संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 जुलाई : एक मंडी, जिसे कई लोग  लोकतंत्र समझ बैठते हैं..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 जुलाई : एक मंडी, जिसे कई लोग लोकतंत्र समझ बैठते हैं..
Date : 27-Jul-2019

कर्नाटक में कल शाम भाजपा के मुख्यमंत्री ने शपथ ले ली, और कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार का अधूरा कार्यकाल खत्म हो गया। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस छोडऩे वाले विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर फैसला अब तक विधानसभा अध्यक्ष ने लिया नहीं है, और ऐसा लगता है कि उस फैसले से अब नई सरकार की सेहत पर कोई फर्क पडऩा भी नहीं है। कर्नाटक में पिछली कई सरकारों ने कार्यकाल पूरे नहीं किए, और ऐसा महज विपक्ष की वजह से नहीं हुआ है, खुद भाजपा सरकार में भाजपा के विधायकों ने भी सरकार के खिलाफ खुली बगावत दर्ज की हुई है। इस पूरे सिलसिले में जिस बड़े दाम पर विधायकों की खरीद-फरोख्त की तोहमतें हवा में तैर रही हैं, वे भयानक हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव जीतना एक बड़ा पूंजीनिवेश है, एक महंगी कैशक्रॉप बोना है, जिसे सही समय आने पर काटकर नगदीकरण किया जा सके। 

भारत में लोकतंत्र में जब-जब, जहां-जहां विधायकों या सांसदों की मंडी में खरीद-फरोख्त होती है, तब-तब बिकती जनता है। वह जनता जिसे यह झांसा दिया जाता है कि उसके वोट से सरकार बनती है, और जिसे अब तो चुनाव आयोग भी लुभावने इश्तहार जारी करके वोट देने के लिए बुलाता है, वह जनता इस खुशफहमी में रहती है कि वह पांच बरस के लिए विधायक और सांसद चुनती है। जनता आज की तारीख में हिन्दुस्तान में सामान चुनती है जो कि मंडियों में जरूरत के वक्त असंभव से लगने वाले दाम पर बिकते हैं। बिकाऊ माल चुनने को कुछ लोग लोकतांत्रिक अधिकार मान लेते हैं, कुछ लोग पांच बरस में एक बार आने वाला जलसा मान लेते हैं, और फिर इसी खुशफहमी में मगरूर घूमते हैं, फिर वे चाहे भूखे पेट हों। 

भारतीय लोकतंत्र में जिस रफ्तार से, जिस बड़े पैमाने पर दौलत और बेईमानी का खेल चल रहा है, उससे अब यह लगता है कि दलबदल कानून के तहत अगर हुए बाकी कार्यकाल के लिए सदन की सदस्यता खत्म नहीं होगी, तो मौजूदा कानून तो थोक में खरीदी को बढ़ावा देने वाला एक बाजारू फॉर्मूला होकर रह गया है। आज किसी विधायक दल या सांसद दल के एक तिहाई सदस्य दलबदल करते हैं, तो वह दलबदल नहीं, दलविभाजन कहलाता है। आज की राजनीति में अरबपति उम्मीदवारों की बढ़ती गिनती, दलबदल में पूरी तरह स्थापित हो चुकी बेशर्मी, और पार्टियों के पीछे खरबपतियों की दौलत की ताकत, इन सबने मिलकर लोगों की शर्म और झिझक खत्म कर दी है, लोगों के नीति-सिद्धांत खत्म कर दिए हैं, और मोटे तौर पर लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। आज इस देश में ऐसे लतीफे बनने लगे हैं कि पिछले चुनाव तक तो यह कहा जाता था कि किसी भी निशान पर वोट दो, वह जाएगा तो एक खास निशान पर ही, और अब तस्वीर बदल गई है कि किसी भी उम्मीदवार को वोट दो, वह उम्मीदवार तो जाएगा एक खास पार्टी में ही। 

अभी कुछ पार्टियों ने इस बात की वकालत शुरू की है कि जब देश के कुल राजनीतिक चंदे का तीन चौथाई से अधिक हिस्सा महज भाजपा में जा रहा है, तो फिर देश में चुनाव में बराबरी बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी खर्च पर चुनाव हों। एक दूसरी रिपोर्ट यह भी थी कि अभी-अभी हुए आम चुनाव दुनिया के सबसे महंगे चुनाव थे, हिन्दुस्तान के इतिहास के तो सबसे महंगे चुनाव थे ही। अब कर्नाटक या किसी दूसरे प्रदेश में किसी एक पार्टी या किसी दूसरी पार्टी की खरीद-फरोख्त देखकर लगता है कि चुनाव के बाद भी हिन्दुस्तान का लोकतंत्र सबसे महंगा लोकतंत्र साबित हो रहा है जहां विधायकों के इतने दाम लगने की चर्चा खुले रहस्य की तरह होती है। यह सिलसिला उन लोगों को निराश करता है जो संविधान की बात करते हैं, जो लोग लोकतंत्र पर भरोसा करते हैं, या जो लोग अपने वोट की ताकत पर एक बेबुनियाद आत्मविश्वास रखते हैं। इस मंडी को लोकतंत्र समझ लेने की खुशफहमी महज हिन्दुस्तानी कर सकते हैं। 

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