विचार / लेख

मरीजों-डॉक्टरों की यह दुश्मनी
मरीजों-डॉक्टरों की यह दुश्मनी
Date : 12-Jul-2019

-कुमार प्रशांत
क्या आपको याद है कि अभी-अभी कोलकाता से एक मेडिकल वायरस चला था जो देखते-देखते सारे देश में फैल गया था? सभी इंतजार करते रहे कि कोई आला डॉक्टर आएगा और हमें बताएगा कि कहां से आकर, कहां तक फैला है, यह वायरस ! इसके पीछे-पीछे राजनीतिक बदबू क्यों फैली है? किसी ने इन सवालों का कोई जबाव तो नहीं दिया, लेकिन, धीरे-धीरे डॉक्टरों के झुंड-के-झुंड इसके शिकार होते गए।  वायरस का नाम था - 'डॉक्टरोसेफलाइटिस' !  
कहानी इतनी ही थी कि कोलकाता में किसी डॉक्टर की, किसी मरीज के परिजन ने पिटाई कर दी ! बस, 'डॉक्टरोसेफलाइटिस' पैदा हुआ और देखते-देखते देश भर के डॉक्टर इसकी चपेट में आ गये। डॉक्टर की पिटाई बहुत बुरी बात है। पिटाई के कारणों में गए बिना भी कहा जा सकता है कि किसी भी हाल में, किसी पर हमला करना, किसी की मार-पिटाई करना एकदम अस्वीकार्य है। यह मनुष्यता को नीचे गिराने जैसा है। डॉक्टरी पेशे के कारण मिली ताकत से कोई डॉक्टर किसी मरीज की 'पिटाई' करे या मरीज या उसके परिजन अपने मनमाफिक न होने के कारण किसी भी तरह की हिंसा करें, यह समान रूप से निंदनीय है।
लेकिन एक डॉक्टर की पिटाई का बदला हजारों डॉक्टर मिलकर मरीजों को और उनके परिजनों को पीट कर लें, यह भी पूर्णत: अस्वीकार्य है। अपराध एक का और सजा दोषी-निर्दोष का विवेक किए बिना सबको, यह किस तरह सही हो सकता है ? हर सांप्रदायिक दंगा, हर जातीय उन्माद यही तो करता है ! यह इसलिए भी नहीं कहा जा रहा कि डॉक्टरी एक 'नोबल प्रोफेशन' है, कि यह सेवा का क्षेत्र है। नहीं, यह आज पूर्णत: व्यापार-धंधा है जिसकी सारी नैतिक भित्ती एक-एक कर ढह चुकी है। इस खंडहर में यदि कोई कहीं है जो सेवा की लौ जलाए बैठा है तो वह उसकी निजी पसंद है, उसके पेशे का स्वभाव नहीं है। 
चिकित्सा के व्यापार-धंधे में लगे दूसरे डॉक्टर, अपने बीच के ऐसे डॉक्टरों को पसंद नहीं करते हैं, उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। मनुष्य के सबसे कमजोर क्षणों से जुड़ा यह पेशा आज सबसे कुटिल व हृदयहीन पेशा बन चुका है, लेकिन हम सिर्फ  डॉक्टरों से ऐसी शिकायत कर सकते हैं क्या?  जब इतने बड़े बहुमत से बनी सरकार ने 'मॉब लिंचिंग' को कानून-व्यवस्था बनाये रखने के आम प्रशासनिक ढांचे में शुमार कर लिया है, तब डॉक्टर-मरीज एक-दूसरे का इलाज 'मॉब लिंचिंग' से करें, तो हैरान होने जैसा क्या है?
डॉक्टर और मरीज का रिश्ता एक अजीब-सी बुनियाद पर खड़ा है। लोग चाहते हैं कि वे शरीर के साथ जैसी भी चाहें मनमानी करें, जो भी चाहें खाएं-पीएं, जैसे चाहें रहें-चलें, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ हो ही नहीं कि जिससे उनके मस्त जीने में खलल पड़े! 'खाना, पीना, ऐश करना'- आज का जीवन-मंत्र बन गया है। यह सरासर गलत ही नहीं, अवैज्ञानिक भी है, शरीर-शास्त्र के विपरीत जाता है। डॉक्टर बना या बनने की युक्ति में लगा यह जो आदमी हमारे सामने, गले में स्टेथस्कोप डाले खड़ा है, यह भी इसी धकमपेल में से पैदा हुआ है। इसके लिए हर आदमी एक मौका है, शिकार है कि जिसे वह कहता है कि तुम चाहे जैसे रहो, जो करो, जो खाओ-पियो चिंता नहीं, हम तुम्हें ठीक कर देंगे, काम के लायक बना कर रखेंगे। शर्त बस इतनी है कि इसका जो खर्च मैं मांगूं, वह देते जाना। यह समीकरण एकदम ठीक चलता है। इस धकमपेल में दोनों ने अपनी-अपनी सुविधा का रास्ता बना लिया है।
