संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 20 जून : नालों में पानी रोकने के साथ-साथ बाढ़ रोकने बड़े तालाब भी जरूरी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 20 जून : नालों में पानी रोकने के साथ-साथ बाढ़ रोकने बड़े तालाब भी जरूरी
Date : 20-Jun-2019

कई बरस पहले से कुछ जानकार और समझदार दूरदर्शी यह कहने लगे थे कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। और इस चर्चा के दस-बीस बरस के भीतर ही आज यह नौबत दिख रही है कि पानी के लिए हिन्दुस्तान के ही कई हिस्सों में हिंसा हो रही है। हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा सूखा पड़ा है, और लोग अपनी प्यास बुझाने को गांव और इलाका छोड़कर जा रहे हैं, और उन्होंने अपने जानवरों को मरने के लिए छोड़ दिया है क्योंकि हिंसक और हमलावर गौरक्षकों की वजह से, और अंधाधुंध कड़े गौरक्षा कानूनों की वजह से पशुओं को बेच पाना मुमकिन नहीं रह गया है। लेकिन यह तो शहरी इंसान और जानवर की बात हुई, देश भर में जगह-जगह प्यासे जंगली-जानवर पास की बस्तियों में पहुंच रहे हैं, और एक अलग टकराव बढ़ते चल रहा है। 

जो धरती अपने गर्भ में पानी से लबालब थी, उसे टेक्नालॉजी और मुफ्त की बिजली ने मिलकर खाली कर दिया। धान उगाने वाले इलाकों में इस फसल के लिए खूब पानी लगता है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में किसानों को इसके लिए मुफ्त बिजली मिली हुई है। किसान की तो मदद हो गई, लेकिन धरती की कोख सूनी हो गई। जिस वक्त इस बात को लिख रहे हैं, उस वक्त टीवी स्क्रीन पर मध्यप्रदेश के खरगौन इलाके का एक वीडियो दिख रहा है जिसमें गांव का गांव इलाका छोड़कर जा रहा है क्योंकि पानी बचा ही नहीं। आज बीस जून को विश्व शरणार्थी दिवस भी है, और यह कैसा अजीब इत्तफाक है कि महज पानी के लिए लोग अपना इलाका छोड़कर कहीं शरणार्थी होने जा रहे हैं, हजारों-लाखों बरस से जंगलों में बसे हुए जानवर तो शरणार्थी हो ही चुके हैं। 

छत्तीसगढ़ में धरती के भीतर के पानी को बढ़ाने के लिए गांवों के आसपास के नालों को बिना किसी टेक्नालॉजी या शहरी सामान के, महज सामान्य समझबूझ और परंपरागत ज्ञान से ऐसा बदला जा रहा है कि उससे उनमें पानी थम सके, और आसपास की धरती में भी जा सके, बारिश के बाद भी लोगों को उससे पानी मिल सके। यह छोटे स्तर पर, कम खर्च पर, बहुत ही विकेन्द्रीकृत और मजदूरी से जुड़ी हुई स्थानीय तकनीक है, जो अगर कामयाब होती है तो कामयाबी आने वाले कुछ बरसों में ही दिखने लगेगी। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात पर गौर करने की जरूरत है ताकि धरती के भीतर बारिश के पानी को वापिस भेजने के लिए एक अलग कोशिश भी हो सके। यह बड़ी सामान्य ज्ञान की बात है कि हिन्दुस्तान में बारिश कुछ दिनों में बहुत अधिक होती है, और नदियों में बाढ़ आ जाती है, और उसका सारा पानी समंदर में चले जाता है। ऐसे में हर इलाके में नदियों तक पहुंचने वाले पानी को जगह-जगह रोककर उससे भूजल की री-चार्जिंग की एक बड़ी कोशिश ऐसी होनी चाहिए जो कि न तो अनिवार्य रूप से इंसान और जानवर की निस्तारी के मकसद से हो, और जो न ही अनिवार्य रूप से मजदूरी जुटाने के मकसद से हो। इन दोनों पैमानों से परे महज धरती के पेट को भरने के लिए, मतलब इंसानों को प्यासे मरने से रोकने के लिए, जगह-जगह बड़े पैमाने पर ऐसे री-चार्जिंग जलाशय बनाने चाहिए जो कि तेज बारिश के वक्त नदियों में बाढ़ लाने वाले पानी को पहले ही रोक सके। 

यह हमारा पसंदीदा विषय है, और इस पर कुछ दिन पहले भी हमने इसी जगह लिखा भी था। अभी राज्य सरकार नालों में पानी रोकने की जो व्यापक कोशिश कर रही है, वह अपनी जगह चलती रहे, लेकिन बड़े पैमाने पर बड़े जलाशय बनाकर बाढ़ की नौबत को रोकने,  पानी के उस तात्कालिक सैलाब को रोकने के लिए प्रदेश भर में बड़ी-बड़ी मशीनों से बड़े-बड़े जलाशय बनाने चाहिए, फिर चाहे वे आबादी से दूर हों, किसी इंसान या जानवर के सीधे काम न आए, जिनसे कोई मजदूर काम न पाए। धरती के पानी को वापिस डालने के लिए एक अलग सोच की जरूरत है, और आज राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में ऐसी कोई योजना दिखाई नहीं पड़ती है। यह काम अधिक लागत के बिना हो सकता है क्योंकि मशीनों से काम सस्ता पड़ता है, और जल्दी हो सकता है। इस बारिश में भी राज्य सरकार चाहे तो प्रदेश के नक्शे में पहले से दर्ज नदियों के कैचमेंट एरिया छांटकर वहां जगह-जगह सरकारी जमीनों पर ऐसे तालाब तुरंत खोदे जा सकते हैं, और इनका फायदा पूरे प्रदेश में जमीनी पानी का स्तर ऊपर आने की शक्ल में दिखने भी लगेगा। यह काम मजदूरी देने के मुकाबले कम लोकप्रिय या कम लुभावना रहेगा, लेकिन नालों के साथ-साथ ऐसे बड़े तालाब भी बनने से ही नदियों की बाढ़ में बर्बादी घटेगी, और वह अतिरिक्त पानी धरती के पेट को फिर भर सकेगा।
-सुनील कुमार

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