विचार / लेख

कुपोषण के खिलाफ  लड़ाई अभी लंबी है
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई अभी लंबी है
Date : 03-Aug-2019

भूपेश बघेल

(आउटलुक पोषण अवार्ड 2019 में आज 3 अगस्त को नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दिया भाषण)

सबसे पहले मैं ‘आउटलुक’ को साधुवाद देता हूं कि गैर जरूरी मुद्दों के तूफान के बीच से एक दीया जलाते हुए वास्तविक जरूरतों के मुद्दों की पहचान की।
आपने असली सवालों को सामने लाने का साहसिक काम किया, यही वजह है कि हम सब यहां जाति, धर्म जैसे समाज को आपस में बांटने  वाले मुद्दों की बजाय सुपोषण पर चर्चा करने एकजुट हुए हैं।
मेरा मानना है कि तीसरी दुनिया के तमाम देशों के सामने बहुत लम्बे समय से कुपोषण बहुत बड़ी समस्या रही है, जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है और समाज के किसी भी हिस्से में काम करने वाले व्यक्ति या संगठन के लिए यह समझना सबसे ज्यादा जरूरी है कि हमें चांद से ज्यादा जरूरत, अपनी धरती में ही जीवन खोजने की है।
कोई चार साल पहले नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स की पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा था ‘भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जो सबसे ज़्यादा अशिक्षित और अस्वस्थ लोगों के साथ वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है।’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था, ‘न तो पहले कभी ऐसा हुआ है और न भविष्य में ऐसा होने वाला है।’
केरल का उदाहरण सामने है। 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था तब, केरल भारत का तीसरा सबसे गरीब राज्य था। 1960 में केरल की राज्य सरकार ने यूनिवर्सल शिक्षा और स्वास्थ्य योजना लागू करने का फैसला किया, जो एक गरीब राज्य के लिए आसान नहीं था, लेकिन वह फैसला अमल में लाया गया और परिणाम सामने हैं। केरल आज उन राज्यों में से है जहां कुपोषण की समस्या सबसे कम है।
मैं आंकड़ों की बाजीगरी पर विश्वास नहीं करता, लेकिन छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री होने के नाते यह चिंता जरूर करता हूं कि पिछले 15 वर्षों में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं होने के कारण हमारे यहां गरीबी का प्रतिशत 37 से बढक़र 39.9 प्रतिशत क्यों हो गया? 15 साल की सरकार जिस चमकते विकास के दावे करती थी, इस एक आंकड़े के प्रकाश में ही उन्हें झूठा क्यों नहीं माना जाए।
कुपोषण की वैश्विक दर यदि 22 प्रतिशत है तो छत्तीसगढ़ अभी भी 30 प्रतिशत से अधिक कुपोषण के साथ बहुत पीछे है। भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 44 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं तो छत्तीसगढ़ में यह प्रतिशत 47.1 है।
आदिवासी इलाकों में तो यह प्रतिशत और अधिक है। महिलाओं में खून की कमी और वजन कम होने के आंकड़े भी चिंतित करने वाले हैं। अगर ऐसा भारी भरकम विकास हो रहा था तो ऐसा कैसे हुआ कि हमारे बच्चे और माताएं कुपोषित रह गए? यह तो मानना पड़ेगा कि कुपोषण का सीधा संबंध गरीबी से है। हमें सबसे पहले गरीबी दूर करने को ही लक्ष्य करना पड़ेगा। हमारी यूपीए सरकार ने मनरेगा जैसा कार्यक्रम लागू किया तो गरीबी रेखा से 14 करोड़ परिवारों को बाहर निकलने में मदद मिली। 
खाद्य सुरक्षा कानून ने भी आबादी के स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में बड़ा योगदान दिया। हम देश में न्यूनतम आय की योजना लागू करना चाहते थे। इससे 25 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से बाहर निकल सकते थे, लेकिन विडम्बना है कि गरीबी दूर करने का अभियान सत्ता परिवर्तन का शिकार हुआ और प्रगति का रथ उल्टा चलने लगा।
असल चिंता अब सिर्फ भूख मिटाने तक सीमित रही, बल्कि क्या खाएं क्या खिलाएं जो किसी शिशु/किसी व्यक्ति को स्वस्थ शारीरिक और मानसिक विकास दे, यह सोचना जरूरी है। 
यह विषय हमारी परम्पराओं में भी था। विभिन्न समाजों और समुदायों के अर्जित अनुभव में भी इसका समाधान था। इसलिए हम उस तमाम ज्ञान को खारिज करके आगे नहीं बढ़ सकते। उसे नई खोज, नई सुविधाओं से जोडक़र आगे बढ़ सकते हैं।
