संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  3 अगस्त : विशाल संसदीय बहुमत से लोकतांत्रिक जिम्मेदारी  कहीं भी कम नहीं होती...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 अगस्त : विशाल संसदीय बहुमत से लोकतांत्रिक जिम्मेदारी कहीं भी कम नहीं होती...
Date : 03-Aug-2019

कश्मीर आज एक सन्नाटे में जी रहा है और वहां की किसी नेता को, इंसान को यह नहीं मालूम है कि उनके साथ क्या होने जा रहा है। यह बात महज अलगाववादियों की नहीं है, कश्मीर की तीन प्रमुख पार्टियों, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, और कांग्रेस के नेता भी हक्का-बक्का और हैरान हैं कि केन्द्र सरकार वहां क्या करने जा रही है। पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कश्मीर होकर लौटे, और आते ही उन्होंने 10 हजार अतिरिक्त सैनिक-सिपाही वहां रवाना किए। अब खबर है कि इसके बाद 28 हजार और सैनिक-सिपाही वहां भेजे गए हैं। केन्द्र सरकार ने कल एक अभूतपूर्व चेतावनी जारी की है और कश्मीर गए हुए तमाम गैरकश्मीरी लोगों को तुरंत राज्य छोड़कर निकल जाने को कहा है। अमरनाथ यात्रा बीच में रद्द कर दी गई है और सारे तीर्थयात्रियों को लौटने कह दिया गया है, जिससे एक भारी भगदड़ मची हुई है। कश्मीर गए हुए सैलानियों की वापिसी को लेकर भी बदहवासी फैली हुई है, लेकिन वहां काम कर रहे कई राज्यों के लाखों मजदूरों का क्या होगा इसकी कोई खबर नहीं है। लेकिन बड़ी बात यह है कि ऐसी कार्रवाई क्यों की जा रही है, ऐसी चेतावनी क्यों दी गई है, इतनी फोर्स क्यों भेजी गई है, इसका कोई जवाब केन्द्र सरकार ने या कश्मीर चला रहे राज्यपाल ने किसी को नहीं दिया है। कश्मीर के प्रमुख नेताओं ने कल जाकर राज्यपाल से मुलाकात की है और पूछा है कि क्या हो रहा है उन्हें भी बताया जाए। यह सब तब हो रहा है जब संसद का सत्र चल रहा है, और संसद की छुट्टी के दिन अचानक यह कार्रवाई की जा रही है। लोग अधिक हैरान और हक्का-बक्का इसलिए हैं कि कई दशकों में कभी भी अमरनाथ यात्रा को रद्द नहीं किया गया था, और तब भी नहीं किया गया था जब उस पर सीधा आतंकी हमला हुआ था, और मौतें हुई थीं। आज पूरे के पूरे राज्य में केन्द्रीय सुरक्षा बल और हिन्दुस्तानी फौज चप्पे-चप्पे पर क्यों इस तरह तैनात हो रहे हैं, यह लोगों की समझ से परे है, और कश्मीर की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा रखने वाले, चुनाव लड़कर कई बार वहां की सत्ता सम्हालने वाले नेता और भी विचलित हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के इस दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर को लेकर एक कड़ा रूख संसद में दिखाया था, और कश्मीर राज्य के लिए संविधान में की गई विशेष व्यवस्था के तहत धारा 35-ए, और धारा 370 को हटाने की चर्चा चल रही है, ऐसा लग रहा है कि सरकार इस बात की घोषणा होने पर राज्य में होने वाली बेचैनी और उपद्रव की आशंका से केन्द्रीय सुरक्षा बलों की ऐसी तैनाती कर रही है। कश्मीर को लेकर केन्द्र सरकार की नीति आज जितनी कड़ी दिखाई पड़ रही है, ऐसी पहले कभी नहीं थी, और कश्मीरी लोगों में इतनी आशंका भी पहले कभी नहीं थी। 

संसद में बहुमत अगर इतना बड़ा हो कि एनडीए के भीतर भी महज भाजपा बहुमत की सरकार बनाने की ताकत अकेले रखती हो, तो वैसे में वह कई किस्म की कार्रवाई इस ताकत और संविधान में मिले अधिकारों के तहत कर सकती है। लेकिन लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत का नाम नहीं होता, वह तालमेल और विचार-विमर्श के बाद किसी सर्वमान्य समाधान तक पहुंचने की एक कोशिश का नाम भी होता है, और वैसी बातचीत आज दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक होते दिख नहीं रही है। लोकतंत्र में यह कहीं नहीं लिखा है कि संसद के हर सत्र के पहले प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी सर्वदलीय बैठक बुलाए, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएं और संसदीय शिष्टाचार के तकाजे से ऐसा हमेशा ही किया जाता है। जब राजीव गांधी इससे भी बड़े संसदीय बाहुबल के साथ प्रधानमंत्री थे, तब भी यह परंपरा नहीं टूटी थी, और आज भी यह परंपरा जारी है। लेकिन संसद सत्र के चलते ऐसी गोपनीय कार्रवाई इस पैमाने पर की जा रही है और संसद को उससे अलग रखा जा रहा है, यह रूख लोकतांत्रिक नहीं है। इसके अलावा कश्मीर की जो पार्टियां लोकतंत्र पर भरोसा रखती हैं, जो समय-समय पर केन्द्र में, और कश्मीर में भी एनडीए की भागीदार रही हैं, उन पार्टियों से भी कोई बात किए बिना अगर इतनी बड़ी कोई कार्रवाई हो रही है, तो उस पर कश्मीरी जनमत के साथ होने की संभावना इससे कम हो जाती है। 
-सुनील कुमार

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