विशेष रिपोर्ट

रायपुर, भ्रष्टाचार के साबित केस को खत्म करने बड़ी मेहनत की अफसरों ने!
रायपुर, भ्रष्टाचार के साबित केस को खत्म करने बड़ी मेहनत की अफसरों ने!
Date : 06-Jul-2019

कमाई कई गुना बढ़ाकर मान ली, और दस्तावेजी खर्च को भी अनदेखा कर दिया...

एसीबी का कारनामा सीएम की जांच के घेरे में

रायपुर, 6 जुलाई (छत्तीसगढ़)। आबकारी विभाग के एक बाबू को बचाने के लिए राज्य सरकार के ईओडब्ल्यू/एसीबी के अधिकारी किस कदर जुट गए हैं, यह हैरान करने लायक मामला है। इस संस्था के अधिकारियों ने अपने ही डाले गए छापे में मिली जानकारी के खिलाफ जाकर इस बाबू पर चल रहे अदालती मामले का खात्मा करवाने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं को जिस तरह कुचला है, उससे यह विभाग खुद ही एक अपराध करते दिख रहा है।

बिलासपुर के आबकारी विभाग के एक बाबू, दिनेश दुबे, के खिलाफ एक शिकायत के आधार पर 2017 में एक मामला दर्ज हुआ था, और इस पर 2018 में जांच का आदेश हुआ, और उसी वर्ष जांच पूरी भी हो गई। इसमें इस बाबू के पास करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति मिलना पाया गया था। लेकिन अभी पिछले पखवाड़े अचानक एसीबी में कुछ सबसे बड़े अफसरों ने एकाएक इस बाबू की फाईल का ऐसा मूल्यांकन किया कि उस पर रियायतों की बौछार कर दी, उसकी कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर उसे सही मान लिया, और उसके खर्च को एकदम जमीन पर लाकर यह साबित कर दिया कि उसकी संपत्ति अनुपातहीन है ही नहीं, और रातोंरात इसके खिलाफ चल रहे मामले का खात्मा बनाकर बिलासपुर की एक अदालत में पेश कर दिया गया। 

बिलासपुर और रायपुर में आबकारी विभाग और एसीबी के जानकार और विश्वसनीय सूत्रों से मिले कागजों के मुताबिक यह साबित होता है कि किसी शासकीय सेवक की आय और व्यय की गणना के लिए एसीबी के जो नियम हैं, उनको सबको दरकिनार करते हुए दिनेश दुबे के मामले में गणना की गई। जबकि इस कर्मचारी के बारे में आबकारी विभाग के चपरासियों ने एसीबी दफ्तर में यह लिखित जानकारी दी थी कि किस तरह नोटबंदी के दौरान 2016 में दिनेश दुबे ने उनके खातों में लाखों रूपए के हजार-पांच सौ के नोट डलवाकर बाद में उसमें से रकम निकलवा ली थी। अभी की जांच में इस तथ्य को पूरी तरह अनदेखा करके रिपोर्ट बनाई गई। 

एसीबी किसी भी शासकीय सेवक की तनख्वाह का 60 फीसदी खर्च मानता है, लेकिन इस एक मामले में इस बाबू का खर्च तनख्वाह का कुल 30 फीसदी माना गया। कागजात बताते हैं कि यह कर्मचारी 1993 से लेकर 2008 तक बिलासपुर में काम करने के लिए रायगढ़ और कोरबा से रोज आ-जाकर नौकरी करते रहा। और इसी दौरान उसने 1995 से 2008 तक अपनी नौकरी के बाहर संगीत की शिक्षा देना भी बताया है जिससे उसने 8 लाख रूपए से अधिक की कमाई बताई है। इस जांच में इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया गया है कि इस कर्मचारी ने क्या खुद संगीत कहीं सीखा था, क्या वह संगीत सिखाने में सक्षम था, और क्या दूसरे शहर से आना-जाना करते हुए, वह भी विभाग की इजाजत के बिना आना-जाना करते हुए क्या उसके लिए संगीत सिखाना संभव था? 