आज यह खोज करने की जरूरत है कि दूध और अण्डा शाकाहारी है या मांसाहारी।
यदि हमारे पास अनेक विकल्प हों और हम समुदायों को यह चुनने का अधिकार दे सकते हों कि वे अपने खानपान की परम्पराओं के अनुसार जो चाहे, वो खिलाए-पिलाए, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आपको सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाना है, बल्कि शरीर में न्यूट्रीएंट की जरूरत के अनुसार खाना है, तो इसमें क्या बुराई है।
किसी ने कहा है 
दरिया से भी लौट जाते हैं
मुसाफिर प्यासे साहेब,
हर पानी की फितरत
प्यास बुझाना नहीं होती ...
मैं सोचता हूं कि इस तरह की जागरूकता भी आज समाज की बहुत बड़ी जरूरत है। देश और दुनिया में आज जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें भयादोहन एक बड़ा हथियार है। 
एक जाति, एक समुदाय, एक समाज दूसरे के लिए खतरा है, यह बताकर जब राजनीति की जाती है, तब कुपोषण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया जाता है। आज फिर दुनिया को युद्ध का डर बताकर राजनीति करने वाले सफल होते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि असली आक्रमण तो काफी पहले शुरू हो चुका है, जिसे कुपोषण के रूप में परिभाषित करना भर बाकी है। वास्तव में कुपोषित पीढिय़ां से घिरा देश इतना कमजोर हो जाएगा कि उसे शारीरिक और मानसिक तौर पर फिर से खड़ा करना बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए आज का समय इस वास्तविक आक्रमण की हर चाल को समझने को है और सुपोषण के द्वारा एक स्थाई जंग जीतने का है।  
यह मंच इस बात का गवाह है कि यह चिंता छत्तीसगढ़ की है, यह चिंता पूरे देश की है। इस लड़ाई को एक सिरे से हमारे वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, एक्टिविस्ट और आप जैसे जागरूक मीडिया के साथी थामे हुए हैं तो दूसरे सिरे पर यह जिम्मेदारी लोककल्याणकारी सरकारों की है।
अपनी इसी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए हमारी नेता माननीय सोनिया गांधीजी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और उसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस देश को ‘भोजन का अधिकार’ दिया कानून बनाकर। यह अधिकार कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई के लिए एक सशक्त औजार बना है।
कुपोषण हमारे देश के सर्वांगीण विकास में इतनी बड़ी बाधा थी कि सर्वोच्च अदालत ने इसकी चिंता की। याद ही होगा कि 1995 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में ही स्कूलों में ‘मिड डे मील’ योजना शुरू हुई थी।
कांग्रेस पार्टी जब लोकल्याण की अपनी जिम्मेदारी की बात करती है तो उसके सामने समाज का सबसे वंचित तबका होता है। वही जिसे बापू ने अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति कहा था।
अतीत की कांग्रेस सरकारों ने, फिर यूपीए ने महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के विकास के मॉडल को अपना आदर्श माना। 
हमने यह महसूस किया कि कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई में स्त्री-पुरुषों के बीच की गैरबराबरी एक बड़ी बाधा है। पोषण आहार के मामले में इस गैरबराबरी को भी दूर करना ही होगा। इस गैरबराबरी को दूर किये बिना ना तो स्त्री सशक्तीकरण की बात की जा सकती है और ना ही निरोगी और स्वस्थ, तंदरुस्त शिशु की ही बात। और इनके बिना कोई भी विकास पूरा कैसे होगा? 
दरअसल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई के कई आयाम हैं। अगर गैरबराबरी चुनौती है तो गरीबी भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। अगर पौष्टिकता के ज्ञान का अभाव चुनौती है तो राजनीतिक इरादों का अभाव भी बड़ी चुनौती है। हम कुपोषण के खिलाफ नीतियां बनाते चलें और उन पर अमल ना कर पाएं तो यह भी तो एक बड़ी चुनौती है।
आज भी अगर भारत में पांच साल से कम उम्र के शिशुओं का बौनापन दुनिया का एक तिहाई है, तो हमें लगता है कि कुपोषण के खिलाफ लंबी लड़ाई अभी लड़ी जानी है। 

