संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 17 जून : लोकसभा शुरू, विपक्ष के  सामने कठिन चुनौती और अपार संभावनाएं भी मौजूद
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 17 जून : लोकसभा शुरू, विपक्ष के सामने कठिन चुनौती और अपार संभावनाएं भी मौजूद
Date : 17-Jun-2019

नई लोकसभा आज से शुरू हुई तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक किस्म से विपक्ष को हिम्मत बंधाते हुए कहा कि वे संख्या में चाहे कम हों, वे लोगों के मुद्दे तो उठा ही सकते हैं, और उन्होंने विपक्ष से यह उम्मीद और अपील भी की कि वे जनता के हित के मुद्दों पर सरकार का साथ भी दें। अब पिछले आम चुनाव के बाद इस बार के आम चुनाव में भी मोदी से लगातार दूसरी बार हारने के बाद कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियां सदमे से उबरने के दौर में दिख रही हैं। आज संसद शुरू हो चुकी है लेकिन एनडीएविरोधी पार्टियों ने अब तक अपनी कोई बैठक नहीं की है, और न ही कांग्रेस अपने संसदीय दल का कोई नेता चुन सकी है। बीच में एक सुगबुगाहट हुई थी कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होने वाले शरद पवार अपनी पार्टी सहित कांग्रेस में वापिस आ सकते हैं, और उससे कांग्रेस को शायद लोकसभा में विपक्षी दल बनने के लिए जरूरी सांसद जुट जाएंगे, लेकिन फिर वह बात भी आई-गई हो गई। 

लोकसभा को देखें, तो विपक्ष के नेता का संसदीय दर्जा कई मायनों में काम का रहता है, और देश के कई संवैधानिक पदों पर, कई नाजुक संस्थानों के मुखिया चुनने के लिए संविधान में विपक्ष के नेता को कमेटी में रखने की शर्त भी है। ऐसी जगहों पर तो कांग्रेस या बाकी विपक्ष का एक नुकसान रह सकता है, लेकिन सदन की रोज की कार्रवाई अगर देखें, तो उसे लेकर किसी को हीनभावना में नहीं आना चाहिए, निराश नहीं होना चाहिए, और हथियार डालकर बैठ नहीं जाना चाहिए। आम चुनाव में मोदी को चुनौती देने वाले राहुल गांधी एक सीट से हारने के बाद भी दूसरी सीट से संसद पहुंच चुके हैं, और उन्हें वहां पर मुद्दे उठाने से लेकर मोदी को गले लगाने तक के कई मौके हासिल रहेंगे। कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस और डीएमके दो ऐसी बड़ी पार्टियां संसद में हैं जिनके सदस्य काफी संख्या में हैं। इसके अलावा देश के तकरीबन हर बड़े प्रदेश से एनडीएविरोधी कोई न कोई सांसद लोकसभा पहुंचे हैं, और दिल्ली जैसे जिस राज्य से कोई गैरभाजपाई सांसद लोकसभा में नहीं है, वहां के मुद्दों को भी दूसरी पार्टियां अखबार और टीवी से भी जान सकती हैं, और उन राज्यों में अपने विधायकों के मार्फत भी उन मुद्दों को लगातार जान सकती हैं जो किसी सांसद के मार्फत पता लगते। 