जानकार सूत्र बताते हैं कि जांच में यह साफ-साफ मिला था कि इस कर्मचारी ने विभाग से न तो ऐसे किसी काम को करने की इजाजत ली थी, और न ही उसने ऐसी कोई कमाई विभाग को बताई थी। जब शासकीय कर्मचारी को आयकर देने के उद्देश्य से सारी कमाई बतानी पड़ती है, तब भी दिनेश दुबे ने ऐसी कोई कमाई नहीं बताई थी। अब अचानक उसने एसीबी जांच में ऐसा दावा किया, और एसीबी ने उसे आंख मूंदकर मान भी लिया है। 

अब जब शिकायत होने के बाद एसीबी के प्रभारी भूपेश बघेल ने सामान्य प्रशासन मंत्री की हैसियत से इस मामले की फाईल बुलवाई है, तो एसीबी में हडक़म्प मचा हुआ है। ऐसा पता चला है कि रातोंरात खात्मा पेश करने वाले एसीबी बिलासपुर के डीएसपी अजितेश सिंह 15 दिनों की छुट्टी पर चले गए हैं ताकि अदालत से लेकर शासन तक के सामने कोई जानकारी देने की नौबत न रहे। यह जांच अजितेश सिंह ने ही की थी, और अभी एसीबी के डीजीपी बी.के. सिंह के आदेश से इस मामले का खात्मा भी उन्होंने ही अदालत में पेश किया है। इस बारे में पूछने पर एसीबी के आईजी का काम देख रहे, एडीजी जी.पी. सिंह ने कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है, और उन्होंने कहा कि यह मामला अदालत में है, इसलिए वे इस पर कुछ कहना नहीं चाहते। एसीबी के सूत्र बताते हैं कि जी.पी. सिंह को परे रखकर ही यह फैसला लिया गया है, और उन्हें भी इसकी जानकारी तब मिली जब खात्मा अदालत में पेश हो चुका था। 

जांच के कागजात बताते हैं कि दिनेश दुबे ने खेती से अपनी कमाई अंधाधुंध बढ़ाकर दिखाई थी, जबकि उस जमीन में परिवार के 9 लोग शामिल हैं, और आयकर कटौती के समय अगर ऐसी आय की घोषणा नहीं की जाती है, तो उसे किसी जांच के समय वैध नहीं माना जाता। 
जांच में एक और साफ गड़बड़ी को अनदेखा किया गया है जिसमें इस कर्मचारी ने एक मकान को 2011 में खरीदना बताया गया है। उसने शासन को सूचित किया था कि यह रकम उसे अपने एक पुराने मकान को करीब 20 लाख रूपए में बेचकर मिली थी, और उससे उसने यह मकान खरीदा। जांच में कागजात से यह साफ हुआ है कि उसने यह मकान दिसंबर 2013 में बेचा था, और नया मकान मार्च 2011 में खरीदा जा चुका था। अब बेचने के पौने तीन साल पहले उस रकम से मकान खरीदना कागजात में ही साबित हो रहा है। लेकिन इस बात को भी जांच में अनदेखा कर दिया गया है। 

इस आरोपी, दिनेश दुबे, की पुत्री विदेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है, लेकिन वहां उसकी फीस, हवाई जहाज से आने-जाने के खर्च को गिना ही नहीं गया है। इसी तरह एक और मकान की खरीदी के लिए रकम कहां से आई इसका कोई खुलासा इस कर्मचारी ने विभाग को नहीं दिया था, लेकिन जांच में उसे भी अनदेखा किया गया है। 

ऐसी और भी बहुत सारी रियायतों के चलते इस कर्मचारी की कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर मान लिया गया है, और उसके खर्च को लगभग गिना ही नहीं गया है। अब यह पूरा मामला मुख्यमंत्री कार्यालय की जांच का विषय बन गया है, और सरकार के बड़े-बड़े लोग इस बात पर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार में पकड़े गए और दस्तावेजी सुबूतों वाले किसी व्यक्ति को बचाने के लिए एसीबी ने इतनी रफ्तार से पूरी तरह गलत कार्रवाई कैसे की है? 

Related Post

Comments