संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 27 जून : पिछली एक सदी की तमाम बर्बादी इस सदी में पूरी तरह सुधर सकेगी?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 27 जून : पिछली एक सदी की तमाम बर्बादी इस सदी में पूरी तरह सुधर सकेगी?
Date : 27-Jun-2019

एक-एक करके दुनिया के बहुत से शहरों के बारे में ये खबर आ रही है कि आने वाले कितने बरसों में वहां की जमीन के नीचे का पानी खत्म हो जाएगा, और किस बरस में जाकर वहां पीने का कोई पानी नहीं बचेगा, किस देश की कितनी फीसदी आबादी बिना पानी रह जाएगी। यह तस्वीर इतनी भयानक है कि पश्चिम के एक सभ्य और विकसित लोकतंत्र में लोगों के एक समूह ने यह तय किया है कि वे बच्चे पैदा नहीं करेंगे क्योंकि उन बच्चों को वे ऐसा सूखा भविष्य देकर जाना नहीं चाहते जिसमें एक बोतल पानी के लिए कोई किसी के गले काट दें। 

लेकिन दुनिया की इस भयानक तस्वीर को देखें तो लगता है कि दसियों हजार साल का इंसानी इतिहास अभी 20वीं सदी, यानी 1900, के पहले तक धरती को कुल मिलाकर जितना तबाह कर चुका था, इस एक 20वीं सदी में इंसान ने उससे कई गुना अधिक तबाही खड़ी कर दी है। एक-एक तकनीक सामने आई, उससे औजार या हथियार बने, गाडिय़ां बनीं, ईंधन बदले, इमारतें खड़ी हुईं, और कांक्रीट के जंगल बने। लोगों की खपत हिंसक सीमा तक पहुंच गई, और धरती की क्षमता चुक गई। नतीजा यह हुआ है कि जमीन के भीतर के पानी को इंसानों ने पंपों से उलीचकर रख दिया है, और धरती के ऊपर कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए हैं, समंदर की तलहटी तक, और मछलियों के गलफड़ों तक प्लास्टिक को पहुंचा दिया है, गायों के पेट पॉलीथीन के गोदाम बना दिए हैं, शहरों की हवा ऐसी जहरीली बना दी है कि इलाज के कारखानों को कच्चे माल की कमी ही नहीं पड़ सकती। यह सब कुछ पिछली सदी में इस रफ्तार से हुआ कि दुनिया देखती रह गई कि इंसान कहां से कहां तक उसे पहुंचा सकता है, किस रफ्तार से पहुंचा सकता है। 

लेकिन दूसरी तरफ इस भयानक तस्वीर के बीच भी अगर देखें, तो जिस तरह आसमान पर काले बादलों के किनारे एक चमकीली लकीर दिखती है, उसी तरह इस तस्वीर के भीतर भी एक संभावना दिखती है कि हो सकता है कि जो सदी अभी चल रही है इस सदी के खत्म होने के पहले ही इंसान कुदरत के साथ खेली जा रही इस शतरंज की बिसात को पलटकर रख दे, और हो सकता है कि अगले 80 बरसों में इंसान पिछले सवा सौ बरसों की तबाही की भरपाई भी कर ले। इंसान में जहां खामियां हैं, वहां खूबियां भी हैं। अब पल भर को जिंदगी की निराशा से बाहर निकलने के लिए यह सोचें कि इन खूबियों से कौन-कौन सी संभावनाएं बनती हैं। यह एक अलग बात है कि इंसान उन संभावनाओं तक पहुंचे, या न पहुंचे, लेकिन वे आज तो कम से कम संभावनाओं की शक्ल में मौजूद तो हैं ही। 