कुपोषण के खिलाफ इस विचार मंथन में बहुत से विशेषज्ञ शामिल हैं। बहुत से एक्टिविस्ट्स शामिल हैं। आप सभी के पास देश और दुनिया आंकड़े हैं। आपके पास हर राज्य और हर जिले के आंकड़े हैं ही।
देखिए कि ये आंकड़े कितने भयावह हैं। देखिए ये आंकड़े हमारे सामने कितनी बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। यहां बैठे सभी बुद्धिजीवी यह जानते हैं कि विभिन्न कारणों से होने वाली शिशु मृत्यु का प्रकोप 60 प्रतिशत अधिक कुपोषित बच्चों पर होता है। यदि कुपोषण व एनिमिया को एक बीमारी के रूप में चिन्हांकित कर लक्षित किया गया तो 6 वर्ष से कम आयु वर्ग में होने वाली मृत्यु पर नियंत्रण सुगम होगा। 
यदि हम पोषण व स्वास्थ्य के जीवन चक्र का अध्ययन करें तो पाएंगे कि एक कुपोषित किशोरी कुपोषित मां बनती है एक कुपोषित मां कम वजन वाले बच्चे को जन्म देती है। 
बौनापन कुपोषण का एक प्रकार है, जिसमें लंबे समय से सही पोषण न मिलने से प्रजाति में बौनापन आ जाता है। यह बौनापन उस राष्ट्र व उस राज्य के लिए ‘सम्पत्ति’ नहीं बन पाता है। 
मेरा जन्म एक छोटे से गांव में हुआ है। गांव में ही पला, गांव के स्कूल में ही पढ़ा, गांव की मिट्टी में ही खेला, गांव के तालाब में ही नहाया व गांव के अमरूद तोडक़र ही खाए। 
मुझे याद नहीं पड़ता कि गांव की परंपरागत खाद्य सामग्री को नियमित व संतुलित रूप से खाने वाला कोई बच्चा बीमार हो या कुपोषित हो। हम जब अपनी परंपरा, अपनी मिट्टी, अपनी मिट्टी से उपजी खाद्य सामग्री से जब दूर होते हैं। हम अपनी न्यूट्रीशन गैप या कुपोषण जैसी कठिनाइयों का इलाज परंपरागत पद्धतियों में नहीं ढूंढते हैं, जिससे यह समस्या ठीक होने के बजाय बढ़ती जा रही है।
हमने महसूस किया कि मिड डे मील में अंडा एक बड़ी जरूरत है। अंडे की पौष्टिकता निर्विवाद है फिर भी कतिपय तत्वों ने गरीब की जरूरतों की चिंता नहीं की और अंडा बांटने की हमारी योजना में बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की, लेकिन इस योजना को जनता का भरपूर साथ मिला। स्वाभाविक रूप से हमने उन बच्चों का भी ख्याल  रखा जो अंडा नहीं खाते।
मैं व्यक्तिगत रूप से अमत्र्य सेनजी से सहमत हूं और चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ को पहले एक शिक्षित और स्वस्थ्य राज्य में बदला जाए, तभी हम विकास के सही रास्ते पर आगे बढ़ सकेंगे।
हमने चुनाव के दौरान वादा किया था कि हम राज्य में यूनिवर्सल स्वास्थ्य योजना लागू करेंगे और हम इस दिशा में काम कर रहे हैं।
आज भी अगर हमारे समाज में पोषण आहार के मामले में स्त्री और पुरुष के बीच गैरबराबरी मौजूद है तो जानिए कि हमें कुपोषण के खिलाफ अभी लंबी लड़ाई लडऩी है।

 

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