संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 1 जुलाई : अपना हक क्या इस्तेमाल  कर लिया, लोगों को लगा कि उनका हक छिन गया!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 1 जुलाई : अपना हक क्या इस्तेमाल कर लिया, लोगों को लगा कि उनका हक छिन गया!
Date : 01-Jul-2019

ओलंपिक में भारत के लिए कुश्ती में स्वर्णपदक जीतने वाली महिला खिलाडिय़ों की जिंदगी पर बनी एक फिल्म, दंगल, में पहलवान का किरदार निभाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली एक कश्मीरी लड़की जायरा वसीम ने फिल्मों की दुनिया छोड़ दी है, और इसकी वजह सार्वजनिक रूप से सामने रखी है। उन्होंने कहा है-एक्ट्रेस बनने की वजह से वो अपने इस्लाम से दूर होती जा रही हैं।

जायरा के पोस्ट में उनका दर्द साफ झलक रहा है। उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए बताया कि पांच बरसों से वो किस तरह अपनी आत्मा से लड़ रही हैं। एक कामयाब पहचान मिलने के बाद वो खुश हैं। लेकिन ये वो पहचान नहीं है जो वो अपनी जिंदगी से चाहती हैं और इस बात का उन्हें एहसास हो गया है। लंबे समय से उन्हें ऐसा लग रहा है कि वो कुछ और ही बनने की जद्दोजहद कर रही हैं। लेकिन उन्हें एहसास हो गया है कि उनकी नई लाइफस्टाइल, फेम और कल्चर में वो खुद को फिट तो कर सकती हैं, लेकिन वो इस प्लेटफॉर्म के लिए नहीं बनी हैं। उन्हें लगता है कि फिल्म इंड्स्ट्री से जुडऩे पर वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं। लेकिन वो बीते कुछ समय से खुद को समझाने की कोशिश कर रही थीं कि वो जो कर रही हैं वो सब सही है। लेकिन उन्हें आखिरकार समझ आ गया है कि अपने धर्म इस्लाम की बताई हुई राह पर चलने में वो एक बार नहीं बल्कि 100 बार असफल रहीं हैं। जायरा ने अपने पोस्ट में यह भी बताया कि वो अपनी छोटी सी जिंदगी में इतनी लंबी लड़ाई नहीं लड़ पा रही हैं और वो बहुत सोच समझकर बॉलीवुड को अलविदा कहने का फैसला ले रही हैं। 

सोशल मीडिया पर आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष और उदार सोच रखने वाली महिलाओं में से भी कई ने उनके इस बयान के खिलाफ लिखा है, और अपनी धार्मिक आस्था को वजह बताते हुए इस तरह फिल्मों को छोडऩे की आलोचना की है। बॉलीवुड की एक मशहूर अभिनेत्री रवीना टंडन ने कुछ अधिक ही कड़ा हमला करते हुए ट्विटर पर लिखा- कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो लोग जिन्होंने महज 2 फिल्मों में काम किया है, इस इंडस्ट्री के प्रति कृतज्ञता महसूस नहीं करते हैं कि उन्हें यहां क्या-क्या मिला है। उन्होंने आगे आशा करिए कि वो शांति के साथ यहां से निकल जाएं और अपने उल्टे रास्तों पर चलने वाली सोच को खुद तक ही सीमित रखें। आमतौर पर समझदारी की बातें लिखने वाले कई और लोगों ने भी हमलावर बातें लिखी हैं। 

यह हैरान करने वाली बात है कि एक नौजवान लड़की ने इतना शानदार काम करने के बाद, राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद, इतने गरिमापूर्ण तरीके से अपने धर्म पर अपनी आस्था को अधिक महत्व देते हुए फिल्म उद्योग छोडऩे का फैसला लिया है, और उसे दो फिल्मों की अभिनेत्री इस अंदाज में कहा जा रहा है जैसे कोई दो कौड़ी का इंसान कहे। किसी की निजी आस्था उसकी अपनी है, और कॅरियर और आस्था के बीच की प्राथमिकता तय करना उनका अकेले का अधिकार है। इस हक के इस्तेमाल पर उन्हें कोसना और उनके खिलाफ ओछी और बेहूदी बातें लिखने वालों के धर्म को देखते हुए समझ आ जाता है कि उनकी नीयत क्या है। किसी समझदार युवती ने फिल्मी दुनिया के अफवाहबाज लोगों को कोई मौका दिए बिना बहुत भले शब्दों में अपनी बिदाई की वजहें गिनाई हैं, जिनमें से कोई भी बात आलोचना की हकदार नहीं है। 

कुछ ऐसा ही बुरा हाल बंगाल से अभी तृणमूल कांग्रेस की सांसद बनी एक दूसरी अभिनेत्री नुसरत जहां का भी हो रहा है। इस मुस्लिम युवती ने एक जैन नौजवान से हिन्दू रीति-रिवाज से शादी की है, और अपनी मर्जी से मांग भरी या दूसरे हिन्दू प्रतीक चिन्ह इस्तेमाल किए। इस पर दकियानूसी मुस्लिमों का टूट पडऩा तो समझ पड़ता है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय हिन्दुओं की एक फौज भी इस नौजवान सांसद पर टूट पड़ी है, और उसे मुस्लिम रिवाज ही मानने की नसीहत दी जा रही है। इन दोनों मामलों में लोगों के बर्ताव, उनकी सोच और उनकी पोस्ट देखकर एक पुरानी बात याद पड़ती है कि जब आप किसी दूसरे के बारे में फैसला करने पर उतरते हैं, तो आप उस दूसरे के बारे में कम उजागर करते हैं, अपने खुद के बारे में अधिक उजागर करते हैं। इन दोनों ही युवतियों ने अपनी धार्मिक आस्था, अपनी निजी पसंद, और अपने तौर-तरीके तय करने के हक का इस्तेमाल क्या कर लिया, दुनिया के नफरतजीवियों को लग रहा है कि उनका हक छिन गया। नफरतजीवियों के साथ-साथ जब उदार लोगों के की-पैड से भी इनके खिलाफ बातें टाईप हो रही हैं, तो कुछ अधिक तकलीफ के साथ कुछ अधिक हैरानी होती है कि, तुम भी!
-सुनील कुमार

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