संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 जुलाई : स्कूलों में अंडे का विरोध, एक जरूरत के खिलाफ खड़ी सामाजिक जटिलता
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 जुलाई : स्कूलों में अंडे का विरोध, एक जरूरत के खिलाफ खड़ी सामाजिक जटिलता
Date : 14-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अंडे को लेकर एक विवाद चल रहा है कि स्कूलों में दोपहर के भोजन में बच्चों को अंडा दिया जाए, या नहीं? हिन्दू समाज के एक बहुत छोटे हिस्से, और जैन समाज को अंडे से परहेज है। कुछ लोगों का परहेज पिछले कुछ दशकों में घट गया है क्योंकि अंडे के हिमायती बताते हैं कि अब वह मांसाहारी नहीं रह गया क्योंकि अब उससे बच्चे नहीं निकलते, इसलिए वह शाकाहारी हो चुका है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में यह विरोध एक बिल्कुल ही अलग तबके की तरफ से शुरू हुआ है, कबीरपंथियों की तरफ से। अंडे का विरोध जैन या ब्राम्हण करते, या मारवाड़ी करते तो वह अधिक स्वाभाविक लगता, लेकिन कबीरपंथियों की तरफ से यह विरोध लोगों को थोड़ा चौंका गया है, इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि संपन्न शहरियों को शायद कबीरपंथ में प्रचलित मान्यताओं की जानकारी कम थी। 

खैर, जो भी हो, आज मुद्दा यह है कि स्कूली बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए उन्हें दोपहर के भोजन में अंडा देना ठीक है, या नहीं? मामला थोड़ा जटिल है। स्कूलों के भोजन में एक समय इस बात को लेकर एक तबके का विरोध चल रहा था कि खाना पकाने के लिए किसी दलित महिला को न रखा जाए। फिर हिन्दुस्तान के कुछ हिस्सों में कुछ समय तक यह विरोध भी चला कि सवर्ण बच्चे दलितों बच्चों के साथ एक पंगत में बैठकर कैसे खाएंगे? और कैसे उन्हीं थालियों का इस्तेमाल करेंगे जो कि पिछले दिन जाने किस जाति के बच्चे ने इस्तेमाल की होगी। यह मामला अब कम से कम अधिक जगहों पर तो सुनाई नहीं पड़ता है, और सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले, आमतौर पर गरीब बच्चे सभी बिना किसी जाति-धर्म के हल्ले के, किसी का भी पकाया हुआ, किसी के भी साथ बैठकर खाने लगे हैं। एक समाजशास्त्री का यह निष्कर्ष था कि भिलाई जैसे कारखाने वाले शहर में सार्वजनिक उपक्रम बीएसपी में जाति व्यवस्था की तंगदिली कमजोर थी, लेकिन उसी भिलाई के निजी कारखानों में उसी दर्जे के मजदूरों के बीच वह कायम थी। हो सकता है कि हिन्दुस्तान के सरकारी स्कूलों में दोपहर के भोजन के चलते इस पीढ़ी से जाति व्यवस्था कमजोर हो रही हो, और महंगी निजी स्कूलों में सवर्ण बहुतायत की वजह से वह मजबूती से जारी हो। 

अब सवाल यह उठता है कि कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा दिया जाए या नहीं? देश के कई हिस्सों में यह व्यवस्था चले आ रही है, और राजनीतिक ताकतों से परे इसका कोई विरोध भी नहीं हुआ। वैसे भी यह स्कूली खाने में एक अतिरिक्त सामान ही रहने जा रहा है, जिन बच्चों को अंडा खाना हो वे खाएं, और जिन्हें न खाना हो वे न खाएं। लेकिन जिन परिवारों को अंडे से परहेज है, उनके लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि बाकी बच्चों को अंडा खाते देखकर उनके बच्चे भी वैसा करने लगें, तो पारिवारिक प्रथा टूट जाएगी। लेकिन देखादेखी अगर कोई प्रथा टूटनी है, तो वह तो महंगे स्कूलों में घर से टिफिन में मांसाहार लेकर जाने वाले बच्चों के शाकाहारी परिवारों के बच्चों पर असर से भी टूट सकती है। जहां तक कुपोषण से लडऩे का सवाल है तो शाकाहारी तबका मांसाहारी लोगों के तर्क मानने से वैसे भी इंकार कर देता है कि कुछ जरूरी तत्व सिर्फ मांसाहार से मिल सकते हैं। शाकाहारी लोग मांसाहार का विकल्प ढूंढ ही लेते हैं, लेकिन उसके लिए उनकी खर्च की ताकत होना जरूरी रहता है। 

सरकारी स्कूलों में उन इलाकों के कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा खिलाने पर बाकी लोगों का विरोध फिजूल का है। स्कूल का सारा खाना अंडे का नहीं रहेगा, और जो बच्चे उसे न खाना चाहते हों, वह बाकी खाना खा सकते हैं। जब गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है, तो स्कूलों के खाने के रास्ते ही उनकी मदद की जा सकती है। और बाकी बच्चों में इसके लिए एक बर्दाश्त विकसित करना जरूरी है। आज पूरे हिन्दुस्तान में जिस तरह से खानपान को लेकर कुछ लोगों को हिंसक तेवर सड़कों पर दिखते हैं, उन्हें देखते हुए खाने की अलग पसंद रखने वाले लोगों के साथ जीना भी आना चाहिए। आज देश के कुछ राज्यों में हिन्दूवादी सरकारों ने खानपान तैयार करने का जिम्मा ऐसे धार्मिक या शाकाहारी संगठनों को दे दिया है जिन्होंने स्कूल के खाने से प्याज-लहसुन तक अलग कर दिया है। हिन्दू या जैन समाज के एक बहुत छोटे तबके की खानपान की पसंद को बाकी लोगों पर इस तरह लादना ठीक नहीं है। विज्ञान के मुताबिक अब अंडा शाकाहारी माना जाता है, और उससे एक आक्रामक परहेज उन लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जो कि कुपोषण के शिकार हैं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज किसी धर्म के, कुछ जातियों के, या मांसाहार करने वाले लोगों को देश के अधिकतर शहरों में कई रिहायशी इलाकों या इमारतों में मकान नहीं मिल पाते। इस आक्रामकता की धार को वैज्ञानिकता से ही कम किया जा सकता है, और स्कूलों में अंडा देना इसकी एक बुनियादी शुरुआत हो सकती है। लोगों के सामाजिक संस्कारों को देखते हुए यह जरूर ध्यान देना चाहिए कि अंडा पकाने और खिलाने का काम उन्हीं बच्चों के लिए हो जो उसे चाहते हों। और ऐसा तो आज किसी भी रेस्त्रां में होता ही है कि वहां मांसाहार भी बनता है, और शुद्ध शाकाहारी भी वहां जाकर अपनी मर्जी का शाकाहारी खाना खाते हैं। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments