संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 26 जून : आसपास, या अपनी स्कूल से लेकर गैरस्कूली बच्चों तक...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 26 जून : आसपास, या अपनी स्कूल से लेकर गैरस्कूली बच्चों तक...
Date : 26-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में आज शाला प्रवेश उत्सव मनाया जा रहा है, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दुर्ग जिले के एक गांव की उस स्कूल में नए बच्चों के स्वागत-समारोह में पहुंचे हुए हैं जहां अपने बचपन में वे खुद पढ़े थे। वे मुख्यमंत्री हैं इसलिए जाहिर है कि आज वे इस स्कूल के लिए तमाम सहूलियतों की घोषणा कर सकते हैं। और पिछले बरसों में वे लगातार इस इलाके के विधायक भी रहे हैं, और उस हैसियत से भी उन्होंने उस स्कूल के लिए काफी कुछ किया होगा। लेकिन इस मौके पर हमें कई बरस पहले इसी जगह अपनी लिखी हुई एक बात याद पड़ती है। 

आज बहुत से लोग न सिर्फ राजनीति और सरकार में, बल्कि कारोबार में, या पेशे में बहुत कामयाब हो जाते हैं, और ऐसी हालत में रहते हैं कि वे उन जड़ों को अपनी आज की ताकत से सींच सकें जिनसे बढ़कर वे यहां तक पहुंचे हैं। हमने पहले भी यह लिखा था कि सक्षम और संपन्न लोगों को अपनी बचपन की स्कूलों की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनकी स्कूलें अपने आपमें बहुत संपन्न हों, और वहां पर कुछ भी जोडऩे की कोई जरूरत न हो, लेकिन बहुत से लोग सरकारी, म्युनिसिपल, पंचायत, या गरीब स्कूल से पढ़कर निकले होंगे और आज आगे बढ़े हुए होंगे। बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो ऐसी किसी स्कूल में न पढ़े हों, लेकिन उनके बच्चे या उनके माता-पिता ऐसी किसी साधारण स्कूल में पढ़े हों। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो ऐसे इलाकों से निकलकर बाहर आकर कामयाब हुए हों जहां आज भी स्कूलों की जरूरत हो। इनमें से कोई भी बात हो, यह गुंजाइश तो हमेशा रहती है कि लोग आगे बढ़कर स्कूलों की मदद करें, जो कि किसी किस्म का दान नहीं होगा, वह एक बेहतर भविष्य के लिए एक छोटा सा पूंजीनिवेश होगा। 

अच्छी से अच्छी सरकारी स्कूल भी बहुत सी और चीजों की जरूरत में रहती है। कहीं मैदान नहीं होता, कहीं लाइब्रेरी या प्रयोगशाला की कमी रहती है, और कई जगहों पर कुछ विषयों के शिक्षक नहीं रहते हैं। लोग उन स्कूलों से पढ़कर निकले बिना भी अपना वक्त या अपना पैसा वहां लगा सकते हैं, जिनका ज्ञान अच्छा हो वे वहां जाकर पढ़ाने का प्रस्ताव रख सकते हैं, या जिनके पास पैसे अधिक हों, वे आर्थिक योगदान कर सकते हैं। कुछ ऐसे खिलाड़ी हो सकते हैं जो वहां जाकर बच्चों को खेल सिखाने में मदद करें, कुछ ऐसे लेखक हो सकते हैं जो बच्चों की भाषा बेहतर बना सकें, उन्हें लिखने की बेहतर समझ दे सकें। कुछ ऐसे भी कलाकार हो सकते हैं जो आसपास की किसी स्कूल के बच्चों को चित्रकला, मूर्तिकला, या संगीत सिखा सकें। अगर लोगों में अपने इर्द-गिर्द के, अपने गांव-कस्बे के बच्चों का माहौल बेहतर बनाने में दिलचस्पी हो, तो बहुत सी संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। 

आज छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी राज्य के बच्चे जब राज्य से निकलने की सोचते हैं, तो अंग्रेजी का ज्ञान न होना उनके लिए एक बड़ी रूकावट बन जाता है। ऐसे में किसी भी स्कूल के आसपास बसे हुए रिटायर्ड या कामकाजी लोग जिनकी अंग्रेजी बेहतर हो, वे स्कूल के प्राचार्य से मिलकर समय तय करके बच्चों की अंग्रेजी बेहतर करने का काम कर सकते हैं क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की अंग्रेजी कई जगहों पर खासी कमजोर रहती है, या भाषा के शिक्षकों पर बहुत बड़ा बोझ रहता है। दरअसल स्कूलों में, या स्कूलों के बाहर छोटे बच्चों के लिए कुछ करने का सरोकार अधिक फैशन में नहीं है। लोगों का ध्यान उस तरफ अधिक जाता है जहां बच्चों की जरूरत किसी वजह से, शारीरिक या मानसिक दिक्कत की वजह से अधिक रहती है, और वहां पर दान करने को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। जबकि तमाम आम जगहों पर बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने की बड़ी जरूरत रहती है, और लोग अपने स्तर पर, कुछ लोग संगठित होकर, या कुछ संगठनों के लोग एक पहल करके स्कूल न जाने वाले बच्चों को स्कूल भेजने की कोशिश कर सकते हैं, या वहां जा चुके बच्चों के लिए कुछ और अच्छा कर सकते हैं। आज ही फेसबुक पर किसी ने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें सरकारी नौकरी करने वाला एक नौजवान अपनी दिलचस्पी और अपने पैसों से रोज बेघर-फुटपाथी बच्चों को पढ़ाने की ऐसी कोशिश कर रहा है कि जो बच्चा खुली जगह पर उससे दो घंटा पढ़ ले, उसे वह अपना पकाया खाना खिलाता है। इस खाने की जरूरत से उसके पास दर्जनों बच्चे आने लगे हैं, और वह इस काम को बढ़ाते चल रहा है। उसका कहना है कि महज खाने के लिए बच्चे उसके पहले दो घंटे पढऩे के लिए तैयार हैं, और धीरे-धीरे उनकी सोच ऐसी हो जाती है कि वे खाना न मिले तो भी शायद पढऩे के लिए आना जारी रखें। इसलिए आज जो बात हमने यहां छेड़ी है वह स्कूल से शुरू तो होती है, लेकिन महज स्कूल तक सीमित नहीं हैं, और स्कूल पर खत्म नहीं होती है। लोग अपने इर्द-गिर्द देखें तो बच्चों की जरूरतें चारों तरफ बिखरी हुई हैं, और यह चर्चा उन्हें सोचने के लिए एक मुद्दा देने की कोशिश भर है।
-सुनील कुमार

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