संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 जुलाई : कैम्ब्रिज की एक छात्रा के उठाए कुछ बुनियादी सवालों पर क्या हिन्दुस्तान में कोई कुछ सोचेंगे?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 जुलाई : कैम्ब्रिज की एक छात्रा के उठाए कुछ बुनियादी सवालों पर क्या हिन्दुस्तान में कोई कुछ सोचेंगे?
Date : 03-Jul-2019

दुनिया भर में मशहूर ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एक श्वेत शोध छात्रा ने इस प्रतिष्ठित संस्थान को छोडऩे की घोषणा करते हुए एक लंबा बयान लिखा है जो कि यहां पर रंगभेदी-नस्लभेदी ढांचे और संस्कृति पर हमला करता है। इंडियाना सेरेसिन नाम की संपन्न परिवार से आने वाली इस छात्रा ने यहां पर अपने देखे हुए बहुत से मामलों में रंगभेद का आरोप लगाते हुए कहा कि तकरीबन पूरा विश्वविद्यालय अश्वेतों की गैरमौजूदगी बताता है, न छात्र, न पढ़ाने वाले। उसने कहा कि वह ऐसे संस्थान में शोध करने का फायदा उठाने को अनैतिक रंगभेदी फायदा मानती है, और इसलिए इस विश्वविद्यालय को छोड़ रही है। उसका कहना है कि विश्वविद्यालय से पूरे शोध कार्य के लिए उसी मिली हुई स्कालरशिप का इस्तेमाल करना उसके सिद्धांतों के खिलाफ रहेगा और इससे उसके बौद्धिक कामकाज के सिद्धांत और ईमानदारी भी खतरे में पड़ेंगे। उसने माना है कि एक श्वेत छात्रा के रूप में वह इस विश्वविद्यालय के रंगभेदी ढांचे का फायदा पाने वाली बन जाएगी जो कि वह नहीं चाहती। 

आज हिन्दुस्तान में विश्वविद्यालयों से लेकर सार्वजनिक जीवन तक, और संसद से लेकर विधानसभाओं तक, क्या कोई इस दर्जे की सैद्धांतिकता और नैतिकता की बात करते दिखते हैं? यह सवाल बड़ी दिक्कत खड़ी करने वाला है, और अधिकतर लोग इससे बचना चाहेंगे। इस देश में संसद और विधानसभाओं जिस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी गिने-चुने परिवारों से आए लोगों से भरती चली जा रही हैं, जिस तरह संपन्न तबके का एकाधिकार देश की सबसे बड़ी पंचायत पर बढ़ते जा रहा है, जिस तरह कुछ लोग पांच-पांच, दस-दस बार सांसद या विधायक बनकर अपने इलाके से बाकी तमाम लोगों की संभावनाओं को खत्म करते जा रहे हैं, क्या उनके बीच नैतिकता और सैद्धांतिकता का ऐसा कोई सवाल खड़ा किया जा सकता है? यही बात राजनीतिक दलों के संगठन के भीतर है, यही बात स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले लोगों की जाति, धर्म, उनके समुदाय के बारे में है, कुछ ऐसी ही बात हिन्दुस्तानी मीडिया के मालिकान के जाति-धर्म के बारे में है, और मीडिया के समाचार-विचार के विभागों में काम करने वाले पत्रकारों की जाति और उनके धर्म के बारे में भी है। 

दूसरे वंचित तबकों के हक को छीनकर गिने-चुने मौकों पर काबिज होने की बात हिन्दुस्तानी समाज के हर दायरे में दिखती है, इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो दिखती है वह यह कि आरक्षित वंचित तबकों के भीतर मलाईदार तबके का एक दबंग-एकाधिकार जिस तरह पूरे तबके के सारे हक अकेले निगल लेता है, उसकी अनैतिकता पर तो कोई चर्चा भी नहीं होती। इस देश में ओबीसी आरक्षण के भीतर तो मलाईदार तबके को फायदों से अलग करने की बात होती भी है, लेकिन सबसे कुचले हुए होने की वजह से आरक्षण के हकदार दलित-आदिवासी तबकों के भीतर मलाईदार-ताकतवर तबकों को हटाने की बात भी नहीं होती। और इसलिए नहीं होती कि जिन बड़े अफसरों को सरकार में ऐसा संविधान-संशोधन बनाना पड़ेगा, जिन सांसदों को संसद में, और जिन विधायकों को विधानसभाओं में इसे पास करना पड़ेगा, और जिन सुप्रीम कोर्ट जजों को ऐसे संशोधन के खिलाफ अपील सुननी पड़ेगी, वे सारे के सारे मलाईदार तबके की परिभाषा में आएंगे, और उनकी आल-औलाद आरक्षण के फायदों से बाहर हो जाएगी। हितों के ऐसे स्पष्ट टकराव का मामला होते हुए भी इनमें से किसी भी तबके से इस सामाजिक न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, जैसे सामाजिक न्याय के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की इस अकेली छात्रा ने एक बड़ा मुद्दा उठाया है, और अब तक मीडिया में भी मोटे तौर पर चर्चा से परे रहते आई ऐसी रंगभेदी-नस्लभेदी व्यवस्था पर हमला किया है। 

हिन्दुस्तान के भीतर जिन विश्वविद्यालयों के जो लोग सामाजिक न्याय के लिए लडऩे वाले जाने जाते हैं, क्या उनमें से कुछ लोग भारतीय सामाजिक-अनैतिकता की बात छेड़ सकेंगे? आगे बढ़ा सकेंगे? और ऐसी अनैतिकता का नफा पाने वाले लोगों से असुविधाजनक सवाल कर सकेंगे? और बात महज विश्वविद्यालयों की नहीं है, यह बात सभी सामाजिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, और संसदीय संस्थाओं पर भी लागू होती है जहां पर जमींदारी प्रथा चलती दिखाई पड़ती है, सामंती व्यवस्था जारी दिखती है, छुआछूत जारी दिखता है, और लोकतंत्र नदारद जान पड़ता है। 
-सुनील कुमार

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