विचार / लेख

क्या वनाधिकार मान्यता कानून आदिवासियों  पर हुए अन्याय को मिटा पाएगा?
क्या वनाधिकार मान्यता कानून आदिवासियों पर हुए अन्याय को मिटा पाएगा?
Date : 09-Aug-2019

-विजेंद्र अजनबी
वर्ष 2006 में बनाए गए वनाधिकार कानून ने आस जगाई थी कि इस देश में पीढिय़ों से वनभूमि पर अपने अधिकार से वंचितों को न्याय मिलेगा,और एक सबसे बड़े भूमि-सुधार आंदोलन को दुनिया देखेगी। पर दुर्भाग्य देखिए, वही वनाधिकार कानून का सरकारी कारिंदों की मनमानी के चलते ऐसा दुरूपयोग हो रहा है कि, आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को बरकरार रखा जा रहा है।
जी हां।  यह सच है, आज देश में वनाधिकार कानून का उपयोग, आदिवासियों को अपनी ही जमीन से उनके पुश्तैनी अधिकार को नकारने के लिए किया जा रहा है। देश का तो पता नहीं, पर छत्तीसगढ़ में ऐसा ही हो रहा है। त्रासदी यह है, कि राज्य में अब कांग्रेस की सरकार है, जिसने चुनावी वादे किए थे कि वनाधिकार का न्यायपूर्ण क्रियान्वयन होगा। जंगल पर अपनी जीविका और पहचान के लिए निर्भर जनता को आस बंधी कि उनके साथ जो अब तक अन्याय हुआ, उसका अंत होगा। शायद, इसी उम्मीद ने कांग्रेस को राज्य में इतना बड़ा जनादेश दिया। क्योंकि, यही वह दल था, जिसके प्रयास ने संसद से 2006 में वनाधिकार कानून पारित करवाया। 
उधर, देश की सर्वोच्च अदालत में चल रहे वनाधिकार कानून मामले की सुनवाई के दौरान, राज्यों को क्रियान्वयन की स्थिति, विशेष कर निरस्त दावों पर जानकारी देना पड़ रहा है।  इस फेर में, गांवों तक दौड़-दौड़ कर मैदानी अमले के कर्मचारी, लोगों को उनके दावे खारिज होने की सूचना बांटने लगे। दावे निरस्त करने के इतने सालों बाद, जब कोर्ट का डर सताने लगा तो, यह लोक सेवक अपनी गलती छुपाने के लिए वनाधिकार कानून के प्रावधान का इस्तेमाल लोगों के खिलाफ करने लगे हैं। 
कल मेरी मुलाकात हरिराम से हुई। उम्र कोई 65 वर्ष होगी। हरिराम, सरगुजा जिले के बतौली ब्लॉक के बिल्हमा गांव के रहवासी है। आदिवासी समुदाय के हरिराम पीढिय़ों से बिल्हमा में ही रह रहे हैं। बातचीत करते, हरिराम ने धीरे से बताया कि वनाधिकार का उनका दावा निरस्त कर दिया गया है। और पूछने पर उन्होंने निरस्त होने का नोटिस दिखाया, जो उन्हें पिछले जून माह में घर पर ला कर दिया गया था। उन्हें ही क्यों, बिल्हमा गांव के 194 परिवारों को ऐसे नोटिस थमाए गए हैं! खैर, नोटिस में तारीख दर्ज है 25 मई 2014! बड़ी चालाकी से, हरिराम से धोखा किया गया कि, वह इस नोटिस के खिलाफ अपील न कर सके। क्योंकि, अपील के लिए दो माह की समय-सीमा रहती है। और, जब तक वनाधिकार की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, कोर्ट भी नहीं जाया जा सकता है। इस नोटिस को छू कर ही कोई बतादेगा कि 5 साल पुराना कोई कागज इतना कड़क और नया कैसे लग सकता है?
