विचार / लेख

 जहां बेअसर से एंटीबायोटिक्स वहीं चरक में नुस्खे भरपूर
जहां बेअसर से एंटीबायोटिक्स वहीं चरक में नुस्खे भरपूर
Date : 05-Aug-2019

ऋतुपर्ण दवे

यकीनन खबर छोटी जरूर है लेकिन बेहद चिन्ताजनक है। बेहिसाब एंटीबायोटिक्स सेवन के चलते 60 फीसदी मरीजों पर प्रायमरी और सेकेंडरी लाइन के एंटीबायोटिक नाकाम हो रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं आईसीयू में भर्ती 80 फीसदी मरीजों पर 18 से 20 प्रकार के खास एंटीबायोटिक्स भी असर नहीं कर रहे हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज कानपुर से संबद्ध तमाम मेडिकल कॉलेजों द्वारा जुटाए गए यह हालिया आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। निश्चित रूप से पूरे देश और दुनिया में एंटीबायोटिक के दुरुपयोग के बढ़ते आंकड़े चिकित्सा जगत की बड़ी चुनौती बनने वाले हैं।
इतना तो समझ आता है कि अब शुरुआती दौर में लिखी जाने वाली दवाएं मरीजों पर असर नहीं दिखाती हैं जिसके चलते बहुतेरे चिकित्सक भी अक्सर एडवांस स्टेज की दवा शुरू में ही लिख देते हैं। बाद में इसके परिणाम बेहद  घातक होते हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह भी है कि सिरदर्द, पेटदर्द या बुखार होने पर बिना एक्सपर्ट की सलाह के कोई भी एंटीबायोटिक ले लेने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह से प्रभावित होती है। 
अक्सर बेवजह और लगातार सेवन से भी शरीर में मौजूद परजीवी सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोब्स या बैक्टीरिया इनसे प्रतिरोधक क्षमता पैदा खुद को बदल लेते हैं। जिसका नतीजा यह निकलता है कि दवा, केमिकल या संक्रमण हटाने वाले इलाज पर एंटीबायोटिक का असर या बिल्कुल नहीं या ना के बराबर हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि बिना जरूरत के एंटीबायोटिक दवाओं से शरीर में इसका असर घटने लगता है और इसके आदी हो चुके बैक्टीरिया का घातक प्रभाव रुकता नहीं है और मरीज की मृत्यु तक हो जाती है।
दरअसल एंटीबायोटिक्स को आम दवा समझने की भूल कर लोग बिना डॉक्टर की सलाह के दवा दूकानदारों से बेरोकटोक खरीद धड़ल्ले से उपयोग करते हैं। नतीजन इनसे बैक्टीरिया का मरना तो दूर उल्टा एंटीबायोटिक खाकर और मजबूत हो जाते हैं। चालू भाषा में ज्यादा ढ़ीठ हो जाते हैं और जिससे बीमारियां खतरनाक हो जाती है। ऐसे में तेज यानी हैवी एंटीबायोटिक दिए जाते हैं जो शरीर पर कई दूसरे दुष्प्रभाव का कारण बनते हैं। एंटीबायोटिक महज बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली बीमारियों में असरदार होते हैं। लेकिन लोग अक्सर वायरल बीमारियों जैसे सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू, ब्रॉन्कॉइटिस, गले में इंफेक्शन में भी सेवन करते हैं जिसका कोई मतलब और असर नहीं होता। 
जहां एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर आमतौर पर अधूरी जानकारी और अज्ञानताएं काफी भ्रामक हैं। बिना ठीक ढंग से बीमारी को डायग्नोस किए ही या तो झोला छाप या दूसरी पैथी के यहां तक कि कई बार एमबीबीएस डॉक्टर भी धड़ल्ले से पर्चा में लिखते हैं जिनसे अच्छे और खराब दोनों तरह के बैक्टीरिया बेवजह की ऐसी खुराकों के आदी होकर बाद में बड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। वहीं आयुर्वेद में तमाम संभावनाओं के बावजूद लोगों की रुचि पैदा न होना या न करना भी चिन्ताजनक है। 
