संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 अगस्त : आदिवासियों पर चर्चा के लिए एक दिन काफी नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 अगस्त : आदिवासियों पर चर्चा के लिए एक दिन काफी नहीं
Date : 09-Aug-2019

आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर दुनिया के बहुत से देशों में आदिवासियों द्वारा, और उनके लिए तरह-तरह के जलसे किए जा रहे हैं, लेकिन उनके बुनियादी मुद्दे अमेजान के जंगलों से लेकर बस्तर तक, और हिंदुस्तान की सुप्रीम कोर्ट से लेकर हॉलीवुड की फिल्म अवतार तक खतरे में हैं। आज भारतीय सुप्रीम कोर्ट देश के दस लाख से अधिक आदिवासियों को बेदखल करने के एक मामले में लगा हुआ है, और इससे पूरे देश में आदिवासी-गैरआदिवासी तबकों के बीच एक गहरी खाई और चौड़ी होने जा रही है। इससे परे चारों तरफ आदिवासी इलाकों में जंगल और खदान को लेकर धरती के इन मूलनिवासियों के बीच भारी बेचैनी फैली हुई है क्योंकि हजारों बरस से इस जमीन पर इन पेड़ों के बीच रहते चले आ रहे ये समाज आज सब कुछ खो देने का खतरा झेल रहे हैं।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की बात करें तो यहां पर सबसे घने आदिवासी इलाके बस्तर में नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच बेकसूर आदिवासियों का लहू बहते चौथाई सदी से अधिक हो चुका है, और शहरी समाज के लिए ये मौतें महज आंकड़ा हैं। एक बरस से दूसरे बरस ये आंकड़े कुछ कम हो जाते हैं, तो बड़ी-बड़ी वर्दियां उन्हें ही अपनी कामयाबी मान लेती हैं। लेकिन मौतों का यह सिलसिला आदिवासियों के शोषण की जमीन पर पनपा था, और अब फल-फूल रहा है। आज के दिन देश के तमाम नक्सल प्रभावित राज्यों को चार कदम आगे बढ़कर इसके शांतिपूर्ण निपटारे की लोकतांत्रिक पहल करनी चाहिए, और नक्सल हिंसा में झुलसे हुए आदिवासी इलाकों के लिए वही एक बड़े हक की बात हो सकती है। दूसरी बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में उन अरबपति-खरबपति कारखानेदारों की है जिन्होंने साजिश और जालसाजी से आदिवासी जमीन खरीदी है, और जिनके मामले सामने आ जाने के बाद भी सरकारी नरमी का मजा पाते हुए ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि आदिवासियों को धोखा देकर खरीदी गई जमीन पर कारखाने खड़े करने वालों को जेल भेजे ताकि वह बाकी लोगों के लिए एक मिसाल बन सके। छत्तीसगढ़ और हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में जहां-जहां खदानें हैं, वहीं-वहीं जंगल भी हैं, और वहीं-वहीं आदिवासी भी हैं। खनिजों के लिए आदिवासियों को किस तरह बेदखल किया जाता है, यह हिंसानियत धरती से लेकर अवतार फिल्म के दूसरे ग्रह तक दिखाई पड़ती है, और  हर प्रदेश को ऐसी हिंसा खत्म करने के लिए हर कोशिश करनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ में टाटा को जमीन दिलवाने के लिए बस्तर के आदिवासी इलाकों के बीच पिछली सरकार ने एक ऐसे कलेक्टर को तैनात किया था जिसने फर्जी ग्रामसभाएं करवाकर आदिवासी जमीनों की लूट की सरकारी सुपारी उठाई थी, और अब वह फर्जीवाड़ा उजागर हो चुका है। आज सही समय है जब राज्य सरकार ऐसे तमाम जुर्म की सजा तय करे, ताकि प्रदेश में दूसरे कोई कलेक्टर ऐसे जुर्म का हौसला न कर सकें। आदिवासियों से जुड़े हुए मुद्दे बहुत साफ हैं, और तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनसे अच्छी तरह से वाकिफ हैं। लेकिन हमने बस्तर जैसे इलाकों में यह देखा है कि किस तरह वहां के आदिवासी नेता अपने समाज के व्यापक हितों को कारोबारियों के हाथ बेच देने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं। यह सिलसिला उजागर होना चाहिए, इसका भांडाफोड़ होना चाहिए। हम सामाजिक हकीकत से परे एक राजनीतिक हकीकत की बात करें, तो भी आदिवासी समाज और इलाकों की अब तक चली आ रही अनदेखी किसी पार्टी को सत्ता में आने से रोक सकती है, यह पिछले चुनावों के नतीजों से साफ हो चुका है। इसलिए किसी और वजह से न भी हो, तो भी अपने खुद के राजनीतिक अस्तित्व के लिए नेताओं और पार्टियों को आदिवासी मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। यह केवल जरा से मुद्दे हैं, आदिवासियों से जुड़े और भी कई मुद्दे हैं जिन्हें उठाना चाहिए और महज साल का एक दिन इन पर चर्चा के लिए काफी नहीं है।
-सुनील कुमार

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