विचार / लेख

बेरोजगारों की छाती पर दौडऩे वाली...
बेरोजगारों की छाती पर दौडऩे वाली...
Date : 11-Jul-2019

गिरीश मालवीय

स्वागत कीजिए देश की पहली प्राइवेट ट्रेन का! जी हां, दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली तेजस एक्सप्रेस देश की पहली प्राइवेट ट्रेन होगी।  जो उन हजारों बेरोजगारों की छाती पर से दौडऩे वाली है, जो सरकारी रेलवे में नौकरी का सपना संजोए बैठे हुए हैं।
इंडियन रेलवे कोई छोटी-मोटी संस्था नहीं है। भारतीय रेलवे 12,000 से अधिक ट्रेनों का संचालन करता है, जिसमें 2 करोड़ 30 लाख यात्री रोज यात्रा करते हैं। भारतीय रेल लगभग एक ऑस्ट्रेलिया को रोज़ ढोती है।  रेलवे में करीब 17 लाख कर्मचारी काम करते हैं और इस लिहाज से यह दुनिया का सातवां सबसे ज़्यादा रोजग़ार देने वाला संस्थान है। इस लिहाज से इसका निजीकरण किया जाना ऐसे प्रश्न खड़े करता है जिस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
यदि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में निजीकरण की तरफ बढऩे की गति 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 थी तो मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में यह गति 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256 की तरह होने वाली है। केंद्र सरकार ने तमाम विरोध के बीच आखिरकार रेलवे के निजीकरण की ओर दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार पकड़ ली है।  सरकार रेलवे के कॉरपोरेटीकरण और निजीकरण पर आक्रामक तरीके से आगे बढऩा चाहती है। 
मोदी-1 में 2014 सितम्बर में, भारतीय रेल में वित्त जुटाने की सिफारिशें देने के लिए, भारतीय रेल ने बिबेक देबरॉय समिति का गठन किया था। जून 2015 को प्रस्तुत बिबेक देबरॉय समिति की रिपोर्ट में रेलवे के निगमीकरण की सिफारिश की गई थी और कहा गया था कि सरकार के रेल मंत्रालय को सिर्फ नीतियां बनाने का काम करना चाहिए, जबकि निजी खिलाडिय़ों को यात्री व माल सेवा प्रदान करनी चाहिए।  कमेटी की सिफ़ारिशों में तर्क दिया गया कि ब्रिटेन की तरह ट्रेन संचालन के काम को पटरियों से अलग कर देना चाहिए।
इस समिति की सिफारिशों के रेलवे कर्मचारियों ने पुरजोर विरोध किया, पीएम मोदी ने भी साल 2015 में वाराणसी के डीजल लोको वक्र्स के मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाएगा।
लेकिन जैसे ही मोदी सरकार दुबारा चुनकर आई उसने सबसे पहला जो काम किया वह यह था कि तेज गति से रेलवे के निजीकरण ओर, निगमीकरण की ओर आगे बढ़ा जाए। इसके तहत रेलवे बोर्ड से एक एक्शन प्लान-100 तैयार करने को कहा गया, जिस पर 100 दिन के भीतर ही कार्रवाई करने के आदेश दिए गए। इसके तहत आइआरसीटीसी को लखनऊ से दिल्ली सहित दो रूटों पर निजी क्षेत्र की मदद से प्रीमियम ट्रेन चलाने और रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली, कपूरथला सहित सभी प्रोडक्शन यूनिटों का निगमीकरण का लक्ष्य रखा गया है।
लेकिन रेलवे के निजीकरण करने में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। 
कोई भी प्राइवेट ऑपरेटर घाटे वाले ट्रेक पर गाडिय़ां नहीं दौड़ाएगा। वो उसी ट्रेक पर ऑपरेट करेगा जो जेब भरे पर्यटकों के रूट हो यानी निजी पूंजीपति सिर्फ रेलवे के मुनाफ़ेदार रास्तों में ही रुचि रखेंगे, जो माल ढोने में या बुलेट रेलगाडिय़ों जैसी अमीरों के लिए सेवा में होगा। भारतीय रेल के पास सिर्फ घाटे में चलने वाले रेलमार्ग बचेंगे, जिसमें करोड़ों लोग कम भाड़े में अमानवीय परिस्थिति में यात्रा करेंगे। यही मोदी सरकार की योजना है जिन रेल कोच फैक्टरियों का निगमीकरण किया जा रहा है वह लगातार मुनाफा कमा रही थी।
यह निगमीकरण ओर निजीकरण रेलवे को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। यह तथ्य हम जितना जल्दी समझ ले उतना अच्छा है।

 

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