संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 जून : एक अच्छे काम से जुड़े हुए खतरों से सावधानी जरूरी...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 जून : एक अच्छे काम से जुड़े हुए खतरों से सावधानी जरूरी...
Date : 25-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के कलेक्टर संजय अलंग एक जाने-माने साहित्यकार हैं, और वे सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय रहते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के बहुत से पहलुओं का इतिहास बताते हुए कई किताबें लिखी हैं, और देश भर में साहित्य की पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपती भी रहती हैं। ऐसे में यह माना जाता है कि यह अधिकारी दूसरों के मुकाबले कुछ अधिक संवेदनशील होगा, और ऐसी ही एक संवेदना अभी कल ही सामने आई है। वे कुछ अरसा पहले कलेक्टर की जिम्मेदारी के तहत जेल के दौरे पर गए थे, और वहां उन्होंने एक ऐसी छोटी बच्ची को देखा जिसका पिता जेल में बंद था, और बच्ची को महिला जेल में रखा गया था, जहां बाकी महिला कैदी और जेल कर्मचारी उसका ख्याल रखते थे। उस बच्ची से बात करके जब उन्होंने जाना कि वह किसी अच्छी स्कूल में पढऩा चाहती है, तो उन्होंने बिलासपुर की बड़ी महंगी निजी स्कूलों में बात की, और एक स्कूल ने उसकी मुफ्त पढ़ाई और हॉस्टल में मुफ्त रहने की जिम्मेदारी उठाई। इसके बाद संजय अलंग अपनी कार से उस बच्ची को जेल से स्कूल लेकर गए, और उसकी नई जिंदगी शुरू हुई। कलेक्टर की पहल पर जेल में अभी रह रहे सत्रह और बच्चों को भी दूसरी स्कूलों में दाखिल करवाया जा रहा है।

ये पूरी कहानी एक सरकारी अधिकारी के जिम्मेदार काम की है, और एक बच्ची की जिंदगी में आए एक ऐसे मोड़ की है जो कि उसे कहीं भी पहुंचा सकता है। कलेक्टर ने उस बच्ची का नाम और चेहरा सार्वजनिक नहीं होने दिया है, लेकिन स्कूल का नाम उजागर हुआ है, और उस बच्ची की बेचेहरा तस्वीरें जारी हुई हैं। इस कहानी का एक हिस्सा बहुत अच्छा है और यह दूसरे जिलों के लिए, जिलों में इस तरह से मां-बाप के साथ बंद दूसरे बच्चों के लिए एक मिसाल बन सकता है, लेकिन एक दूसरी बात भी इससे जुड़ी हुई है जिसका ख्याल रखना चाहिए। 

हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में स्कूली बच्चों के बीच एक-दूसरे को परेशान करना एक बहुत आम बात है। बच्चों के बीच सामाजिक हकीकत की समझदारी आ नहीं पाती है, और वे परिवार के दूसरे लोगों के नजरिए से प्रभावित रहते हैं। अभी चार-छह दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपनी बेटी की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि उसकी क्लास का एक लड़का (और उन्होंने उसका नाम भी लिख दिया है), किस तरह उनकी बेटी की तस्वीर को लेकर उसे परेशान करता है। देश की एक सबसे ताकतवर महिला की बेटी के साथ जब ऐसी परेशानी हो सकती है, तो यह जाहिर है कि एक बहुत ही वंचित तबके से आई हुई, जेल से निकलकर स्कूल पहुंची हुई बच्ची की अगर ऐसी बेचेहरा भी नुमाइश होती हो, तो स्कूल मैनेजमेंट उसे अपनी सामाजिक जवाबदेही की मिसाल की तरह पेश करने की लालच में पड़ सकता है, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गैरजिम्मेदारी से उसे एक दिलचस्प रिपोर्ट का सामान मान सकता है, और स्कूल के दूसरे बच्चे उसे एक कैदी की बेटी की तरह मानकर उसके साथ एक ऐसा अलग किस्म का बर्ताव कर सकते हैं जो कि उस छोटी बच्ची के मानसिक विकास में बड़ी बाधा बन सकता है। अभी ही खबरों में यह छप चुका है कि इस बच्ची का पिता जेल में पांच साल की सजा काट चुका है, और पांच साल बाकी है। जब यह बच्ची पन्द्रह दिनों की थी, तभी माँ की मौत हो गई, और घर पर कोई नहीं थे तो उसे पिता के पास जेल भेज दिया गया, और तबसे महिला कैदी उसे पाल-पोसकर बड़ा कर रही हैं। ऐसी जानकारियां और उसकी अब तक की सामने आईं बेचेहरा तस्वीरें उसी बच्ची की निजता को खत्म कर रही हैं, और इस मामले में उसका भला करते हुए भी उसे ऐसे प्रचार से, भेदभाव के खतरे से बचाना बेहतर होगा। आगे ऐसे दूसरे मामलों में इन बच्चों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा गवाहों को बचाने के लिए उन्हें एक नई शिनाख्त देकर किया जाता है।
-सुनील कुमार

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