संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 जून : बच्चों की अकाल मौत के  बाद उनकी बद्दुआ किसी  को तो लगती होगी...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 जून : बच्चों की अकाल मौत के बाद उनकी बद्दुआ किसी को तो लगती होगी...
Date : 22-Jun-2019

बिहार के सरकारी अस्पतालों में बच्चों की थोक में हो रही मौतों के चलते आखिरकार देश के मीडिया के एक हिस्से ने भी यमदूतों को किनारे धकेलकर वार्डों पर हमला किया, और डॉक्टरों को खलनायक साबित करके एक किस्म से बिहारी मुख्यमंत्री स्वशासन बाबू नीतीश कुमार को बिना कहे बेकसूरी का एक सर्टिफिकेट दे दिया। यह काम कम से कम एक हिन्दी समाचार चैनल की एक चर्चित रिपोर्टर ने इतने अश्लील और हिंसक तरीके से किया कि मीडिया में मामूली शर्म रखने वाला तबका भी इस पर शर्म में डूब गया। लाशों पर मंडराने के लिए, या दम तोडऩे के करीब लोगों पर मंडराने के लिए जिन गिद्धों को बदनाम किया जाता है, उन्होंने भी यह नजारा देखकर मुंह मोड़ लिया। लेकिन कुछ लोगों ने इस हरकत के पीछे की नीयत को पहचाना कि किस तरह बिहार की सत्ता को मासूमियत और बेकसूरी का प्रमाणपत्र दिया गया, और यह साबित किया गया कि बंगाल के अस्पतालों में ऐसी मौतों के लिए मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी जिम्मेदार हैं, लेकिन बिहार में ऐसी सैकड़ों मौतों के लिए डॉक्टर और चिकित्सा कर्मचारी खलनायक हैं। 

यह नजारा देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि किस तरह लालू यादव को बेदखल करके नीतीश कुमार सत्ता पर आए, और मुख्यमंत्री के तीसरे कार्यकाल से गुजर रहे हैं। इस बीच वे भाजपा के साथ रहे, भाजपा के खिलाफ रहे, मोदी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खुलकर रूख जाहिर किया, और फिर मोदी का झंडा लेकर चलने लगे। ऐसे कई किस्म के बदलते रूख के बीच भी वे बिहार पर लगातार राज करते रहे, लगातार चुनाव जीतते रहे, और लगातार लोकसभा चुनावों में भी एनडीए को आगे बढ़ाते रहे। अब सवाल यह उठता है कि जाने-पहचाने जिलों में अगर संक्रामक बीमारियों से मौतों का ऐसा बुरा हाल है, और शिनाख्त रहते हुए भी इनसे निपटने का इंतजाम नहीं किया गया, तो भी नीतीश कुमार कैसे लगातार जीतते हैं? क्या इसलिए कि उनके पहले की सरकारें उनसे अधिक खराब थीं, और अब तक लोग उन बुरी यादों को भूल नहीं पाए हैं, और ऐसे अस्पतालों के बाद भी नीतीश को बेहतर मुख्यमंत्री मानते हैं? आखिर किसी इलाके या प्रदेश के वोटरों के सामने तुलना करने के लिए जो बात रहती होगी, उसी से तो तुलना करेंगे? आज नीतीश के अस्पतालों की तुलना कोई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के मोहल्ला क्लीनिक से तो कर नहीं सकते जो कि देश में शायद सबसे इलाज दे रहे हैं? कोई बिहार के स्कूलों की तुलना दिल्ली के उन स्कूलों से तो कर नहीं सकते जिन्हें वहां की सरकार ने विश्व स्तर का बनाकर रखा है? 

बरस-दर-बरस बिहार में ऐसी मौतों के चलते हुए भी सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी जीत पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता, और इससे समझ पड़ता है कि मौजूदा सरकार लोगों की पुरानी यादों से अब भी बेहतर है। शायद यह भी एक वजह रही कि अभी ताजा आम चुनावों में बिहार में कांग्रेस-लालू का नामों-निशान मिट जाने जैसी नौबत रही, और नीतीश-भाजपा बुलडोजर की तरह आगे बढ़ते चले गए। लेकिन यहीं पर एक बात सामने आती है जिस पर उन तमाम पार्टियों को गौर करना चाहिए जो कि बड़ी जीत लेकर सत्ता पर आती हैं। बड़ी जीत लोगों की आंखों पर एक बड़ा पर्दा बनकर भी आती है, और सत्ता की चुनौतियों को उनकी जीत के नशे वाले आंखों से दूर कर देती है। ऐसी बड़ी जीत लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का पूरा एहसास नहीं करवाने देती, और ऐसी बड़ी जीत लोगों को जनता से मिले हुए अधिकारों को लेकर एक खुशफहमी में भी डाल देती है कि अब उनका पसीना भी गुलाब के अत्तर सरीखे छोटी-छोटी शीशियों में बिकेगा। 

और दूसरी बात यह भी है कि चुनावी हार-जीत या सत्ता से परे, इस किस्म से बेकसूर बच्चों की थोक में होने वाली वे मौतें इतिहास में तो उन लोगों के नाम के साथ दर्ज हो ही रही हैं जो कि सत्ता पर हैं, सत्ता का सुख पा रहे हैं, और मौतों को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। बात महज बिहार की नहीं है, बात किसी दूसरे प्रदेश की भी नहीं है, बात पूरे देश की है कि मौतों पर किस नेता का क्या रूख रहता है। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के हर आम इंसान के हाथ एक खास लोकतांत्रिक हथियार लगा हुआ है। और लोग इस बात को अच्छी तरह दर्ज भी कर रहे हैं कि बिहार  में सौ-सौ बच्चों की मौत के बाद देश के प्रधानमंत्री की किसी के सेहत के लिए पहली फिक्र सामने आई, तो वह एक हिन्दुस्तानी क्रिकेटर के अंगूठे टूटने पर आई। आज लोगों की कही बातें जितनी दर्ज हो रही हैं, उतनी ही लोगों की चुप्पी भी दर्ज हो रही है, और इन सबसे ऊपर बेकसूर मासूम बच्चों की ऐसी अकाल मौत के बाद उनकी बद्दुआ भी तो किसी न किसी को लगती होगी। 
-सुनील कुमार

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