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दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 अगस्त : मशीनें इंसानों को बेहतर बनने कर रही हैं मजबूर
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 अगस्त : मशीनें इंसानों को बेहतर बनने कर रही हैं मजबूर
Date : 13-Aug-2019

क्रिकेट की दुनिया से एक खबर है कि बॉल में अब एक माइक्रोचिप लगने जा रहा है जिससे बॉलिंग की हर किस्म की जानकारी कम्प्यूटर पर दर्ज होते रहेगी। अंपायरों को भी फैसले लेने में इससे मदद मिलेगी। अभी वैसे भी क्रिकेट के बल्ले और विकेट में सेंसर लगा हुआ है, विकेट में तो कैमरा और माइक्रोफोन भी लगा हुआ है, और हाल ही में निपटे विश्वकप में यह देखने मिला कि अंपायरों के कई फैसलों को कम्प्यूटरों और कैमरों ने आनन-फानन गलत भी साबित कर दिया। एक वक्त अंपायर की ऊंगली आसमान की तरफ ठीक उसी तरह उठती थी जिस तरह फांसी देने वाले जल्लाद को इशारा करने के लिए जेलर की ऊंगली उठती थी, अब धीरे-धीरे हो सकता है कि अंपायर मैदान से गायब ही हो जाए।

दुनिया के दूसरे कई दायरों में अगर देखें, तो अब मीडिया के न्यूज रूम में खबरों को बनाने का काम करने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आ गए हैं जो कि तथ्यों को लेकर समाचार ड्राफ्ट कर देते हैं। धीरे-धीरे कैमरापरसन की जरूरत कम होते चल रही है क्योंकि लोग मोबाइल कैमरों से भी रिकॉर्डिंग करने लगे हैं। टीवी चैनलों की जरूरत कम हो चली है क्योंकि लोग खुद ही अपने यू-ट्यूब चैनल बनाकर उस पर आनन-फानन पोस्ट कर देते हैं, या फेसबुक और ट्विटर पर लाईव प्रसारण करने लगते हैं। कुल मिलाकर मशीनों ने इंसान की जरूरत को कई दायरों में घटाना शुरू कर दिया है, और यह बढ़ते ही चलना है। बहुत से दायरे ऐसे रहेंगे जिनमें आखिर तक इंसान लगेंगे ही लगेंगे, लेकिन बहुत से दायरों से वे बाहर होने जा रहे हैं। इसके अलावा यह बात समझने की जरूरत है कि आज क्रिकेट अंपायर के फैसलों को तकनीक जिस बारीकी से और जिस रफ्तार से सही या गलत साबित कर रही है, वैसा ही कई और दायरों में हो सकता है। अखबार में लिखी गई खबरों में से हिज्जों की गलती, व्याकरण की गलती, या तथ्यों की गलती निकालने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आज भी मौजूद हैं, और ये धीरे-धीरे कृत्रिम इंटेलीजेंस की मदद से और उत्कृष्ट होते चलेंगे।

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि इंसानों को अपने कामकाज को सुधारने और बेहतर बनाने की पहले से कहीं अधिक, बहुत अधिक जरूरत इसलिए आन खड़ी हुई है कि अब मशीनें उसके काम को तौलने लगेंगी। मोबाइल फोन से छोटा उपकरण यह बता देगा कि दीवार उठाने वाले राजमिस्त्री ने ईंटों को तिरछा तो नहीं लगाया है, या टाईल्स फिट करने वाले मिस्त्री ने सतह ठीक रखी है या नहीं। अब औना-पौना, कामचलाऊ काम आसानी से पकड़ में आ जाएगा। इसलिए टेक्नॉलॉजी जहां-जहां इंसानों को बेदखल नहीं भी करेगी, वहां-वहां उसकी चूक को, उसकी लापरवाही को पकड़ सकेगी।

इस सिलसिले में एक छोटी सी मिसाल देना ठीक होगा जिससे आज बहुत से लोग वाकिफ नहीं होंगे। हिंदुस्तान में बाजार में मौजूद छोटी कारों में से कुछ कारें ऐसी भी हैं जिनमें भीतर एक छोटा सा उपकरण लगा हुआ है जो कि किसी मोबाइल फोन से जोड़ा जा सकता है, और लोग अपने घर बैठे फोन पर देख सकते हैं कि उनकी कार कहां पर है, किस रफ्तार से चल रही है, उसमें ईंधन कितना बचा है, क्या उसकी कहीं टक्कर हुई है, या उसके इंजन में कोई बड़ी गड़बड़ी तो नहीं हो गई है। आज मौजूद बड़ी साधारण सी कार के लिए फोन पर एक सीमा तय की जा सकती है कि कार किस रफ्तार से अधिक पहुंचने पर फोन पर अलर्ट आ जाए, या कितने किलोमीटर के दायरे से बाहर निकलते ही फोन पर अलर्ट आ जाए। इस किस्म की निगरानी, इस किस्म की जांच धीरे-धीरे तमाम आम उपकरणों में आने जा रही है, और इनके साथ काम करने वाले इंसानों को अपने-आपको बेहतर करना होगा, क्रिकेट के अंपायरों की तरह।

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