अब तक कई उदाहरण सामने हैं जिनसे ये साबित होता है कि कि हमारी देशी जड़ी-बूटी से बने चरक के नुस्खे कई बार एलोपैथी के मुकाबले बेहद कारगर साबित हुए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए चरक संहिता विश्व चिकित्सा विज्ञान का मुख्य आधार है। यही कारण है कि कई एलोपैथ डाक्टर भी अब प्राकृतिक बैक्टीरिया रोधक क्षमता के नुस्खों का उपयोग बेझिझक करने लगे हैं। 
अक्टूबर 2017 में इलाज की नई तकनीक और बाजार में मौजूद नई दवाओं के वैज्ञानिक तौर तरीकों पर दिल्ली में हुए 2 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी आधुनिक चिकिसकों ने माना था की कुछ बीमारियों में आयुर्वेद चिकित्सा ज्यादा कारगर है। सर गंगा राम अस्पताल के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष मलिक ने  किडनी की खराबी रोकने के लिए एलोपैथी की बजाए आयुर्वेद की उस दवा को बेहतर बताया जो 5 प्रकार की जड़ी-बूटी से तैयार होती है और बीमारी को आगे बढऩे से रोकती है। एक ऐसी बूटी की चर्चा भी हुई जिससे किडनी की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को जीवित करने में मदद मिलती है। मेरठ में भी जड़ी-बूटियों के प्रयोग के बेहतर नतीजे दिखे। वहां के जाने-माने आधुनिक हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय जैन ने कई मरीजों पर चरक के नुस्खे से तैयार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बनीं दवाओं का इस्तेमाल कर मरीजों के सफल ऑपरेशन किए जिन्हें कोई संक्रमण तक नहीं हुआ। यहां तक कि एक 82 साल के मरीज को प्रोस्टेट के ऑपरेशन के बाद बजाए एंटीबायोटिक के चरक के नुस्खों की जड़ी-बूटियां से बनी देशी दवाएं दी जो कारगर साबित हुई।
निश्चित रूप से यह नतीजे ऐसे समय बेहद उम्मीदें बढ़ा रहे हैं जब समूची दुनिया में नए एंटीबायोटिक्स पर काम लगभग रूका हुआ है और इसको लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जबरदस्त परेशान है। दुनिया भर के मेडिकल जगत के लिए भले ही यह बेहद चिन्ताजनक बात हो लेकिन हमारे लिए संभावनाओं को खोलने का सुनहरा मौका है कि हम विश्व चिकित्सा की आधार चरक संहिता पर खास तवज्जो देकर दुनिया भर के मेडिकल साइंस पर अपना लोहा मनवा सकें।
अब जो भी मौजूदा एंटीबायोटिक्स हैं पूरी दुनिया की उन्हीं पर निर्भरता है। उस पर भी अंधाधुंध और हर रोग में धड़ल्ले से हो रहा उपयोग जहां उसके असर को दिनों दिन घटाता जा रहा है वहीं मेडिकल एक्सपर्ट्स के सामने तमाम बीमारियों के इलाज में इन एंटीबायोटिक के आगे दूसरी दवाओं के असरहीन होते जाने से गंभीर और नई चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसे हर कीमत पर पूरे देश-दुनिया में रोकना होगा जो संभव नहीं दिखता।
 ऐसे में भारत के सामने चुनौती से ज्यादा शानदार मौका है कि हम चरक संहिता और आयुर्वेद के जरिए वर्षों से प्रचलित पध्दति को नए, आधुनिक और असरदार रूप से सामने लाने की दिशा में काम करें और दुनिया भर में चिकित्सा के क्षेत्र में भी अपना डंका बजवा सकें। दुनिया भर के लिए जो एंटीबायोटिक चुनौती है हमारी चरक संहिता में वर्णित जड़ी-बूटियों में बिना साइड इफेक्ट के वो बड़ा वरदान साबित होगा जो भारत को विश्व स्वास्थ्य गुरू और बड़ा बाजार बनाने के लिए भी नया रास्ता होगा। 

 

 

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