संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 जून : ऐसी राजनीतिक हिंसा  किसी दिन आपको  भी मार सकती है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 जून : ऐसी राजनीतिक हिंसा किसी दिन आपको भी मार सकती है...
Date : 30-Jun-2019

तकरीबन हर दिन किसी न किसी राज्य में मंत्री, सांसद, विधायक की गुंडागर्दी की ऐसी खबरें आती हैं कि लगता है कि उनकी पार्टी के मन में जनता के बुनियादी हक के लिए कोई सम्मान नहीं है। ताजा मामला मध्यप्रदेश के इंदौर में विधायक आकाश विजयवर्गीय का रहा जिन्होंने खतरनाक हो चुके मकानों को गिराने के लिए निकले म्युनिसिपल अफसरों को खुद क्रिकेट बल्ले से मारा, और फिर इस प्रेरणा को पाकर उनके भाजपा के साथियों ने और अफसरों को पीटा। बात यहीं तक नहीं रूकी, जब इस बारे में उसके पिता, और भाजपा के एक बड़े दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय से मीडिया ने सवाल किया तो उन्होंने संवाददाता से ही सवाल किया कि उसकी औकात क्या है कि वह सवाल करे। इसके बाद बिना किसी के कहे ऐसी खबरें आईं कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने इस मामले पर रिपोर्ट मांगी है, लेकिन इस खबर का कोई असर दिखा नहीं। आज जब जमानत पाकर यह नौजवान विधायक जेल से निकला, तो उसका पहला ही बयान था कि उसे अपने किए हुए पर कोई पछतावा नहीं है, और वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे दुबारा बल्लेबाजी का मौका न दे।

यह बयान अपने-आपमें जमानत रद्द करने के लायक है, और यह भी हैरानी की बात है कि ऐसे बर्ताव वाले, और ऐसी ताकत वाले नेता को इस रफ्तार से जमानत मिली। उसकी रिहाई पर समर्थकों ने खुली भीड़ में खुशी के हवाई फायर किए, और जब अफसर को पीटकर वह जेल गया तो उसे सलाम करते हुए उसके पोस्टर शहर में लगाए गए। यह पूरा सिलसिला इतना बुरा है कि जरा भी सभ्य किसी राजनीतिक दल में इसे बर्दाश्त नहीं किया गया होता, लेकिन राजनीतिक दलों में धीरे-धीरे करके सभ्यता खत्म होती चली गई है। खासकर केरल और पश्चिम बंगाल दो ऐसे राज्य हो गए हैं जहां पर परले दर्जे की हिंसा, और कत्ल राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है। वैसी हिंसा के मुकाबले मध्यप्रदेश की यह ताजा हिंसा बच्चों के खेल सरीखी लगती है, और शायद भाजपा इसीलिए इसे अधिक महत्व नहीं दे रही है।

लेकिन समाज में मीडिया, सोशल मीडिया, और दूसरे संगठनों को ऐसी हर हिंसा के खिलाफ एक माहौल इसलिए बनाना चाहिए कि अगर धीरे-धीरे करके भीड़-हत्या एक संस्कृति हो जाएगी, सरकारी अफसरों पर हिंसक हमले आम हो जाएंगे, तो कानून का राज खत्म ही हो जाएगा। मध्यप्रदेश में ही मानो आकाश विजयवर्गीय से प्रेरणा पाकर एक और जिले में जिला पंचायत के निर्वाचित नेता ने अधिकारी को खूब पीटा, और लहूलुहान कर दिया, उसके सिर पर टांके लगे। जब बड़े नेता इस तरह की हरकत करते हैं, तो अदालतों को भी उन्हें आसानी से जमानत नहीं देनी चाहिए। ऐसा ही काम विधायक की जगह किसी रिक्शेवाले ने किया होता तो हो सकता है कि उसे हफ्तों-महीनों जमानत न मिली होती। राजनीतिक हिंसा की सभी किस्मों के खिलाफ लोगों को खूब लिखना चाहिए, खूब बोलना चाहिए, क्योंकि किसी दिन उनके अपने बच्चे, उनके परिवारों के लोग नेताओं की ऐसी हिंसा के शिकार हो सकते हैं।
-सुनील कुमार

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