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रायपुर, रिटायर्ड अफसरों की जारी सरकारी चाकरी के लिए क्रेडा ने 13 लाख वसूली निकाली
रायपुर, रिटायर्ड अफसरों की जारी सरकारी चाकरी के लिए क्रेडा ने 13 लाख वसूली निकाली
Date : 20-Jul-2019

रिटायर्ड अफसरों की जारी सरकारी चाकरी के लिए क्रेडा ने 13 लाख वसूली निकाली

'विशेष संवाददाता
रायपुर, 20 जुलाई (छत्तीसगढ़)।
रिटायर्ड अफसरों के बंगलों पर सरकारी कर्मचारियों की बेगारी का मामला कुछ बढ़ रहा है। अभी प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त एम.के. राऊत के बंगले पर निजी सेवा करने वाले एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी के रिटायर हो जाने पर उसने अपने विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, में संविदा नियुक्ति की अर्जी दी। अर्जी आने पर लोगों को पता लगा कि विभाग में ऐसा भी कोई कर्मचारी काम करता है जिसे बीस बरस से दफ्तर में किसी ने देखा नहीं था। 

विभाग ने उसकी संविदा अर्जी खारिज कर दी क्योंकि उसी ओहदे पर बिना काम के बहुत से कर्मचारी विभाग में काम कर रहे हैं। यह कर्मचारी एम.के. राऊत के रिटायर हो जाने के बाद भी उन्हीं के बंगले पर लगा हुआ था, और उसे ग्रामीण विकास के एक दफ्तर में ही रहने के लिए उस वक्त से एक कमरा मिला हुआ था जब राऊत पंचायत-ग्रामीण विकास विभाग के सचिव थे। अब वह कमरा भी खाली करा लिया गया है। 

लेकिन एक दूसरे सरकारी दफ्तर में एक और नजारा सामने आया है। छत्तीसगढ़ शासन की सौर ऊर्जा एजेंसी क्रेडा के तीन कर्मचारी क्रेडा के सीईओ रहे एक आईएएस डी.एस. मिश्रा की निजी सेवा में लगे हुए थे। वे क्रेडा से हट गए, सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए, और शासन ने उन्हें राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। लेकिन ये कर्मचारी वहीं काम करते रहे। अब जब ग्रामीण विकास में यह मामला सामने आया, तो क्रेडा के अधिकारियों ने भी यह निकाला कि उनके कौन से कर्मचारी कहां काम कर रहे हैं। इस पर निकला कि डी.एस. मिश्रा के रिटायर होने के बाद से जो कर्मचारी उनकी सेवा कर रहे हैं उन तीनों के वेतन-भत्ते मिलाकर तेरह लाख रूपए से अधिक की वसूली क्रेडा ने निकाली है, और इसके लिए आयोग को नोटिस भेजा है। डी.एस. मिश्रा अपने सेवाकाल में एक बहुत ही कडक़ अफसर माने जाते थे, और उन्हीं की सेवा में लगे हुए ऐसे तीन लोगों के काम के एवज में तेरह लाख रूपए से अधिक का वसूली का नोटिस चौंकाने वाला है। 

ऐसा पता लगा है कि एसीबी-ईओडब्ल्यू में कर्मचारियों की ओर से यह शिकायत की जा रही है कि सरकारी कर्मचारियों से बेजा काम करवाकर उन्हें जिन विभागों से भुगतान करवाया जा रहा है उसकी वसूली या तो उनकी सेवा लेने वाले अफसरों-रिटायर्ड अफसरों से की जाए, या उन अधिकारियों से की जाए जिन्होंने अपने विभाग के लोगों की ऐसी नाजायज ड्यूटी लगाई है। 

ऐसे बहुत से मामलों के जानकार एक बड़े अफसर ने कहा कि खुले बाजार में ड्राइवर की सेवाएं आठ हजार रूपए महीने पर मिल जाती हैं, लेकिन निजी कामों के लिए झोंक दिए गए सरकारी ड्राइवरों की तनख्वाह पच्चीस हजार रूपए तक पड़ती है। इसी अनुपात में घरेलू कामकाज के लिए रखे गए नौकरों, और चौकीदारों का वेतन बनता है। बड़ी तनख्वाह और भत्ते पाने वाले लोग निजी खर्च पर ऐसे सेवक रखें तो उन्हें एक तिहाई या एक चौथाई खर्च पर वे मिल जाएंगे, लेकिन तीन-चार गुना शासकीय खर्च का ऐसा बेजा इस्तेमाल इस राज्य में एक आम बात बन गई है। 

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