संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 7 जुलाई : लड़कों के मन में बचपन से जमे पूर्वाग्रह मरने तक बने रहते हैं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 7 जुलाई : लड़कों के मन में बचपन से जमे पूर्वाग्रह मरने तक बने रहते हैं...
Date : 07-Jul-2019

सोशल मीडिया और असल जिंदगी में भी लड़के-लड़कियों, आदमी-औरत के बीच भेदभाव के खिलाफ लडऩे वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता ने लिखा है कि एक परंपरा खत्म करना जरूरी है, स्कूल के मंच के अतिथियों का सिर्फ बच्चियों द्वारा स्वागत करना। यह बात पिछले कई बरसों से अलग-अलग शक्लों में सामने आती है कि किस तरह जिंदगी में बंधी-बंधाई भूमिकाओं को बचपन से ही बच्चों के सामने रखते चले आने से उनका दिमाग उसी तरह काम करने लगता है, और बाकी जिंदगी वे वही उम्मीद करने लगते हैं। छोटे-छोटे बच्चों की स्कूल की शुरुआती किताबों में भी सिखाया जाता है कि लड़का पढ़ता है, लड़की खाना पकाती है, या पानी भरती है। पिता बाहर काम करता है, और मां घर का काम करती है। और बचपन से ही जो पूर्वाग्रह मन में घर कर चुका रहता है, वह कई तरह से सामने आती है। आज भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, या राष्ट्रपति के कार्यक्रम में भी उन्हें गुलदस्ता देने के लिए मेजबान या आयोजकों के हाथ में गुलदस्ता पहुंचाने का जिम्मा किसी लड़की या महिला को ही दिया जाता है, मंच पर कभी भी यह काम करते कोई लड़का या आदमी नहीं दिखेंगे। इस तरह एक सहायक का किरदार निभाते-निभाते इन्हें लोग बराबरी का दर्जा देना खत्म ही कर देते हैं। 

इस पर लिखने की जरूरत आज इसलिए भी हो रही है कि मध्यप्रदेश में वहां के पुलिस महानिदेशक वी.के. सिंह ने अभी एक तर्क सामने रखा है कि लड़कियों के अपहरण के मामले इसलिए ज्यादा हो रहे हैं क्योंकि लड़कियां स्वतंत्र ज्यादा हो रही हैं, स्कूलों में, कॉलेजों में जा रही हैं, और ऐसे में लड़कों के साथ उनका इंटरएक्शन हो रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे में वे जब घर से चली जाती हैं तब परिवार अपहरण की रिपोर्ट लिखाता है। मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार के पुलिस प्रमुख का यह बयान ऐसा रूख जाहिर करता है कि लड़कियों की स्वतंत्रता इस जुर्म के लिए जिम्मेदार है, या कि लड़कियां मर्जी से चली जाती हैं, उनका अपहरण नहीं होता। एक जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे हुए पुलिस के मुखिया को इस तरह की लापरवाह बात नहीं करना चाहिए जिसे कि उनके विभाग के मातहत अफसर और कर्मचारी दिशा-निर्देश मान लें। 

इसके पहले हमने कई केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अफसरों को देखा है जो कभी लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों को रेप के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, कभी लड़कियों के शाम को बाहर निकलने को रेप का जिम्मेदार बताते हैं, और तो और इस देश में ऐसे भी महान बकवासी हुए हैं जिन्होंने सेंवई या नूडल्स को बलात्कार के लिए वजह बताया है। कुल मिलाकर महिलाएं या लड़कियां अपने बलात्कार के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं। अभी पिछले बरस एक प्रदर्शनी लगी थी जिसमें बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के कपड़े प्रदर्शित किए गए थे जिनमें से कोई भी बदन को उघाड़कर दिखाने वाले नहीं थे, और उससे यह साबित किया गया था कि बलात्कारी किसी लड़की या महिला के खुले बदन देखकर ही उत्तेजित नहीं होते हैं। ऐसी प्रदर्शनी में रखे गए कपड़ों में छोटी बच्चियों के पहने गए फ्राक भी रखे गए थे जिससे यह खुलासा हो सके कि इतनी छोटी बच्चियों के बदन फ्राक में ढंके रहकर भी कैसे बलात्कारी को उत्तेजित कर सकते हैं? 

दरअसल भाषा के भीतर के भेदभाव से लेकर, परिवार के भीतर लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव तक बहुत सी बातें बचपन से ही लड़कों को एक अलग सोच दे देते हैं, और वे इस पर चलते हुए बड़े होने पर सोशल मीडिया पर लड़कियों और महिलाओं को बलात्कार की धमकी देते हैं, लड़कियों को ब्लैकमेल करते हैं, उनके असली या नकली वीडियो बनाकर फैलाते हैं, कामकाज की जगहों पर लड़कियों और महिलाओं का यौन शोषण करते हैं, या उन्हें दूसरी तरह परेशान करना अपना हक मानते हैं। इसलिए जिम्मेदार परिवारों को चाहिए कि बचपन से ही अपने बच्चों के सामने आदमी और औरत की अलग-अलग किस्म की जिम्मेदारियों का भेदभाव खत्म करें। लड़के और आदमी रसोई में हाथ बंटाएं, खाना परोसने में मदद करें, परिवार के दूसरे लोगों को चाय-पानी दें, और पिता जितना महत्व मां को भी दें। ऐसी बुनियाद के ऊपर समझदारी का एक ऐसा ढांचा खड़ा हो सकता है जो कि दुनिया को एक बेहतर जगह बना सके। सोशल मीडिया पर कुछ अरसा पहले ऐसे पोस्टर भी आए थे जो कि हिन्दुस्तान में किताबों की दुकान पर बिकते थे। इनमें एक अच्छी महिला या एक अच्छी लड़की की खूबियों को तस्वीरों में बताया गया था कि वे अगर घरेलू काम में एक आज्ञाकारी बनकर लगी रहती हैं, तो ही वे अच्छी हैं। समाज के साहित्य से, रिवाजों से, और रोज के व्यवहार से ऐसा भेदभाव हटाना जरूरी है। 

लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी बेटियां आमतौर पर दूसरे घरों में बहू बनकर जाती हैं, और वहां उनके साथ अगर बुरा सुलूक होगा, तो उन्हें कैसा लगेगा? उनके परिवार की महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर जाती हैं, बाहर काम करने जाती हैं, सफर करती हैं, और ऐसे में अगर उनके साथ कोई आदमी बुरा सुलूक करेगा तो उन्हें कैसा लगेगा? ऐसी मिसाल जिन पर लागू न होती हो, उनको भी यह तो सोचना ही चाहिए कि दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना हर किसी की जिम्मेदारी है। दुनिया के आज के तमाम कामों को लेकर यह सोचना चाहिए कि क्या लड़कों के लिए एक अलग दुनिया, और लड़कियों के लिए एक अलग दुनिया बनाकर दुनिया का कुछ भला हो रहा है? 
-सुनील कुमार

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