संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 12 जुलाई : अब बाकी सारे अभियुक्त भी बीएसपी घूमने आ सकते हैं..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 12 जुलाई : अब बाकी सारे अभियुक्त भी बीएसपी घूमने आ सकते हैं..
Date : 12-Jul-2019

देश के एक बड़े स्टील निर्माता नवीन जिंदल को कल केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र ने जिस तरह अपने कारखाने का दौरा करवाया है वह हैरान करने वाला है। नवीन जिंदल पर केन्द्र सरकार की ही जांच एजेंसी सीबीआई मुकदमा चला रही है कि उन्होंने रिश्वत देकर, गलत तरीके से केन्द्र सरकार से कोयला खदान हासिल की। इस मामले में अपनी कंपनी के सभी बड़े अफसरों के साथ नवीन जिंदल जमानत पर रिहा हैं। केन्द्र सरकार के भला कौन से उपक्रम की यह समझदारी कही जाएगी कि वह केन्द्र सरकार के खिलाफ साजिश करके, भ्रष्टाचार से खदान हासिल करने वाले को मेहमान बनाकर अपना कारखाना दिखाए? और यह बात उस वक्त अधिक गंभीर हो जाती है जब अंतरराष्ट्रीय खुले बाजार में भिलाई इस्पात संयंत्र और नवीन जिंदल एक-दूसरे के मुकाबले खड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि एक वक्त जब बीएसपी के एमडी विक्रांत गुजराल थे, और बीएसपी रेलपांत बनाने के काम में सबसे आगे थी, तब जिंदल ने रेलपांत बनाना शुरू किया था, और गुजराल बीएसपी को छोड़कर जिंदल की नौकरी में चले गए थे, और आज तक उसी कंपनी में हैं। उस वक्त भी ये आरोप लगे थे कि गुजराल ने बीएसपी के मुखिया रहते हुए जिंदल के इंजीनियरों को रेलपांत बनाने की तकनीक दिखाई थी, जिसका फायदा जिंदल को मिला। 

आज जब मोदी सरकार एक-एक करके बहुत से सार्वजनिक उपक्रम बेचने की अपनी नीयत और तैयारी खुलकर बता चुकी है, तब बीएसपी को इस तरह एक दूसरे कारोबारी के सामने खोलकर रख देना किसी तरह का शिष्टाचार नहीं है, यह सीधे-सीधे बीएसपी के हितों के खिलाफ एक साजिश है, फिर चाहे इसका फैसला किसी भी स्तर पर क्यों न लिया गया हो। लोगों को याद है कि एनडीए और यूपीए सरकारों के वक्त जब एक-एक करके निजी फोन कंपनियां बाजार में आ रही थी, तो किस तरह सरकारी टेलीफोन कंपनी को आधुनिकीकरण में सोच-समझकर सुस्त रखा गया था, और उसे घाटे की कंपनी बनने पर मजबूर किया गया था। जब निजी विमान सेवाएं चालू हुईं, तो उन्हें मुनाफे के रास्ते दिए गए, और सरकारी विमान कंपनी को कोशिश करके घाटे में लाया गया। वहां से लेकर छत्तीसगढ़ में राज्य परिवहन निगम बंद करने के पहले जोगी सरकार के वक्त जो नौबत लाई गई, उसके चलते सरकारी बसें घाटे में आईं, और निजी बसों का धंधा आसमान पर पहुंच गया। कुछ और आगे बढ़कर देखें तो जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ में निजी अस्पताल बढ़ते चले गए, वैसे-वैसे सरकारी चिकित्सा ढांचे को कमजोर किया गया, बिगाड़ा गया, ताकि लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हों। इसके बाद सरकारी चिकित्सा बीमा योजना में सारे निजी अस्पतालों को शामिल करके सरकारी अस्पतालों को एक किस्म से अप्रासंगिक ही बना दिया गया कि जनता को तो बीमे के तहत निजी अस्पतालों से इलाज मिल ही रहा है। 

सरकार को सोच-समझकर घाटे में लाने की यह योजना कोई नई नहीं है। जिस बीएसपी से जिंदल उसका एमडी छीनकर ले गया था, उसी बीएसपी में उसी जिंदल के लिए लाल कालीन बिछाकर स्वागत करना वहां के अफसरों की नीयत उजागर करता है, और हो सकता है कि इसके पहले दिल्ली की मंजूरी भी रही हो। यह समझने की जरूरत है कि नवीन जिंदल के अपने कारखाने बिक गए हैं, जिन्हें उनके भाई ने ही खरीदा है। ऐसे में इतनी बड़ी बीएसपी को किस उम्मीद से जिंदल के सामने पेश किया जा रहा है? नेहरू के बनाए हुए देश के इस पहले सबसे बड़े औद्योगिक तीर्थ को एक पशु बाजार में पशु कारोबारी के सामने खड़ा कर दिया गया है, और मानो नवीन जिंदल इसकी देह को टटोलकर इसमें गोश्त का अंदाज लगाने आया हुआ हो। इसके बाद देश में केन्द्र सरकार द्वारा अपराधी साबित करने के लिए जितने लोगों को कटघरे में खड़ा किया गया है, वे भी जमानत मिलने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र आकर मांग कर सकते हैं कि उन्हें भी कारखाना घुमाया जाए। भारत का संविधान दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव की इजाजत नहीं देता है, यह एक अलग बात है कि जिन लोगों पर अब तक केन्द्र सरकार के साथ साजिश और भ्रष्टाचार करने का मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, और जिन्हें जमानत लेने की जरूरत नहीं पड़ी है, उन लोगों को बीएसपी के अफसर घुमाने से मना भी कर सकते हैं। 
-सुनील कुमार

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