संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 19 जून : सिकल सेल दिवस का जलसा, और सरकारी रूख की हकीकत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 19 जून : सिकल सेल दिवस का जलसा, और सरकारी रूख की हकीकत
Date : 19-Jun-2019

आज इस वक्त छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार प्रदेश की सबसे व्यापक फैली हुई आनुवांशिक बीमारी सिकल सेल पर एक कार्यक्रम कर रही है जिसमें मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में प्रदेश की इस गंभीर समस्या को लेकर चर्चा हो रही है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में सिकल सेल से प्रभावित लोग लाखों में हैं, और पांच वर्ष की उम्र से कम में मरने वाले बच्चों में से पन्द्रह फीसदी की मौत इसी बीमारी की वजह से होती है। बाद में भी लोग इसकी वजह से जान खोते हैं, या बहुत तकलीफ के साथ कम उम्र जीते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा देश के कुछ और राज्यों में आदिवासी और ओबीसी तबकों में सिकल सेल का कहर बहुत है, और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे रोकने के लिए बड़ी फिक्र जाहिर की है। 

लेकिन छत्तीसगढ़ में जो लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं, जो डॉक्टर इसके इलाज की कोशिश करते हैं, और सरकारी क्षेत्र में जिन लोगों पर इससे जूझने की जिम्मेदारी है, उन तमाम लोगों की जानकारी में यह बात अच्छी तरह है कि राजधानी रायपुर के मेडिकल कॉलेज में सिकल सेल पर बड़े पैमाने पर जो उत्कृष्ट शोध चल रहा था, उसके बीच से उस विभाग के मुखिया, उस काम में बरसों से लगातार जुटे हुए डॉक्टर को पिछली भाजपा सरकार ने व्यक्तिगत नापसंदगी के चलते इस कॉलेज से हटाकर बिलासपुर भेज दिया था, और उनके रहते जितनी रिसर्च हुई थी, वह धरी रह गई। वैसे तो सरकार में किसी को भी कहीं भेजा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि एक थानेदार को दूसरे थाने में भेजने और एक चिकित्सा वैज्ञानिक को उसके शोध केन्द्र से दूर भेज देने में फर्क क्या इस सरकार को समझ आता है? यह काम एक ऐसे वैज्ञानिक-चिकित्सक के साथ किया गया जो कि प्रदेश की इस सबसे बड़ी बीमारी पर शोध कार्य में बहुत आगे पहुंचा हुआ था, और यह तबादला पिछली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में खरीदी के सैकड़ों-हजारों करोड़ के घोटाले में साथ न देने की वजह से किया गया था। आज जब उस घोटाले पर जुर्म दर्ज करके नई सरकार कई किस्म की जांच कर रही है, उस वक्त के घोटालेबाज जमानत पर हैं, या सैकड़ों करोड़ कमाकर पूछताछ की राह देख रहे हैं, तब आज का यह सरकारी जलसा इस हकीकत से पूरी तरह अछूता बना हुआ है कि पिछली सरकार ने किस भ्रष्टाचार में साथ न देने की वजह से ऐसे वैज्ञानिक का तबादला करके पूरे के पूरे शोध कार्य, अध्ययन, और चिकित्सा को गड्ढे में डाल दिया था। 

सरकार को लंबे समय से देखने का हमारा तजुर्बा बताता है कि राज्य में जिन मंत्रियों को चिकित्सा या स्कूल शिक्षा का जिम्मा दिया जाता है, उन्हें और कोई भी विभाग नहीं देना चाहिए क्योंकि ये दो विभाग किसी भी एक इंसान की मानवीय क्षमता, और हर दिन चौबीस घंटे काम करने से अधिक जरूरत वाले हैं। लेकिन भारत, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विभागों का बंटवारा इस आधार पर होता है कि किस मंत्री के पास कितने हजार करोड़ का सालाना बजट है, और मीडिया में खुलकर इस बात की चर्चा इसी अंदाज में होती है कि मंत्रियों को मानो कितनी कमाई का मौका मिला है। यह नौबत पूरी तरह बदलनी चाहिए। स्वास्थ्य और स्कूल शिक्षा, ये दो विभाग किसी भी मंत्री के लिए पर्याप्त जिम्मेदारी जब तक मानी नहीं जाएगी, तब तक इनको सुधारना मुमकिन नहीं है। ये दोनों विभाग परले दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, और पिछली सरकार के वक्त ये तबाह हो चुके हैं। इनके मंत्री, और इनके सचिव, दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त रखे जाने चाहिए। दुनिया के किसी भी विकसित देश में इन दोनों विभागों को बजट का बड़ा हिस्सा मिलता है, महत्व सबसे अधिक मिलता है, और अभी एक हफ्ते पहले ही भूटान की खबर आई है कि वहां पर डॉक्टरों और शिक्षकों को वहां के मंत्रिमंडल ने देश में सरकारी वेतन तय करते हुए सबसे ऊंची तनख्वाह वहां के डॉक्टरों, और शिक्षकों को देना तय किया है। 

चूंकि छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने पिछली सरकार के वक्त सिकल सेल शोध कार्य को किनारे पटक देने के फैसले पर अब तक कुछ सोचा नहीं है, इसलिए इस बात को हम यहां जोर देकर लिख रहे हैं कि अगर राज्य सरकार के मन में प्रदेश की इस सबसे बड़ी आनुवांशिक बीमारी का भी महत्व अगर नहीं है, तो आज इस वक्त चल रहे सरकारी जलसे का कोई मतलब भी नहीं है। राज्य सरकार को इलाज और प्राथमिक शिक्षा को भ्रष्टाचारमुक्त रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही बातें किसी भी सभ्य लोकतंत्र में भविष्य की बुनियाद मानी जाती हैं। भ्रष्टाचार के लिए सरकार के पास बहुत से और विभाग हैं, और उसे वहीं से अपना काम चलाना चाहिए, अगर ईमानदारी असंभव सी है।
-सुनील कुमार

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