संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 अगस्त : प्रेम और श्रृंगार रस वाला यह देश आज प्रेम को वर्जित शब्द बना बैठा है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 अगस्त : प्रेम और श्रृंगार रस वाला यह देश आज प्रेम को वर्जित शब्द बना बैठा है
Date : 04-Aug-2019

आज दोस्ती के जलसे, फ्रेंडशिप डे पर हर बरस की तरह छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में फिर पुलिस तैनात हो गई। हर दिन नौजवान लड़के-लड़कियां तालाब किनारे, बगीचे में, मॉल में, या नया रायपुर की खाली सड़कों के किनारे मिलते हैं, और कुछ वक्त साथ में गुजारते हैं। जिन लोगों की खर्च करने की क्षमता है, उनके लिए पब, रेस्त्रां, और डिस्को थैक भी मौजूद हैं। लेकिन साल में दो दिन, एक तो दोस्ती के दिन फ्रेंडशिप डे पर, और दूसरे प्रेम के प्रतीक वेलेंटाईन डे पर पुलिस तैनात रहती है क्योंकि कुछ हिंदू धर्मांध और कट्टर संगठन कभी-कभी सार्वजनिक जगहों पर मिलने वाले लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं। अब राज्य में कांग्रेस सरकार आने के बाद ऐसे संगठनों की आक्रामकता कुछ कम हुई है, और अभी ऐसी चेतावनी जारी नहीं की गई है, फिर भी पुलिस चौकन्नी थी। वेलेंटाईन डे पर तो पिछले बरसों में पुलिस का हाल यह था कि सार्वजनिक जगहों पर कहीं गेट बंद करके तो कहीं बाहर से ही लोगों को भगाकर बवाल का खतरा खत्म कर दिया जाता था। 

यह देश नौजवान पीढ़ी की हसरतों को कुचलने में इतना माहिर हो गया है कि जब तक नौजवान जोड़े आत्महत्या न कर लें, या जब तक मानसिक बीमारियों के शिकार न हो जाएं, जब तक उनके सपनों को कुचलने के लिए लठैत भी जुटा लेता है, और परिवार के लोग भी कत्ल करने पर आमादा रहते हैं। और कत्ल तो फिर भी नजरों में आ जाता है, कत्ल से कम की हिंसा तो कई बार खबरों में नहीं आती, पुलिस तक नहीं जाती। यह देश जो कि अनंत काल से श्रृंगार रस से भरा हुआ था, जहां कृष्ण के गोपियों संग रास-रंग को पूजा घर में भी रखा जाता है, उस देश में पिछले कुछ दशकों में प्रेम को पूरी तरह अवांछित मान लिया गया है और सांप और प्रेम दोनों एक साथ दिख जाएं तो हिंदुस्तानी समाज पहले प्रेम को कुलचने में जुट जाता है।

हिंदुस्तानी समाज के ऐसे बड़े हिस्से ने दुनिया के सभ्य देशों को देखा नहीं है, वहां के बारे में जाना नहीं है। इसलिए आम हिंदुस्तानियों को यह मालूम नहीं है कि नौजवान पीढ़ी को उसकी हसरतों से अलग करके उसकी क्षमताओं और संभावनाओं को किस तरह कुचलना हो जाता है। नौजवान अपनी मर्जी के लड़के-लड़कियों के साथ उठ-बैठ नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, साथ रह नहीं सकते, मां-बाप की मर्जी के बिना शादी नहीं कर सकते, ऐसे में उनका मनोबल टूट जाता है, और समाज में उनकी जो उत्पादकता मिलनी चाहिए, वह संभावना खत्म हो जाती है। हिंदुस्तान में महानगरों का कुछ हिस्सा ऐसी बंदिशों से उबरा है, बाकी शहरों में भी थोड़े से तबके को थोड़ी सी आजादी मिली है, लेकिन यह सब भी मां-बाप की नजरों से बचते हुए करने की बेबसी अधिकतर लोगों के सामने रहती है। 

इस देश की बुनियादी संस्कृति में तो पौराणिक कथाओं से लेकर संस्कृत के कालिदास तक चारों तरफ पे्रम और श्रृंगार रस की मजबूत परंपरा रही है। बाद में पता नहीं किस वजह से हिंदुस्तानी मां-बाप एक दहशत में आ गए, और प्रेम एक वर्जित शब्द हो गया। यह सिलसिला धर्म और जाति के बंधनों से और आगे बढ़ते चले गया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा खाप पंचायत की तरह सोचने लगे, तो वह देश आगे नहीं बढ़ सकता। हिंदुस्तान को इस पाखंड से उबरना होगा कि उसकी नौजवान पीढ़ी हमेशा ही बच्चे बनी रहेगी और मां-बाप की मर्जी से ही प्रेम और शादी करेगी।

-सुनील कुमार

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