संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  11 अगस्त : सोनिया के आने के मायने
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 अगस्त : सोनिया के आने के मायने
Date : 11-Aug-2019

कांग्रेस पार्टी ने कल सुबह से शाम तक मशक्कत करके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी एक बार फिर सोनिया गांधी पर डाली है जो कि कार्यकारी अध्यक्ष रहेंगी, और हो सकता है कि पार्टी सचमुच ही एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की तलाश करे, और न भी करे तो भी कम से कम सोनिया को महज कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। बहुत से लोगों को यह बात एक नाटक लग सकती है, और कांग्रेस के आलोचकों को इस पर मजाक उड़ाने का एक अच्छा मौका मिल गया है। सोनिया गांधी 19 बरस तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, और यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि राजीव गांधी के जाने के बाद उन्होंने अपने को और अपने बच्चों को राजनीति से अलग ही कर लिया था, और पी.वी. नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ दबी-छुपी हरकतें की भी थीं। विद्याचरण शुक्ल के मार्फत राव ने बोफोर्स को लेकर कई ऐसी अफवाहों को जिंदा करने की कोशिश की थी जिनसे सोनिया गांधी के लिए एक दिक्कत खड़ी हो। लेकिन बेअसर रहकर ऐसी बातें वक्त के साथ दम तोड़ गईं, और नरसिंहराव के बाद एक वक्त ऐसा आया जब कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व के लिए एक बार फिर सोनिया गांधी की मोहताज हुई, लौटकर उनके दरवाजे पहुंची। सोनिया ने पार्टी की अगुवाई करते हुए उसे सत्ता का वापिस पहुंचाया, और यूपीए ने दो-दो कार्यकाल पूरे किए। इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि विदेशी मूल की सोनिया गांधी भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की महज बहू थीं, और अनचाहे हालातों के चलते वे राजनीति में आने को मजबूर हुई थीं। और शायद जिस वक्त उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल के फैसले की घोषणा हो जाने के बाद भी दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र की प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया, वह दुनिया का शायद सबसे बड़ा इंकार था। उन्होंने पूरे दिल से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, जो कि तमाम पैमानों पर उन हालातों में उस पार्टी के भीतर की सबसे अच्छी पसंद थे। उनके पहले कार्यकाल के बाद सोनिया ने पार्टी और गठबंधन की अगुवाई करते हुए यूपीए को दूसरी बार सत्ता पर पहुंचाया था, और उस वक्त भी वे खुद किसी सरकारी ओहदे पर आने, या राजनीति में आ चुके अपने बेटे को मंत्री बनाने या किसी और सरकारी ओहदे पर बिठाने के मोह से पूरी तरह अछूती और बची रहीं। इन तमाम बातों को देखते हुए सोनिया गांधी का मूल्यांकन आज के संदर्भ में किया जाना चाहिए जब भारत की चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने भारतीय संसदीय ढांचे को ठीक उसी तरह एकध्रुवीय बना दिया है जिस तरह दुनिया मेें अमरीका एकध्रुवीय व्यवस्था बन चुका है। 

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता पर वापिसी न होने को लेकर उसकी बड़ी आलोचना हुई, और खासकर उसके अध्यक्ष राहुल गांधी की। यह इसलिए हुआ कि कांग्रेस के चाहे या अनचाहे, देश के मीडिया में मोदी के मुकाबले राहुल तस्वीर पेश की गई थी, और जब चुनावी नतीजे निकले तो मोदी के मुकाबले राहुल कहीं नहीं टिके, राहुल की पार्टी कहीं नहीं टिकी, राहुल का यूपीए गठबंधन कहीं नहीं टिका। लेकिन इसके साथ-साथ पिछले लोकसभा चुनाव में यह बात भी साफ हुई कि राहुल से बिल्कुल परे का अखिलेश-मायावती गठबंधन भी मोदी के मुकाबले कहीं नहीं टिका, राहुल से परे की एक पार्टी, लालू की आरजेडी कहीं नहीं टिकी, पश्चिम बंगाल में ममता ने गहरी शिकस्त झेली, दक्षिण भारत में कांग्रेस से परे की पार्टियां भी मोदी से हारीं। लेकिन मीडिया के मार्फत जिस तरह की जनधारणा मोदी और राहुल के मुकाबले की बनाई गई थी, उसके मुताबिक शिकस्त केवल राहुल के नाम दर्ज की गई। हमने उस वक्त भी आंकड़े गिनाते हुए लिखा था कि कांग्रेस ने पांच बरस पहले के लोकसभा चुनाव के पहले के मुकाबले अपनी हालत सुधारी थी, और राहुल गांधी के लिए इस्तीफा देने की बात नहीं की। राहुल गांधी को ऐसे नाजुक मौके पर इस्तीफा नहीं देना चाहिए था। लेकिन देश में समय-समय पर पार्टियों और सरकारों में बहुत से नेताओं ने किसी हादसे या हार की जिम्मेदारी लेते हुए कभी रेलमंत्री की कुर्सी छोड़ी, तो कभी पार्टी की। ऐसा कम ही होता है कि पार्टी के नेता हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष का पद छोड़ दें, लेकिन राहुल गांधी ने वैसा किया था, उस पर अड़े रहे, और नया अध्यक्ष चुनने से कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने को अलग भी कर लिया।