हरिराम ने मुझे एक प्रार्थना-पत्र भी दिखाया, जो उसने वहां के थाना प्रभारी को वर्ष 1997 में लिखा था। हरिराम ने शिकायत की थी कि वन-विभाग के कर्मचारी ने खेतों में उसकी खड़ी फसल को मवेशी से चरा दिया था, क्योंकि उस पर आरोप था कि उसने जंगल में पेड़ काट कर खेत तैयार किया था। क्या हरिराम के द्वारा संभालकर रखा गया यह शिकायत पत्र सबूत के लिए काफी नहीं, कि वह 13 दिसंबर 2005 के पहले से इस वनभूमि पर काबिज था? जैसा कि कानून के अनुसार उसके दावेदार होने के लिए जरुरी है। हरिराम के पास गनीमत है यह कागज तो है, वरना, कितने ऐसे आदिवासी परिवार है, जिनके पास कागज के तौर पर कोई सबूत सुरक्षित नहीं है। हरिराम को दिए गए नोटिस में लिखा है काबिज नहीं है। और ऐसा ही लिखा है अधिकतर नोटिस में, जो 194 परिवारों को जून महीने में वर्ष2014 की तारीख पर दिए गए हैं। कमाल है न ! जंगल के किनारे बसा पूरा गांव ही वनभूमि पर काबिज नहीं है ! क्या इस देश की सर्वोच्च अदालत सुन रही है?  वही अदालत, जो चंद दिनों में इन वन निर्भर लोगों के भविष्य को अपने फैसले में हमेशा के लिए दफऩ करने वाली है। 
ऐसी हजारों कहानियां है, कहां तक पहुंचे? किसको बताएं। सरकारी रिकॉर्ड में सरगुजा, सूरजपुर और बलरामपुर जिलों में कुल एक लाख दावे निरस्त किए गए हैं। पता नहीं, कितनों की कहानियां हरिराम की तरह होगी। लखनपुर ब्लॉक के तिरकेला ग्राम के सरपंच ने बताया, उसके गांव के भी 65 परिवारों के दावे ख़ारिज कर दिए गए, जिसकी सूची जून के महीने में सचिव ने ला कर दिया। निरस्त करने का कारण लिखा हुआ है, 'ग्रामसभा द्वारा निरस्त किया गया'। सरपंच को डर सता रहा है कि ऐसी कोई ग्रामसभा हुई नहीं, और न ही कभी दावे निरस्त किए गए। अपने गांव के लोगों को क्या जवाब दें। दबी जुबान में कह रहे हैं, कि ऊपर का आदेश है। यह कैसा आदेश है, जिसमें दावे ख़ारिज किए जा रहे हैं। गांव के लोग यह भी नहीं जानते कि कहां आवेदन करें।
बलरामपुर जिले के चम्पापुर गांव के लोग आज़ादी के पूर्व से ही बसे हैं। सेमरसोत अभ्यारण्य के नाम पर उन्हें बेदखल करने की कोशिश वन विभाग पहले कर चुका है। उनके वन अधिकार के दावों को नकार कर अब भी उन्हें हटाने की साजिश जारी है। जैसा कि उन्हें थमाए गए नोटिस देख कर पता चलता है। जिसमें दावा ख़ारिज करने का कारण लिखा गया है-'वनाधिकार मान्यताअधिनियम की धारा 4(2) के कारण उनका दावा मान्य नहीं किया जा सकता' जिसने भी वनाधिकार कानून पढ़ा है, वह जानता है कि धारा 4(2) प्रावधान करता है कि सिर्फ उसी संरक्षित क्षेत्र में, जहां वन्यजीवों के साथ सहजीवन संभव न होने के पर्याप्त वैज्ञानिक कारण मौजूद हो, उसे अनतिक्रांत क्षेत्र मान कर, अधिकार मान्य होने के बाद ग्रामसभा की सहमति से पुनर्वास किया जा सकता है।
 दरअसल, वनाधिकार कानून किसी भी प्रकार की वनभूमि पर दावों को मान्य करता है, चाहे वे अभ्यारण्य या राष्ट्रीय उद्यान ही क्यों न हों। पर, चम्पापुर के ही राजपाल को थमाए गए निरस्त दावे के नोटिस में लिखा है 'सेंक्चुरी होने के कारण'!
क्या ऐतिहासिक अन्याय को वनाधिकार के नाम पर बदस्तूरजारी नहीं रखा जा रहा है? क्या मी लार्ड सुन रहे हैं।
(छत्तीसगढ़ में ऑक्सफैम इंडिया के साथ काम करते हैं।)

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