विचार / लेख

बात तो करें ‘खानदानी शफाखाना’
बात तो करें ‘खानदानी शफाखाना’
Date : 04-Aug-2019

सच्चिदानंद जोशी

बचपन में जब भोपाल के भारत टॉकीज चौराहे से गुजरते थे तो दो विज्ञापनों पर बरबस नजऱ जाती थी- ‘डॉ शाहनी का दवाखाना’  और ‘डॉ. राय का क्लीनिक’। विज्ञापन बहुत बड़ा होता था लेकिन उसके बारे में कभी पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि वहां क्या होता है। क्योंकि वहां लिखा होता था ‘गुप्त रोग’।  अब जो गुप्त है उसे प्रकट रूप में कैसे पूछा जाए। 
एक बार एक फि़ल्म भी आई थी ‘गुप्त ज्ञान’।  लेकिन फि़ल्म तो दूर उसका पोस्टर भी देखना वर्जित था। मामा के लडक़े ने जो उम्र में हमसे भी छोटा था ऑटो से जाते समय पोस्टर पढ़ लिया।  बेचारा नया-नया स्कूल गया था। अपने सद्य प्राप्त अक्षर ज्ञान का मुजाहिरा करना चाहता था सो बोल पड़ा ‘गुप्ता जान’।  तब भी सब बड़ों ने उसे शशश चुप ऐसा कहकर हतोत्साहित किया था। पता नहीं ंकि वो फिल्म देखी किसने। इतना जरूर मालूम है कि दूर के रिश्ते के फूफाजी को मोहल्ले के लडक़ों ने उस थिएटर में जाते देख लिया था। फिर दूर के रिश्ते की बुआजी ने फूफाजी की ऐसी खबर ली थी कई दिन तक उनका कही भी आना जाना बंद हो गया था।
दरअसल न पूछने की पृष्ठभूमि भूमि में वो झन्नाटेदार झापड़ था जो हमारे बड़े भाई साहब (बड़े ताऊ जी के छोटे लडक़े जो नौकरीशुदा थे और शादीशुदा होने वाले थे), ने हमें रसीद किया था हमारे सिर्फ बोर्ड पढ़ कर जोर से चिल्लाने पर ‘अहा गुप्त रोग’। उसके बाद डॉ. साहनी अथवा डॉ. राय के अध्यवसाय के बारे जानने का उत्साह मन में ही दबा रह गया। कालांतर में इनके व्यवसाय और अन्य ‘गुप्त’ बातों की जानकारी हमें वैसे ही प्राप्त हुई जैसे सत्तर और अस्सी के दशक में अन्य युवाओं को प्राप्त होती रही यानी श्री मस्तराम या उन जैसे अन्य समृद्ध लेखकों के जरिये या फिर लीलाधर बुक स्टॉल जैसे समाजसेवी पुस्तक विक्रेताओं के जरिये। कह सकते है कि ऐसे अनौपचारिक स्रोतों से प्राप्त कार्यसाधक ज्ञान के जरिये भी काम चल गया और खास कुछ बिगड़ा नही।
जब हमारे बच्चे भी उसी उम्र में आए तो जमाना बदल चुका था। ज्ञान (गुप्त वाला) प्राप्त करने की प्रविधियां भी बदल चुकी थी। नए-नए संसाधन थे, इंटरनेट था, खुला समाज था और शिक्षा के नए प्रयोग थे। कई औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों से उन्हें भी विषय का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त हो ही गया होगा ऐसा मानने में कोई हर्ज नहीं है। 
बचपन में कभी तंबू लगा कर प्राय: जादूगर सा भेस बनाए किसी मदारीनुमा हकीम को शिलाजीत बेचते देखते थे तो भी उत्सुकता होती थी। जिस ढंग से वो अपने डायलॉग बोलते थे वो बहुत ही आकर्षक होते थे। इतने की आप दवाई खरीदने के लिए प्रेरित हो जाओ। फिर  ‘मर्दानगी’  ‘जवानी’  ‘खोई हुई ताकत’ जैसे शब्द सुनाई पड़ते थे और भाईजी का झन्नाटेदार झापड़ याद आ जाता था। लब्बोलुबाब ये कि जो ‘गुप्त’  था और जिसका रहस्योद्घाटन करने की तमन्ना रही वो गुप्त ही रह गया। क्या करें किसी ने बात ही नहीं की उस बारे में। अच्छा हमसे किसी ने बात नहीं की तो समझ में आता है। लेकिन हमने भी कहां बात की अपने बच्चों से। जीवन की ‘गुप्तता’  के बारे में जैसा अधकचरा ज्ञान हमें ंमिला वैसा ही या उससे भी थोड़ा ज्यादा बुरा ज्ञान पाने के लिए हमने हमारे बच्चों को छोड़ दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी पीढ़ी छेड़छाड़ और जरा-सी चुहलबाजी में ही संतुष्ट हो जाती थी। आज इनके लिए बलात्कार, एसिड अटैक, ब्लेड से काट डालना भी कोई संवेदना नहीं जगाते।
अभी कल एक फिल्म देखी जो आपसे कहती है बात तो करो। वैसे कहा गया है ‘नीम-हकीम खतरे जान’।  हमने ‘यूनानी शफाखाना ’ का बोर्ड लगा भी देखा है पुराने भोपाल शहर में। लेकिन इन सब बातों से कभी कोई नज़दीक का रिश्ता रहा नहीं। इसलिए न इनका महत्व समझ पाए, न इनकी त्रासदी। 
‘खानदानी शफाखाना’  देखी तो मन संवेदना से भर गया। अपने आप से प्रश्न करने पर मजबूर हो गया कि कभी बात क्यों नहीं की इस विषय पर। फि़ल्म के मामाजी देखे तो एकदम पगड़ी लगाए डॉ. शाहनी याद आ गए। यकीन है कि फिल्म की निर्देशक शिल्पी दासगुप्ता को भी याद होंगे क्योंकि वो भी भोपाल की ही हैं। लेकिन ऐसे शफाखानो के अंदर घुसकर उनकी दर्दभरी दास्तान जान लेना गजब का काम है, जो शिल्पी ने किया है। बेबी बेदी के जरिये एक नई सोनाक्षी सिन्हा भी आपके सामने प्रकट होती है जो संवेदनशील और सशक्त अभिनेत्री का रूप है। सच मानिए जब फिल्म देखने गए तो ऐसी किसी अपेक्षा से नही गए। ऐसी बात ही नही हुई थी। पोस्टर और दूसरी पब्लिसिटी के भरोसे हम तो गए थे एक कॉमेडी फिल्म देखने। और लौटे एक बेहद संजीदा फि़ल्म देखकर।  कल ही रात एक मित्र को बताया इस फि़ल्म के बारे में तो मित्र ने पूछा- ‘कहां किसी थिएटर में लगी है’ । यानि नई फिल्म थिएटर में है और कइयों को पता भी नहीं। इसलिए सोचा कम से कम ‘बात तो करें’।

 

 

 

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