विचार / लेख

‘घर से भागकर विवाह करना’
‘घर से भागकर विवाह करना’
Date : 10-Aug-2019

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

हरिशंकर परसाई की पुण्यतिथि पर विशेष

सन 1981 की बात है, हरिशंकर परसाई को मैंने बिलासपुर निमन्त्रित करने हेतु पत्र लिखा तो उन्होंने पारिश्रमिक की मांग रखी।  तो उसके उत्तर में मैंने उन्हें याद दिलाया- ‘हम आपको कवि सम्मलेन नहीं वरन भाषण देने के लिए आमन्त्रित कर रहे हैं’ तो उन्होंने जवाब दिया- ‘महोदय, न तो मैं कहीं नौकरी करता और न ही मेरी कोई दूकान है। लिखना और बोलना ही मेरा रोजगार है, इसे समझकर निर्णय लीजिए।’
हमने उनकी बात मानी और उन्हें बुलाया। राघवेन्द्रराव सभाभवन में सैकड़ों नागरिकों की उपस्थिति में वह कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय गल्र्स कॉलेज के हिंदी विभाग की अध्यक्ष ने उनके कॉलेज में भी हरिशंकर परसाई का भाषण रखवाने का मुझसे अनुरोध किया। मैंने परसाईजी से बात की तो थोड़ी ना-नुकुर के बाद उन्होंने अगली दोपहर एक बजे का समय दे दिया।
गल्र्स कॉलेज में प्रारंभिक संबोधन आदि की औपचारिकता के पश्चात परसाईजी ने कहा- ‘बुजुर्ग होने के नाते तुम बच्चियों को मेरी सलाह है कि तुम लोग अपने माता -पिता की मर्जी से नहीं बल्कि घर से भागकर विवाह करना।’
उनके प्रथम वाक्य को सुनकर लड़कियों से भरा सभागार हंसी-ठहाके से सराबोर हो गया।  मेरी जान सूख गई और मैं बाहर भागने के उपाय देखने लगा पर अपनी सांस थामे बैठे रहा। 
शान्ति स्थापित होने के पश्चात परसाईजी ने बात आगे बढ़ाई-‘मैं जबलपुर के नेपियर टाउन में रहता हूँ। प्रत्येक सुबह मैं सैर के लिए जाया करता हूँ। मेरी ही उम्र के एक पड़ोसी भी मेरे साथ जाया करते थे। लौटकर पड़ोसी के घर में चाय और गपशप होती थी। उनकी विवाह योग्य दो कन्याएं थी जो कॉलेज में पढ़ती थी जो हमारे लिए चाय लाया करती थी। अचानक पड़ोसी महोदय ने सुबह घूमने जाना बंद कर दिया और लंबे समय तक विलुप्त रहने के पश्चात एक सुबह फिर मिल गए। मैंने उनसे पूछा- ‘कहाँ थे इतने दिन, दिखाई नहीं पड़े ?’
- मैं मुंह दिखाने लायक न रहा, परसाईजी। वे बोले।
- क्या हुआ ?
- कुछ न पूछिए, अपनी दुर्दशा क्या बताऊँ?
- बताने लायक हो तो बताओ।
- अब आप से क्या छुपाना, दो लडक़े मेरे घर आया जाया करते थे। मेरी दोनों लड़कियों ने घर से भागकर उनके साथ विवाह कर लिया।
- तो क्या गलत हुआ? आपकी लड़कियों ने ठीक किया।
- आप क्या कहते हैं, परसाईजी? एक तो मेरे घर इतना बड़ा काण्ड हो गया, आप उपहास कर रहे है।
- नहीं, ऐसी बात नहीं, अच्छा, एक बात बताओ, लड़कियों की शादी के लिए कितना पैसा इक_ा किया था?
- नहीं, पास में तो कुछ नहीं था लेकिन जरुरत पडऩे पर ‘प्रॉविडेंट फंड’ से कर्ज लेता।
- और गहने?
- श्रीमती के जो आभूषण हैं, उन्हीं से काम चलाते।
- फिर तो आप की बच्चियों ने बहुत ही अच्छा काम किया। आपके पैसे और आभूषण दोनों बच गए और लडक़े खोजने में दस-बीस घटिया लोगों के पैर पकडऩे पड़ते, आप उससे भी बच गए।
- वो सब ठीक है परसाईजी, लेकिन समाज में मेरी इज्जत चली गई, उसका क्या ? मेरी तो किसी से बात करने की हिम्मत नहीं होती।
- चलिए छोडि़ए समाज को, बच्चियां कहां हैं ?
- उनका तो नाम मत लीजिए, वे दोनों मर गई हमारे लिए।
फिर किसी एक सुबह जब मैं अपने मित्र के साथ प्रात: भ्रमण के पश्चात उनके घर गया तो देखता हूँ कि उनकी दोनों लड़कियां नास्ते और चाय की ट्रे लेकर चली आ रही हैं। लड़कियों के वहां से चले जाने के बाद मैंने उनसे पूछा-
- अरे ये क्या, आप तो कह रहे थे कि आपके लिए दोनों लड़कियां मर गई ?
- हां परसाई जी, उस समय मैं गुस्से में था लेकिन बाद में समझ आया कि मेरी लड़कियों ने बुद्धिमानी की। कहां से मैं उनके लिए दहेज जोड़ता कहां मैं दो-दो लड़कियों के लिए वर खोजता ? सब मिलाकर ठीक ही हुआ।
इसीलिए मैंने तुम सब को घर से भागकर शादी करने की सलाह दी। मेरी इस बात को सुनकर तुम सबको जो हंसी आई तो वह ‘हास्य’ है और यदि मेरी बात पर तुम्हें लड़कियों के मां-बाप की दयनीय स्थिति याद आए, समाज में लड़कियों के विवाह में प्रचलित कुरीतियां याद आएं, वह मजबूरी याद आए जब घर से भागकर शादी करने वाली लडक़ी को उसका बाप बुद्धिमान माने, आपको मेरी सलाह पर हंसी न आए, दिल कचोट जाए- तो वह ‘व्यंग्य’ है।
जब हास्य और व्यंग्य का अंतर स्थापित हो गया, कुछ क्षणों के लिए सभागार में सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद एक ताली बजी और उसके बाद असंख्य तालियों की गडग़ड़ाहट से पूरा कालेज गूंज उठा। हरिशंकर परसाई अपने अर्थपूर्ण शब्दों के माध्यम से श्रोताओं के ह्रदय में उतर गए।

(आत्मकथा- ‘कहाँ शुरू कहाँ खत्म’  का एक अंश)

 

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