परेशानी वहां खड़ी होती है जहां इसमें एक वह तत्व आ जुड़ता है जो बीमार है। वह इलाज के लिए डॉक्टर चाहता है, लेकिन उसकी गांठ ढीली है। अब सामने डॉक्टर तो कहीं है नहीं, जो है वह तो 'ले और देÓ वाले समीकरण का एक खिलाड़ी है। वह बीमार को देख कर खुश होता है, उसकी जेब देख कर नाक-भौं सिकोड़ता है। आखिर डॉक्टर-मरीज के बीच की तनातनी अधिकांशत: सरकारी अस्पतालों में क्यों होती है ? देश के सभी सरकारी अस्पतालों की हालत ऐसी है कि वहां स्वस्थ आदमी भी बीमार हो जाए! काम करने वाले डॉक्टरों, स्टॉफ, नर्स आदि से लेकर मरीजों और उनके परिजनों तक के लिए कम-से-कम बुनियादी सुविधाएं भी वहां उपलब्ध नहीं हैं। 
बीमार सरकारें खुद को जिंदा रखने में ही इस कदर व्यस्त हैं कि बीमारों की यह दुनिया उनके यहां दर्ज भी नहीं होती। फिर भी अस्पताल चलते हैं, हजारों जरूरतमंद रोज इन दरवाजों तक पहुंचते हैं। एक तरफ  तनावग्रस्त, ऊबा हुआ, अपनी जरूरतों के नाकाफी होने से त्रस्त अस्पताल और डॉक्टर है तो दूसरी तरफ  बीमारी से टूटा हुआ, साधनहीनता के दबाव से निराश, हताश मरीज व उसके परिजन! जब ये दोनों रूबरू होते हैं तो किसी में, किसी के प्रति सम्मान या सहानुभूति का एक कतरा भी नहीं होता। मरीज के प्रति अमानवीयता की हद तक कठोर और डॉक्टरों के प्रति अमानवीयता की हद तक हिकारत-ऐसे दो प्राणियों का यह आमना-सामना सुखद कैसे हो सकता है ? नतीजा हर तरह की कुरुपता में सामने आता है।
डॉक्टरों की हड़ताल उनकी और भी खुदगर्ज तस्वीर बनाती है। मारपीट की घटनाएं निंदनीय हैं, सख्त कार्रवाई की मांग करती हैं, लेकिन यह कार्रवाई कौन करे? डॉक्टर करें कि प्रशासन? सरकारी अस्पतालों में प्रशासन की जिम्मेवारी है कि वह अस्पताल और कर्मचारियों की सुरक्षा करे। अस्पताल की जिम्मेवारी है कि उसका हर घटक मरीजों से इस तरह पेश आए कि उसके बीमार मन में कृतज्ञता का भाव पैदा हो। सरकार की जिम्मेवारी है कि वह जन-स्वास्थ्य केन्द्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया कराए तो डॉक्टरों की जिम्मेवारी है कि वे मरीज से मशीनी नहीं, मानवीय रिश्ता बनाएं। मरीज और उनके परिजनों की जिम्मेवारी है कि वे डॉक्टरों को भगवान नहीं, अपना सहायक इंसान मानें और उस नाते वह सारा सम्मान दें जो एक इंसान को दिया ही जाना चाहिए। ऐसा हुआ तो आप पाएंगे कि टकराहट के अधिकांश कारण खत्म हो गए हैं। इस पर भी किसी ने, किसी के साथ गलत किया तो उसे कानून के हवाले किया ही जा सकता है। 
अब एक बड़ा सवाल डॉक्टरों से पूछना बाकी रह जाता है। आपका काम बीमार का इलाज करना भर नहीं है। आपका काम है कि आप ऐसा इलाज करें कि मरीज को दोबारा आपके पास आने की सामान्यत: जरूरत ही न पड़े। आप मरीज को एटीएम मशीन न समझें, मरीज आपको नया 'शायलॉक' न समझे। ऐसा कैसे हो? बीमार का स्वास्थ्य उसकी मु_ी में ला देना, यही डॉक्टर की सही भूमिका है, लेकिन डॉक्टर करते क्या हैं? वे मरीज को सदा-सर्वदा के लिए अपनी मु_ी में रखना चाहते हैं। यह चिकित्सा के धंधे का 'वोट बैंक' है। वोट बैंक की राजनीति की तरह यह भी अनैतिक है। जब तक यह चलेगा, डॉक्टरों को कोई भी संरक्षण नहीं दे सकेगा और न सामान्य जन का कभी इलाज ही हो सकेगा। स्वास्थ्य का स्वावलंबन और स्वावलंबन के लिए चिकित्सा ही इसका सही इलाज है। (सप्रेस)
(लेखक गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं।)

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