संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 23 जून : हिन्दुस्तान ने मैच जीता, और  अफगानिस्तान ने जीता दिल...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 23 जून : हिन्दुस्तान ने मैच जीता, और अफगानिस्तान ने जीता दिल...
Date : 23-Jun-2019

विश्व कप क्रिकेट में बीती रात जब आखिरी ओवर में हिन्दुस्तान किसी तरह अफगानिस्तान से जीता तो भी हिन्दुस्तानी क्रिकेट प्रशंसकों को खुशी भी हुई, और अफगानिस्तान के लिए थोड़ा सा मलाल भी हुआ। लंबे बरसों से यह देश जिस तरह की दहशतगर्दी से गुजर रहा है, अमरीकी फौजी कार्रवाई को झेल रहा है, और अपने देश की सरकार में अस्थिरता देख रहा है, वैसे देश में क्रिकेट की ऐसी शानदार टीम बनना लोगों को हैरान करती है। अफगानिस्तान में क्रिकेट का कोई लंबा इतिहास नहीं रहा है, और पड़ोस का पाकिस्तान आजाद होने के पहले से अंग्रेजों की हुकूमत में हिन्दुस्तान के साथ एक ही टीम में क्रिकेट खेलते आ रहा था। अभी चार दिन पहले ही पाकिस्तान की टीम की जो धज्जियां हिन्दुस्तानी टीम ने उड़ाई हैं, उन्हें देखकर पाकिस्तान में वहां के खिलाडिय़ों को बड़ी बुरी बेइज्जती झेलनी पड़ रही है, जो कि नाजायज भी है। दूसरी तरफ अभी दो बरस पहले अफगानिस्तान की टीम को अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिला, और टेस्ट मैच खेलने मिला। अफगानिस्तान की टीम का यह दूसरा ही विश्व कप है, और पिछला मुकाबला उन्होंने 2015 में ही पहली बार खेला था। ऐसे देश ने कल भारत के खिलाफ जो प्रदर्शन किया है, वह देखने लायक था, और हिन्दुस्तान के अनगिनत क्रिकेट प्रशंसकों ने रात से अब तक यह ट्वीट किया है कि हिन्दुस्तान ने मैच जीता, और अफगानिस्तान ने दिल। 

इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि लगातार अभाव और तनाव में संघर्ष करने वाले लोग कई बार इन दिक्कतों को अपने मन में ही संघर्ष छोड़ देने का एक बहाना बना लेते हैं। वे अपनी हार के लिए तश्तरी में तैयार इस तर्क को सहूलियत से इस्तेमाल कर लेते हैं कि ऐसे हालात में वे भला क्या जीतते। जिस अफगानिस्तान में तालिबानों ने लंबे अर्से से जिंदगी के हर पहलू पर इस्लामी पैमाने लादने का काम किया है, गीत-संगीत पर रोक लगा दी है, महिलाओं पर तो तरह-तरह की रोक है ही, और वहां की राजधानी में भी हर कुछ महीने में धमाके होते हैं जिनमें बहुत सी मौतें होती हैं। ऐसे में वहां के नौजवानों ने क्रिकेट के खेल में यह गजब की दिलचस्पी ली है, और दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाने वाली एक टीम, हिन्दुस्तान की नाक में कल दम करके रख दिया था। आखिरी ओवर तक यह समझ नहीं पड़ रहा था कि नतीजा क्या होगा, यह तो गनीमत कि भारत के मो. शमी ने इस मुस्लिम देश की टीम के लगातार तीन विकेट लिए, और ट्विटर पर साम्प्रदायिकता फैलाने में जुट गए हिन्दुस्तानियों को अपने ट्वीट मिटाने पर मजबूर भी कर दिया। मैच चल ही रहा था कि मुस्लिमों से नफरत करने वाले कुछ हिन्दुस्तानियों ने यह लिखना शुरू कर दिया था कि अजहर से लेकर शमी तक ये लोग गद्दार हैं, देशद्रोही हैं। मैच के आखिरी ओवर ने ऐसे नफरतजीवी लोगों के मुंह पर कालिख पोत दी। कल रात मैच में यह देखना भी बड़ा शानदार लग रहा था कि हिन्दुस्तानी टीम की प्रायोजक एक चीनी मोबाइल कंपनी थी, और अफगानिस्तान की टीम का प्रायोजक हिन्दुस्तान का सबसे मशहूर ब्रांड, अमूल था। 

अफगानिस्तान टीम की इस मिसाल से परे इन दो-चार दिनों पर एक बात और कही जाए तो वह यह है कि पाकिस्तानी टीम की हार पर वहां के निराश क्रिकेटप्रेमियों ने खिलाडिय़ों के साथ जैसा बुरा सुलूक किया है, वह शर्मनाक है। टीम तो मैदान में हारी थी, पाकिस्तान के ऐसे लोगों की इंसानियत एयरपोर्ट और सड़कों पर कैमरों के सामने हार रही है। अपने खिलाडिय़ों को देश के खिलाफ गद्दार कहना एक बहुत ही घटिया बात है, और ऐसे लोगों को खेलप्रेमी कहलाने का भी कोई हक नहीं है। अब अगर मानो पाकिस्तान के साथ हुए मैच में जब हिन्दुस्तानी कप्तान विराट कोहली बिना आऊट हुए अपने को आऊट समझकर पैवेलियन लौट गए थे, तो उनकी जगह कोई अजहर या शमी होता, तो उन्हें गद्दार कहने वाले लोग कम नहीं होते। इसी तरह इसके कुछ ओवर बाद जब एक पाकिस्तानी खिलाड़ी के आऊट होने पर कप्तान कोहली अपील करना चाहते थे, और धोनी ने उन्हें समझाया कि खिलाड़ी आऊट नहीं है, और अपील नहीं की गई। इसके बाद वह खिलाड़ी आऊट निकला, लेकिन मौका निकल चुका था। अब अगर धोनी की जगह कोई मुस्लिम खिलाड़ी होता तो हिन्दुस्तान के बहुत से नफरतजीवी लोग उसे गद्दार लिखना शुरू कर देते। 

इन दो मैचों से अफगानिस्तान ने एक मिसाल पेश की है जिसने हिन्दुस्तान सहित बाकी दुनिया का भी दिल जीत लिया है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के कुछ घटिया लोगों ने अपने खिलाडिय़ों के खिलाफ नफरत उगली है, जिससे उनकी ही बेइज्जती अधिक हुई है, कोई खिलाड़ी गद्दार साबित नहीं हुए। खेलों में नफरत की जगह नहीं रहनी चाहिए, जीत-हार तो लगी रहती है। 
-सुनील कुमार

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