भी होती होगी, कहीं पर भ्रष्टाचार भी होगा, कुछ जगहों पर हादसे भी होते होंगे, लेकिन इनमें से किसी भी बात की सजा अस्पताल के गलियारे में हिंसा से नहीं दी जा सकती। अगर बंगाली की राजधानी के सरकारी अस्पताल में ऐसा हुआ, और मुख्यमंत्री ने इसके बाद की हड़ताल में सीधे दखल देना तय किया, तो वे किसी समझौता-वार्ता के लिए एक बेहतर व्यक्ति नहीं हैं। उनका मिजाज ही उन्हें किसी भी समझौता-वार्ता से दूर रखने की सलाह देता है। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री की मौके पर पहुंचकर सीधी दखल, गुस्से से भरी चेतावनी, हड़ताल के खिलाफ साजिश के आरोप, इन सबसे एक बात साबित होती है कि उनकी सरकार में अधिकारों और जिम्मेदारियों का विकेन्द्रीकरण नहीं है, और वहां पर जो हैं वह वे खुद ही हैं। नतीजा यह है कि अगर वे नाकामयाब हो जाती हैं, तो उसके बाद कुछ बचता नहीं है। यह नौबत किसी प्रदेश या सरकार के लिए अच्छी नहीं है कि अंतिम फैसला लेने वाले को शुरुआती दौर में ही टकराव में हिस्सेदार बना दिया जाए। 

दूसरी बात यह कि डॉक्टरी का काम समाज के दूसरे पेशों से अलग किस्म का है, और पुलिस, फायरब्रिगेड, के अलावा डॉक्टरी ही एक ऐसा काम है जिसके बिना किसी नाजुक मौके पर एक पल भी काम नहीं चल सकता। इसलिए रात-बिरात हर वक्त तनाव में पहुंचने वाले मरीज के साथियों से डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को बचाने का पुख्ता इंतजाम कानून बनाकर, और सुरक्षा व्यवस्था लागू करके किया जाना चाहिए। यह तो ठीक है कि आज सुरक्षा कैमरे लगे होने से बहुत से सुबूत दर्ज हो जाते हैं, लेकिन हिंसा के खतरे के बीच न डॉक्टर काम कर सकते, न अस्पताल के दूसरे कर्मचारी। इसलिए सुरक्षा को अस्पतालों, खासकर सरकारी अस्पतालों, के इंतजाम का एक जरूरी हिस्सा मानकर चलना चाहिए। महंगे निजी अस्पताल तो सुरक्षा कर्मचारियों का इंतजाम कर लेते हैं, लेकिन सरकारी अस्पताल अक्सर बेसहारा साबित होते हैं। पिछले एक दिन में देश भर में डॉक्टरों की हड़ताल के चलते अनगिनत मौतें हुई होंगी जो कि हड़ताल के साथ जुड़कर दर्ज नहीं हुई होंगी। ऐसी नौबत दुबारा आनी नहीं चाहिए, इसके लिए राज्यों के मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के मुकाबले अधिक समझदार साबित हों तो बेहतर होगा। अपने राज्य की अस्पताली हड़ताल के लिए किसी राजनीतिक दल या केन्द्र सरकार पर तोहमत लगाने के बजाय ममता बैनर्जी को अपना घर सुधारना चाहिए जो कि बुरी तरह अराजकता और बदइंतजामी का शिकार दिख रहा है। एक-एक कर बहुत से मामलों में अगर बंगाल में यही हाल बढ़ते चले गया, तो ममता की साख पूरी तरह चौपट हो जाएगी। आज हालत यह है कि बिहार में हर दिन दर्जन के हिसाब से बच्चों की मौत हो रही है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खलनायक की तरह नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ देश भर में अस्पतालों में जिसको जो दिक्कत डॉक्टरों की हड़ताल से हो रही है, वे लोग ममता को ही खलनायिका मान रहे हैं। 
-सुनील कुमार

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