संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,17 जुलाई : चापलूस विशेषणों के सैलाब  से लेकर यादों की बारात तक
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,17 जुलाई : चापलूस विशेषणों के सैलाब से लेकर यादों की बारात तक
Date : 17-Jul-2019

दुनिया में आए दिन सरकारी या समाजसेवी संगठनों के खर्च से कोई न कोई बैठक या कांफ्रेंस चलती ही रहती है। जो लोग इन पर समय गंवाने में अधिक भरोसा नहीं करते, उन्हें भी बीच-बीच में कभी शिष्टाचार के चलते, तो कभी किसी और वजह से इनमें जाना पड़ता है। और जो लोग समाज में जितने अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, उनमें से अधिकतर को उतनी ही अधिक बैठकों में शामिल होना पड़ता है। इस तरह कुल मिलाकर बैठकें अपरिहार्य हैं, जिनसे बचा नहीं जा सकता, और जिनके बारे में यह सोचना बेहतर होगा कि उन्हें अगर होना ही है, तो इस तरह इनकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। 

किसी बैठक में अगर किसी नेता या बड़े अफसर को आना है, तो यह खतरा बने रहता है कि वे देर से आकर उन तमाम लोगों का वक्त बर्बाद करें जो आदतन समय पर पहुंचते हैं, और अक्सर ही अपने वक्त की ऐसी बर्बादी झेलते हैं। इसके बाद जब सबसे ऊंची कुर्सी पर कोई काबिज हो चुके रहते हैं, तो स्वागत का सिलसिला शुरू होता है जिसमें तमाम किस्म के झूठे विशेषणों के साथ खासी मात्रा में चापलूसी मिलाकर मौजूद बड़े लोगों को उनके असल कद से और बहुत बड़ा दिखाते हुए फूलों को बर्बाद किया जाता है। यह सिलसिला खत्म होने के बाद जब काम की कोई बात शुरू होने का मौका आता है तो बोलने वालों में से जो जितने बड़े होते हैं, वे यादों में उतना ही गहरा गोता लगाते हैं, और सुनने वालों पर अपने संस्मरणों का गैरजरूरी पानी उलीच देते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी सम्मेलन या बैठक का मुद्दा धरे रह जाता है, और बोलने वाले वही बोलते हैं जो अपनी जिंदगी के बारे में वे बोलना तय करके आते हैं, फिर चाहे कांफ्रेंस के बैनर पर कोई भी विषय लिखा हो। बड़े लोगों की यादों के बड़े और लंबे कारवां को बाकी लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनने का नाटक करते हैं, और जिन्हें ऐसे नाटक में कोई दिलचस्पी नहीं होती उनका वक्त और बर्बाद होते चलता है। हालांकि यादों की बारात देखते हुए सिर हिलाने और आखिर में तालियां बजाने का मौका चापलूसों या मातहतों के लिए खासा मायने रखता है, और वे उसे चूकना नहीं चाहते। 

किसी बड़ी बैठक या सम्मेलन में हर किसी के बोलने का वक्त भी तय रहता है, लेकिन जब लोग बोलना शुरू करते हैं, तो वे यह मानकर चलते हैं कि उनकी कही बातें इतना मायने रखती हैं कि मौजूद लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे दुगुने वक्त तक उन्हें सुनें। नतीजा यह होता है कि विषय की गाड़ी पटरी से ऐसे उतरती है कि कोई एक व्यक्ति ऐसे इंजन-डिब्बों को उठाकर फिर पटरी पर ला भी नहीं पाते। दिक्कत यह होती है कि जिन लोगों को अमूमन मंच और माईक पर से बोलना होता है, उन्हें कभी बोलना सिखाया नहीं जाता, कभी रोका-टोका नहीं जाता, और नतीजा यह होता है कि वे अपने कहे में मुद्दे की बात से परे खासी बर्बादी अपने वक्त की भी करते हैं, और बाकियों के वक्त की भी। आमतौर पर कांफ्रेंस टीवी पर चल रहे उस अकेले चैनल जैसी हो जाती है जिसमें आगे शायद कुछ जरूरी आएगा मानकर बहुत सारा कूड़ा बर्दाश्त करना होता है। 

कम से कम सरकारों को, और राजनीतिक संगठनों को अपने लोगों को चुस्त, प्रासंगिक, और रोचक बोलना सिखाना चाहिए ताकि वे सरकार, पार्टी, या किसी और संगठन का नजरिया ठीक से सामने रख सकें। कुछ संगठन अपने सदस्यों के लिए मंच पर से बोलना सिखाने की ट्रेनिंग रखते हैं, और सरकार में भी, राजनीतिक दलों में भी ऐसी ट्रेनिंग जरूरी है। टीवी पर राजनीतिक दलों के बहुत से ऐसे औसत प्रवक्ता या प्रतिनिधि पहुंच जाते हैं जो कि यादों और संस्मरणों की नाव पर बहस को पार कर लेना चाहते हैं। कुछ बड़े वकील अपनी पार्टियों की बात को रखते हुए उसे ऐसा जटिल कानूनी बनाने में जुट जाते हैं कि मानो किसी छोटी अदालत के साधारण ज्ञान वाले जज को अपने ज्ञान के आतंक से दहशत में ला रहे हों। जनता के बीच न तो गैरजरूरी यादों का कोई असर होता, न ही गैरजरूरी तकनीकी-तर्कों का। इसलिए किसी कांफ्रेंस या बैठक से लेकर प्रेस कांफ्रेंस या टीवी बहस तक तमाम लोगों को यह सीखना और सिखाना चाहिए कि सीमित समय में मुद्दे की बात कैसे कही जाए, और कैसे महज मुद्दे की बात कही जाए। पटरी से उतरकर बोलना किसी मौके को बर्बाद करने से कम नहीं रहता। ऐसी बहुत सी कतरा-कतरा बातें हैं जो कि लोगों का वक्त बर्बाद होने से बचा सकती हैं, और लोगों की कही बातों को असरदार भी बना सकती हैं। चापलूस विशेषणों के सैलाब से लेकर यादों की बारात तक, सबमें भारी कटौती की जरूरत है, और यह बात हर संगठन को, हर सरकार को अपने लोगों को खूब अच्छी तरह सिखाना चाहिए।
-सुनील कुमार

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