इंसान ने अब धीरे-धीरे कोयले सरीखे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन की जगह परमाणु, सूरज, हवा, और लहरों से बिजली बनाना शुरू कर दिया है। हिन्दुस्तान के छोटे-छोटे शहरों में भी अब डीजल-पेट्रोल के बजाय बैटरी से चलने वाले ऑटो रिक्शा चलने लगे हैं, और जाहिर है कि इनसे प्रदूषण का बढ़ता हुआ स्तर बढऩा तो कम होना शुरू हो गया होगा। जैसे-जैसे ये ऑटो रिक्शा बढ़ेंगे, या बैटरी से चलने वाली कारें और बसें बढ़ेंगी, प्रदूषण कम होता जाएगा। इसी तरह दुनिया में जगह-जगह अब लोगों को यह समझ आ रहा है कि बारिश के पानी की बूंद-बूंद को बचाकर धरती में डालकर रखने के बाद उसे बाद में निकालकर इस्तेमाल करना अधिक आसान होगा, और ऐसा करने से नदियों में बह जाने वाले मौसमी बारिश के पानी से आने वाली बाढ़ भी थमेगी, और समंदर का बढ़ता हुआ जल स्तर बढऩा भी थमेगा। यह बात अधिक मुश्किल नहीं है, और हम इसी जगह पर बार-बार इस बात को लिखते आए हैं कि किस तरह भूजल की री-चार्जिंग तेजी से बढ़ानी चाहिए, और आज की जो टेक्नालॉजी है, हिन्दुस्तान में जितने मजदूर हैं, उन्हें मिलाकर देखें तो पांच-दस बरस में ही ऐसा हो सकता है कि बारिश का बहुत कम पानी नदियों तक जाए, बाढ़ तो बिल्कुल ही थामी जा सकती है क्योंकि नदियों को जोडऩे का काम वैसे भी चल रहा है जिससे एक तरफ का अधिक पानी दूसरी तरफ मोड़ा जा सके। पानी की जो भयानक दिक्कत आज सामने दिख रही है, उसका आसान सा एक इलाज भी मौजूद है, और उस पर काम सरकारों की ताकत के भीतर का है। 

एक और बात धरती पर से पेड़ों के कटने की है। पेड़ काटे जा रहे हैं, बॉयोडायवर्सिटी खत्म हो रही है, लेकिन साथ-साथ दुनिया की प्रयोगशालाओं में ऐसे पौधे तैयार हो रहे हैं जो आज की मौजूदा प्रजातियों के मुकाबले जल्दी बढ़ सकते हैं। बॉयोडायवर्सिटी को वापिस लाना तो आसान नहीं होगा, लेकिन धरती की हरियाली को वापिस लाना मुश्किल भी नहीं होगा। दुनिया के विकसित और संपन्न देशों के लिए भी यह जरूरी होगा कि वे गरीब देशों में जमीन के नीचे पानी बढ़ाने में पूंजीनिवेश करें, वे तरह-तरह की तकनीक से जंगल को बढ़ाएं, और दुनिया में ऐसे ईंधन का चलन बढ़ाते चलें जो धरती के नीचे से निकाला गया न हो, बल्कि सूरज, हवा, लहरों, और बारिश की बूंदों से पैदा हुआ हो। योरप के विकसित देश धीरे-धीरे इस तरफ बढ़ रहे हैं, और कोई वजह नहीं है कि हिन्दुस्तान जैसे देश ऐसा न कर सकें। 

बहुत सी टेक्नालॉजी बन जाने के बाद भी इंसान ने समय-समय पर उसका इस्तेमाल समझबूझ से करने की मिसालें सामने रखी हैं, इसलिए इसमें ऐसी कोई अनोखी बात नहीं होगी अगर आने वाले बरसों में एक बार फिर इंसान यह समझदारी दिखाए, और टेक्नालॉजी को बर्बादी से आबादी की ओर मोड़कर ले चले। लेकिन जब तक वापिसी का यह सफर शुरू नहीं होता है, तब तक लोगों को यह याद रखना चाहिए कि तस्वीर कई लोगों को आज इतनी भयानक लग रही है कि वे ऐसी दुनिया में कोई अगली पीढ़ी लाना नहीं चाहते, और आगे का जो सुधार या बचाव करना है वह इसी को ध्यान में रखकर करना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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