ऐसे हालात में कांग्रेस ने काफी मशक्कत करके नया अध्यक्ष चुनने की कोशिश की, और शायद ऐसी सर्वसम्मति नहीं जुट पाई कि वे किसी एक नाम को कल शाम घोषित कर पाते। ऐसे में उन्होंने खासे अर्से से बीमार चल रहीं सोनिया गांधी पर एक बार फिर पार्टी की अगुवाई करने का जिम्मा डाला है, जो कि बहुत बुरा फैसला भी नहीं है। कोई भी पार्टी अध्यक्ष अपने भीतर से ही चुन सकती है, और कांग्रेस पार्टी एक कामयाब अमित शाह को तो अपना अध्यक्ष बना नहीं सकती, इसलिए उसने अपने भीतर से ही अध्यक्ष चुना, चाहे वह पूर्णकालिका हो, चाहे कार्यकारी। यह समझने की जरूरत है कि राजनीतिक दलों के बीच नेहरू-गांधी परिवार को जिस कुनबापरस्ती के लिए कोसा जाता है, वह तो भारतीय राजनीति के डीएनए में शुमार एक खूबी या खामी है जिससे बहुत सी पार्टियां कभी नहीं उबर पातीं। कांग्रेस में चाहे दिखावे के लिए ही सही, बीच-बीच में बहुत से दूसरे अध्यक्ष रहे। लेकिन शिवसेना को देखें, बसपा को देखें, तेलुगुदेशम को देखें, एडीएमके को देखें, डीएमके को देखें, नेशनल कांफ्रेंस को देखें, पीडीपी को देखें, अकाली दल को देखें, सपा को देखें, आरजेडी को देखें, टीएमसी को देखें, या आन्ध्र-तेलंगाना की दूसरी पार्टियों को देखें, एक कुनबा, एक नेता, पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत से परे क्या दिखता है? पार्टी अध्यक्ष के पद को छोड़ दें, तो पूरी की पूरी भाजपा केन्द्रीय राजनीति से लेकर हर राज्य तक दूसरी, तीसरी, और चौथी पीढ़ी के नेताओं से भरी हुई हैं, उन्हीं कुनबों के लोग पार्टी संगठन में, संसद में या विधानसभाओं में पहुंचते हैं, और भाजपा के भीतर महज अध्यक्ष का ही एक पद तो है जो कि कुनबापरस्ती का नहीं है, बाकी तो तमाम टिकटें, तमाम पद कुनबापरस्ती के डीएनए से ग्रस्त हैं ही। इसलिए नेहरू-गांधी परिवार की कुनबापरस्ती अब फिजूल की बात हो गई है, पूरी भारतीय राजनीति ही कुनबापरस्त है, व्यक्तिवादी है, एक व्यक्ति पर केन्द्रित है, और उसे अलोकतांत्रिक हद तक जाकर नेता बनाए रखने वाली है। 

अब सोनिया गांधी की चर्चा करें, तो वे इंदिरा के बाद और मोदी के पहले के पूरे दौर में सबसे कामयाब पार्टी अध्यक्ष रही हैं। मोदी को कोई पैमाना मानकर सोनिया या कांग्रेस या राहुल की उनसे तुलना जायज नहीं है क्योंकि मोदी अभूतपूर्व हैं, और उन्होंने भारतीय राजनीति के खेल के सारे नियम-कायदे, सारे बैट-बल्ले सब कुछ बदलकर रख दिए हैं, और वे अपनी तरकीबों के साथ अतुलनीय हैं, बेमिसाल हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लोकतंत्र में दूसरी पार्टियां शटर गिराकर घर बैठ जाएं। कांग्रेस का कल का फैसला उसकी सीमाओं और संभावनाओं को देखते हुए उसका सबसे अच्छा फैसला है। न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के भीतर, बल्कि कांग्रेस पार्टी के बाहर, और उसकी अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन में भी सोनिया सबसे अधिक स्वीकार्य नेता हैं, सबसे अधिक धीर-गंभीर नेता हैं, और सबसे अधिक कामयाब साबित नेता भी हैं। एक पार्टी अपने कार्यकारी अध्यक्ष को कब तक बनाए रखे यह उसकी अपनी प्राथमिकता है। ऐसे में सोनिया की शक्ल में इस देश की राजनीति को विपक्ष की एक मजबूत अगुवाई मिली है जो कि यूपीए को भी एक नई ताकत देंगी, और जो यूपीए के बाहर की पार्टियों से भी एक बेहतर तालमेल की संभावना रखती हैं। 

सोनिया के इस जिम्मेदारी को सम्हालने के साथ ही सोशल मीडिया पर उनका मखौल उड़ाने की भी एक नई और बहुत बड़ी संभावना खड़ी हुई है, और लोकतंत्र में लोग उसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है, और लोकतंत्र का मतलब ही आलोचना, कटु आलोचना, और नाजायज आलोचना तक की छूट रहता है, और आज हो सकता है कि लोगों को महज सोनिया गांधी एक ऐसा सुरक्षित निशाना दिख रही हैं जहां से उन पर कोई कानून या गैरकानूनी वार होने का खतरा न हो। अच्छा है लोगों को आज किसी के तो खिलाफ खुलकर लिखने का मौका मिले, और सोनिया गांधी ने पिछले दशकों में कई किस्म के वार झेले हैं, और उनके सामने यह मिसाल भी है कि किस तरह नेहरू उनके खिलाफ बने हुए सबसे कड़वे और सबसे अन्यायपूर्ण कार्टूनों की भी तारीफ करते थे। आने वाले दिन देश की राजनीति में, लोकतंत्र में सोनिया गांधी की एक महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करेंगे।  
-सुनील कुमार

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