संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 28 जून : सरकार के नियमों और  इंतजाम का यह ढांचा  मूल अधिकार कुचल रहा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 28 जून : सरकार के नियमों और इंतजाम का यह ढांचा मूल अधिकार कुचल रहा
Date : 28-Jun-2019

हिन्दुस्तान में जब से सरकारों ने कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर को तिलस्म की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, लोगों की जिंदगी कुछ कामों में आसान हो गई, और कुछ कामों में बहुत ही मुश्किल। छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरस की पिछली भाजपा सरकार के वक्त से जमीन से जुड़े हुए सारे मामलों में पटवारी नक्शों से लेकर नामांतरण तक, और जमीन की रजिस्ट्री से लेकर नक्शे में बटांकन तक जैसे दर्जनों काम पूरी तरह कम्प्यूटर से जोड़ दिए गए, और जनता की जिंदगी तबाह हो गई। पिछली सत्तारूढ़ पार्टी के हारने की, और इस बुरी तरह हारने की कई वजहों में से एक वजह यह भी थी कि सरकार सब कुछ कम्प्यूटरों पर करने पर आमादा थी, और न तो पटवारी को कम्प्यूटर हासिल था, न उनको कम्प्यूटर पर काम करना आता था, और न ही रजिस्ट्री ऑफिस जैसी सरकारी और अवैध, दोनों किस्म की कमाई की जगह पर भी इंटरनेट काम करता था। नतीजा यह होता था कि इंसानी हाथों से काम कुछ घंटों में हो तो जाता था, आज पूरे प्रदेश में महीनों तक काम नहीं हो रहा है, और जनता की जरूरतें खड़ी हुई हैं। सरकार बदले छह महीने हो गए हैं, लेकिन अफसरों का सरकारी रूख नहीं बदला है, वे अड़े हुए हैं कि जमीन के रिकॉर्ड से जुड़े हुए सारे काम सिर्फ कम्प्यूटर के रास्ते होंगे, जो कि काम कर नहीं रहा है। अफसर इस नौबत को पटवारियों का भ्रष्टाचार जारी रखने का एक बहाना बताते हैं, और पटवारी गिनाते हैं कि सरकारी इंतजाम सिर्फ खामियों से भरा हुआ है जिसके तहत काम करना मुमकिन नहीं है। जिस तरह बस्तर में पुलिस और नक्सलियों के बीच की गोलीबारी में बेकसूर ग्रामीण-आदिवासी मारे जाते हैं, उसी तरह छत्तीसगढ़ में राजस्व विभाग के अफसरों और पटवारियों के बीच जनता की यह बदहाली हो रही है। 

छत्तीसगढ़ इस बात की सबसे बुरी मिसाल है कि राज्य सरकार लोगों के अपनी संपत्ति पर बुनियादी अधिकार को किस तरह कुचलकर रख सकती है। इस राज्य के शहरों में मास्टर प्लान के नाम पर सत्ता पर बैठे लोगों ने अपनी मनमानी से किसी की जमीन पर आमोद-प्रमोद का उपयोग तय कर दिया, किसी की जमीन पर बाजार की इजाजत दे दी, और नया रायपुर जैसे बहुत बड़े इलाकों में ऐसी मनमानी की शर्तें लाद दीं कि जिनकी पांच एकड़ भी जमीन है, वे भी अपना खुद का मकान भी उस पर नहीं बना सकते। इतने नियम लादे गए कि लोगों को भ्रष्टाचार के रास्ते से काम करवाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता बचा नहीं। इसी तरह पूरे प्रदेश में जमीन की खरीदी-बिक्री को लेकर ऐसा अंधा कानून लागू कर दिया गया था कि गरीब लोग अपनी छोटी सी जमीन किसी को बेच भी नहीं सकते थे, और कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही इस प्रतिबंध को खत्म किया, तो राज्य में दसियों हजार लोगों को अपनी संपत्ति के उपयोग का बुनियादी अधिकार मिला। 

लेकिन आज भी राजस्व विभाग के मातहत आने वाले पटवारी, तहसीलदार, और एसडीएम के दफ्तरों में गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का ऐसा जाल बिछाकर रखा गया है कि इंसान उससे बचकर कहीं निकल न जाए। सत्ता में बैठे हुए मंत्रियों और अफसरों को ऐसी पूरी सरकारी साजिश की जानकारी है, लेकिन सरकार इसे दूर करना शायद चाहती ही नहीं है क्योंकि ऐसी व्यवस्था जारी रहने से ही शहरों के एक-एक पटवारी करोड़पति होते हैं, और वे अपने तबादलों के लिए लाखों रूपए भी देते हैं। राज्य सरकार में पिछली सरकार के पूरे पन्द्रह बरस से जनता से सीधे वास्ते वाले जो सबसे भ्रष्ट विभाग रहे, उनमें स्वास्थ्य विभाग के बाद इसी राजस्व विभाग का नंबर सबसे ऊपर रहा। भूपेश बघेल सरकार को चाहिए कि आम जनता की जिंदगी से ऐसी बुरी तकलीफ को खत्म करने के लिए गैरजरूरी कागजी कार्रवाई खत्म करे, लोगों की निजी जमीन पर लगाए गए अंधाधुंध प्रतिबंध खत्म करे, और जो कम्प्यूटर-इंटरनेट व्यवस्था पूरी तरह से नाकामयाब साबित हो चुकी है, उसे पहले सुधारे, और फिर लागू करे। आज जिस तरह सरकारी अस्पतालों में मरीजों को एक से दूसरी जगह भेजकर मरीज के मरने तक दौड़ाया जाता है, ठीक उसी तरह एक-एक छोटे से बुनियादी हक के लिए आम लोग पटवारी-तहसीलदार के दफ्तर में चक्कर लगाते रहते हैं, और यह बात तो जाहिर है ही कि थके हुए लोग ही रिश्वत देने के लिए जल्दी तैयार होते हैं। 

राज्य सरकार को जमीन की खरीद-बिक्री, उसके उपयोग, मालिकाना हक के रिकॉर्ड दुरूस्त करने की सारी औपचारिकताएं बहुत आसान करना चाहिए जिसके बिना आम जनता न तो अपने इलाज के लिए जमीन बेच पाती, न बच्चों की पढ़ाई के लिए, और न ही जिंदा रहने के लिए। आज का राज्य सरकार का राजस्व नियमों और प्रक्रियाओं का सारा ढांचा घोर अमानवीय है, और यह संविधान में दिए गए एक मूल अधिकार को कुचलता भी है। जनता इनमें से किसी भी काम के लिए जब रजिस्ट्री ऑफिस, या पटवारी-तहसील तक जाती है तो उसे फिल्म मुगल-ए-आजम की एक बात याद आती है जिसमें शहंशाह अकबर अनारकली से कहते हैं- सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे...।
-सुनील कुमार

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