संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 29 जून : बाप की भीड़-हत्या के बाद  अब बेटों पर भी मुकदमा !
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 29 जून : बाप की भीड़-हत्या के बाद अब बेटों पर भी मुकदमा !
Date : 29-Jun-2019

सरकारें बड़ी बेरहम होती हैं। कुछ बरस पहले राजस्थान में भाजपा सरकार के रहते हुए अलवर में पशुओं के एक व्यापारी की गाड़ी को रोका गया था, और गायों के नाम पर गुंडागर्दी करने वालों ने पहलू खान नाम के इस व्यापारी को सड़क पर दिनदहाड़े पीट-पीटकर मार डाला था। उसके साथ मौजूद उसके बेटों ने बताया था कि उनके पास जानवरों को खरीदकर लेकर जाने के कागजात थे जिन्हें इन गुंडों ने फाड़कर फेंक दिया था। अब जब राजस्थान में कांग्रेस सरकार बने आधा बरस गुजर चुका है तब पहलू खान और उनके बेटों के खिलाफ पशु तस्करी के मामले में चार्जशीट पेश की गई है। जो भीड़-हत्या देश में साम्प्रदायिक उन्माद का एक प्रतीक बन गई थी, उसी मामले में आज कांग्रेस सरकार का यह रूख हक्का-बक्का करने वाला है। पहलू खान के कातिलों का तो पता नहीं क्या होगा, बाप को खोने वाले बेटे जरूर अब अदालत के धक्के खाएंगे। यह मामला चलाना या न चलाना पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला था, और कांग्रेस सरकार का यह रूख भयानक है। 

कांग्रेस पार्टी देश में ऐसे ही दुर्गति तक नहीं पहुंची है। उसके नेताओं का रूख कई प्रदेशों में संवेदनाशून्य रहता है, और जिस राजस्थान में अभी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह जमीन खो चुकी है, उसी राजस्थान में सरकार ने जरा भी दिल या दिमाग, किसी का भी इस्तेमाल नहीं किया कि जिस हत्या को पूरे देश में न सिर्फ कांग्रेस पार्टी ने, बल्कि तमाम गैरभाजपाई दलों ने इतना बड़ा मुद्दा बनाया था, उस हत्या पर अब मरने वाले के परिवार पर ही यह मुकदमा चल रहा है जिसे लेकर देश भर में जगह-जगह तथाकथित गौभक्त हिंसा कर रहे हैं, हत्याएं कर रहे हैं। इस एक मुकदमे के बाद अब कांग्रेस पार्टी देश भर में अपनी जुबान खो बैठेगी क्योंकि वह किस मुंह से ऐसी गौगुंडई के खिलाफ कुछ बोल पाएगी जिसे लेकर वह खुद बेकसूरों पर मुकदमा चला रही है। 

कांग्रेस पार्टी को देश भर में जमीन खोने के बाद अब एक सैद्धांतिक और राजनीतिक समझ की जरूरत है। उसे हार के सदमे से उबरकर देश के सबसे बड़े विपक्षी की हैसियत से अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए, जो कि वह नहीं कर पा रही है। आज मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष कुर्सी छोडऩे पर अड़े हुए हैं, और उनका उत्तराधिकारी तय करने का काम पार्टी कर नहीं पा रही है। राहुल गांधी के बारे में दो दिन पहले यह खबर आई थी कि पार्टी के लोगों से मुलाकात में उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया था कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब उन्होंने इस्तीफा सामने रखा तो उसके बाद भी कुछ कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने, और प्रदेश अध्यक्षों या महासचिवों ने इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की। राहुल ने इसी बैठक में मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को लेकर यह तकलीफ जाहिर की थी कि उनके मना करने पर भी ये दोनों अपने बेटों को लोकसभा चुनाव लड़वाने पर आमादा रहे, और अपने पूरे प्रदेश इसी चक्कर में खो बैठे। उनके कुछ मुख्यमंत्रियों का इशारा ऐसा लगता है कि इन दो लोगों के बारे में था, लेकिन इन दोनों की सेहत पर इस खबर का भी कोई असर पड़ा नहीं दिखता है। 

अब जब राहुल गांधी ने कुर्सी छोडऩा तय कर लिया है, तो पार्टी को भी उनसे परे, उनके कुनबे से परे, कोई अध्यक्ष तेजी से छांटना चाहिए, और पार्टी को लोकतंत्र में अपने हिस्सेदारी सक्रियता से जारी रखनी चाहिए। इस पार्टी को आज देश में साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक जिम्मेदार भूमिका के लिए अपने बुनियादी सिद्धांतों पर लौटना चाहिए। आज हालत यह है कि कल तक खबरों में राजस्थान के जिस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चल रहा था, उसी अशोक गहलोत की सरकार ने यह बेरहम मुकदमा दर्ज किया है जिसमें मरने वाले पहलू खान के बेटे अदालत में खड़े रहेंगे। ऐसी बेदिमाग और बददिमाग कांग्रेस पार्टी अधिक लंबा नहीं चल पाएगी। उसे इस उम्मीद में जीना छोडऩा होगा कि देश की जनता जब मोदी से थक जाएगी, तब उसके पास कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। 
-सुनील कुमार

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