संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जुलाई : सुप्रीम कोर्ट हौसला जुटाकर,  दिल कड़ा करके फैसला दे अयोध्या मालिकाना हक पर
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जुलाई : सुप्रीम कोर्ट हौसला जुटाकर, दिल कड़ा करके फैसला दे अयोध्या मालिकाना हक पर
Date : 18-Jul-2019

अयोध्या मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का यह रूख सामने आया है कि इसकी सुनवाई करने वाले जज अगर रिटायर भी हो जाते हैं, तो भी वे इस केस के खत्म होने तक जज बने रहेंगे, और सुनवाई करते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की कही हुई यह बात खबरों में सामने आई है, और कभी-कभी ऐसा भी होता है अदालतें अपनी कही हुई बातों को किसी आदेश या फैसले में शामिल नहीं करती हैं, या कभी-कभी फैसले में फेरबदल भी कर देती हैं। जो भी हो, आज तो हम यहां यह मानकर लिख रहे हैं कि अदालत इस बार अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को निपटाने के इरादे में दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह रूख अच्छा है कि अयोध्या की सुनवाई करने वाले जज फैसले तक रिटायर नहीं होंगे, क्योंकि नए जजों के आने पर मामले की फिर से सुनवाई भी होने लगती है। और हो सकता है कि अदालत का यह रूख ऐसे कुछ और मामलों में भी काम का साबित हो, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अभी हाल में ही प्रधानमंत्री को लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ानी चाहिए क्योंकि अदालतों में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और मामलों के पहाड़ खड़े हुए हैं। 

मामला आजादी के पहले से हिन्दू और मुस्लिम लोगों के बीच झगड़े और दावे की शक्ल में चले आ रहा है, और अंग्रेज सरकार से होते हुए वह आजादी के बाद नेहरू सरकार के सामने भी रहा, और अदालत में इसे ले जाने वाले लोगों में से भी कुछ लोग मर-खप गए हैं। ऐसे में इस विवाद का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने वाले लोगों को इसकी शक्ल में एक बहाना मिलता है, और वे हर चुनाव में, या हर मौके पर इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को हिम्मत जुटाकर, दिल कड़ा करके इस मामले को निपटाना चाहिए। इस बारे में यह समझ लेना जरूरी है कि यह किसी धार्मिक आस्था के झगड़े के निपटारे का मामला नहीं है, यह महज जमीन पर मालिकाना हक का मामला है। 

लंबे समय तक हिन्दुस्तान में बहुत से अमन-पसंद लोग यह मानते रहे कि इस मामले का कोई अदालती इलाज न निकालना ही सबसे बेहतर इलाज है। ऐसे लोग किसी फैसले के आने पर देश में सामने आने वाले तनाव की सोचकर इसे टालना चाहते थे। लेकिन उस टालने से इस मुद्दे के राजनीतिकरण का खतरा एक हकीकत बन गया, और लगातार देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के बीच यह भावना फैलाई गई कि अदालत फैसला इसीलिए नहीं दे रही है कि वह बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने का खतरा उठाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ अनगिनत हिन्दू पार्टियां, और संगठन लगातार ऐसे आक्रामक बयान देते रहे कि फैसला चाहे जो हो उस जगह पर मंदिर बनकर रहेगा। मंदिर वहीं बनाएंगे, इस नारे के साथ बाबरी मस्जिद को पहले तो गिराया गया, और फिर कहा गया कि वहां कभी मस्जिद थी ही नहीं। कुल मिलाकर देश में लगातार चौथाई सदी से अधिक वक्त से ऐसा माहौल बना हुआ है कि वहां पर मंदिर बनना देश के लिए सबसे जरूरी मुद्दा है, और रामलला को एक भव्य मंदिर मिल जाने से देश की तमाम दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। 

लेकिन ऐसी किसी भी योजना या साजिश से परे, हमारा सोचना यह है कि लोकतंत्र में अदालतों को अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, और नाजुक मुद्दों को अंतहीन टालते रहना कोई चतुराई नहीं है। दुनिया में बड़े-बड़े लोकतंत्र कई किस्म के तनाव झेलते हैं, और ऐसे तनावों से गुजरकर ही कोई लोकतंत्र मजबूत हो सकता है। इसलिए अयोध्या के विवाद को निपटाकर, और उसके बाद अगर कोई तनाव होता है तो उस तनाव से कड़ाई से निपटकर ही भारत अपने आपको एक जिम्मेदार और परिपक्व लोकतंत्र साबित कर सकेगा। अराजक मवालियों की भीड़ से डरकर कोई लोकतंत्र नहीं चल सकता। 
-सुनील कुमार

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