विपक्ष को यह याद रखने की जरूरत है कि 1984 में लोकसभा में भाजपा के कुल दो सांसद थे, मतलब यह कि देश के नक्शे का अधिकतर हिस्सा तो भाजपा के सांसदों के छूने का भी नहीं था। लेकिन वहां से बढ़ते हुए यह पार्टी पिछली सदी के आखिर में ही संसद में बहुमत का गठबंधन बनाकर केन्द्र सरकार बना चुकी थी। कुल डेढ़ दशक के भीतर बीजेपी ने यह पहाड़ की ऊंची चढ़ाई पूरी की थी। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि एनडीए और भाजपा के खिलाफ अगले पांच-दस बरस में कोई ऐसा गठबंधन न बन सके जो कि सत्ता पर आ सके। लेकिन सत्ता से परे भी एक दूसरी बात यह है कि संसदीय लोकतंत्र में सत्ता में आना जितना महत्वपूर्ण होता है, विपक्ष में रहना भी लोकतंत्र के लिहाज से तो उतना ही महत्वपूर्ण रहता है, फिर चाहे विपक्ष में साधन-सुविधा और कमाई उतनी न हो। ऐसे ताजा इतिहास को देखते हुए, और संभावनाओं को देखते हुए, और आज की लोकतांत्रिक-संसदीय जिम्मेदारी को देखते हुए विपक्ष के दलों को, उनके सांसदों को अपनी जिम्मेदारी और अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए। विपक्ष की पार्टियों को देखें, तो उनके हारे हुए सांसद भी अपने-अपने इलाकों के मुद्दों, और देश-विदेश के मुद्दों के जानकार रहे हैं, और वे संसद के बाहर से भी अपने सांसदों को मुद्दे दे सकते हैं, उनके लिए लगातार अध्ययन कर सकते हैं। सांसद या विधायक किसी भी पार्टी के व्यापक संगठन का एक हिस्सा ही रहते हैं, उनसे परे भी पार्टी संगठन के और बहुत से हिस्से रहते हैं जो कि संसद के लायक मुद्दों को उठाकर अपने या किसी दूसरे सहयोगी दल के सांसद को दे भी सकते हैं। 

आज जो दल विपक्ष में हैं, उनके ऊपर लोकतंत्र को मजबूत करने की एक बड़ी जिम्मेदारी है, और यह जिम्मेदारी जनता के प्रति है। जनता ने उन्हें सत्ता के लायक नहीं चुना लेकिन संसद में तो चुना है। इसलिए सरकार की गलतियों और गलत कामों पर संसद में आवाज उठाने की एक बड़ी जिम्मेदारी सामने है। और सरकार पर हमले से परे भी यह सोचने-समझने की जरूरत है कि विपक्ष सरकार को एक नई दिशा देने का काम भी कर सकता है। हिन्दुस्तान की इसी लोकसभा में ऐसे बहुत से दिग्गज और महान विपक्षी नेता रहे हैं जिनको सुनने के लिए प्रधानमंत्री सहित पूरी की पूरी सरकार डटी रहती थी, और जिनको सुनने के लिए संसद के दूसरे सदन के सदस्य भी आकर दीर्घा में बैठते थे। ऐसे लोग अपने वक्त और अपनी पार्टी से परे भी देश और दुनिया का ख्याल रखते हुए बड़ी महान सोच सामने रखते थे, जिसकी संभावना आज पूरी की पूरी खत्म नहीं हुई है। आज संसद में अपराधों से जुड़े हुए संभावित-मुजरिम अधिक हैं, लेकिन उनके बीच भी कुछ ऐसे लोग जरूर हैं जो कहने को खड़े होंगे, तो उनकी बात तमाम लोग सुनेंगे। 

संसद इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है, और जनता को उतनी उम्मीद, वैसी उम्मीद किसी और से हो भी नहीं सकती। ऐसे में हर सांसद को अधिक तैयारी के साथ सदन के वक्त का एक-एक पल इस्तेमाल करना चाहिए, खासकर विपक्ष के सांसदों को। किसी संसदीय क्षेत्र के मुद्दों को उठाने के लिए वहीं के सांसद का होना जरूरी नहीं है, कोई भी सांसद देश के किसी भी हिस्से की बात उठा सकते हैं। सत्ता पक्ष के पास तो पूरी की पूरी सरकार है जिसके कामकाज से वह अपनी सोच सामने रख सकते हैं, लेकिन विपक्ष के पास तो जनता, देश-प्रदेश, और दुनिया के मुद्दों को उठाने के लिए खासी तैयारी जरूरी है, और विपक्षी पार्टियां चाहे जितनी भी कमजोर क्यों न हो गई हों, वे मेहनत करके संसद सत्र में अपने निर्वाचित सांसदों के मार्फत देश और दुनिया का भला कर ही सकती हैं। 
-सुनील कुमार

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