विशेष रिपोर्ट

बिलासपुर, पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ, 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर
बिलासपुर, पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ, 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर
Date : 16-Aug-2019

पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ 

 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 16 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पेन्ड्रा इलाके को जिला बनाने के 21 साल पहले मप्र विधानसभा में लिये गए निर्णय को अमल में लाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा दांव खेला है। जो काम अजीत जोगी अपने तीन साल और डॉ. रमन सिंह 15 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में नहीं कर पाये सात माह के भीतर उन्होंने कर दिखाया है। जोगी दम्पत्ति ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है, वहीं लोग आंकलन में लगे हैं कि इस निर्णय का राजनीतिक असर क्या होने वाला है। प्रशासनिक दृष्टि से जिले के रूप में बिलासपुर का कद घट जायेगा लेकिन संभाग के रूप में उसका वर्चस्व बना रहेगा। इस घोषणा के बाद प्रदेश के दूसरे स्थानों से जिला बनाने की मांग बलवती होने लगी है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी में 16 अगस्त को इसी मुद्दे पर एक बैठक भी रखी गई है। 

दो दिन से पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही इलाके में जश्न का माहौल है। आदिवासी बाहुल्य, वनाच्छादित इस क्षेत्र के लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी हो गई है। स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही नाम से एक नया जिला बनाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही प्रदेश में अब 27 की जगह 28 जिले हो जायेंगे। वर्तमान जिला मुख्यालय बिलासपुर से पेन्ड्रा की दूरी नई सडक़ के रास्ते 101 किमी तथा मरवाही की 135 किलोमीटर है। मरवाही विकासखंड के अंतिम ग्राम बेलझिरिया की दूरी जिला मुख्यालय से 240 किमी है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के कारण करीब चार दशक से इसे अलग जिला बनाने की मांग होती रही है। इसके लिए अधिवक्ता संघ, सर्वदलीय नागरिक मंच आदि ने आंदोलन तो किये ही हैं, हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। सभी राजनीतिक दल इस मांग का समर्थन तो करते रहे लेकिन जिले का निर्माण नहीं किया गया। 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी स्वयं इसी क्षेत्र से आते हैं, पर वे भी अपने तीन साल के कार्यकाल में इस मांग को पूरी नहीं कर पाये। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में नौ नये जिलों की घोषणा की थी लेकिन पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही को छोड़ दिया था। उनके इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता रहा। कुछ लोग इसके पीछे तर्क देते हैं कि मरवाही इलाके में कुछ भी हो जाये, जोगी का प्रभुत्व बरकरार रहेगा, इसलिए जिला बना देने से भी किसी दूसरे को राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला है। अब यह देखना है कि मुख्यमंत्री बघेल ने सिर्फ चुनावी वायदा पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया है या फिर इसके पीछे जोगी परिवार के तिलस्म को तोडऩे का मकसद भी है। 

केबिनेट की पिछली बैठक में मुख्यमंत्री बघेल ने लम्बित जाति विवाद के मामलों को एक माह के भीतर निपटाने का निर्णय लिया था, जिसे जोगी को लेकर चल रहे जाति विवाद से भी जोडक़र देखा गया था। इसके बाद अब यह दूसरा फैसला मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके के मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर मोड़ पायेगा या नहीं देखना दिलचस्प होगा। 

दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला की पहल पर पेन्ड्रारोड को जिला बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था और इसके बाद तीन जुलाई 1998 को राजपत्र में जिला बनाने की अधिसूचना प्रकाशित भी की जा चुकी थी। इसी दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, जिसके चलते अधिसूचना के अमल पर विराम लग गया। अब पहली बार निर्वाचित कांग्रेस की सरकार ने 21 साल बाद इस बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा कर दिया है। जिले के नाम को लेकर भी खींचतान रही है, जिसे देखते हुए इसे पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही जिला जैसा लंबा नाम देकर सबको संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही के विधायक अजीत जोगी 15 अगस्त को कोटा विधायक डॉ. रेणु जोगी के साथ पेन्ड्रा में ही थे। जोगी ने इस घोषणा पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि अब उन्हें भरोसा हो गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की करनी और कथनी में कोई फर्क़ नहीं है। वे जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कोटा की विधायक डॉ. रेणु जोगी ने भी कहा कि इस घोषणा से उनके जीवन का बहुत बड़ा संकल्प आज पूरा हो गया है।  नये जिले की घोषणा होते ही दो दिन से पेन्ड्रारोड में जश्न का माहौल है। लोगों ने रैलियां निकाली, मिठाईयां बांटी और आतिशबाजी की। 

नये जिले का कलेक्टोरेट फिलहाल गुरुकुल में बनाये जाने की संभावना है। यहां काफी जगह है। वैसे यहां पहले से ही अतिरिक्त जिलाधीश, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के कार्यालय हैं, साथ ही जिला स्तर के कई संस्थान भी स्थापित हैं।  पेन्ड्रा को नया जिला बनाने से बिलासपुर जिले का तीसरी बार विभाजन हो चुका है। पहले बिलासपुर जिले के अधीन जांजगीर-चाम्पा, कोरबा और मुंगेली आते थे, जो अलग जिले बनाये जा चुके हैं। पहले दो सन् 1998 में संयुक्त मध्यप्रदेश के दौरान तथा मुंगेली को छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2011 में जिला बनाया गया। पुराने जिले का पंडरिया वाला हिस्सा कबीरधाम (कवर्धा) जिले में शामिल किया जा चुका है। नये जिले में कोटा अनुभाग को शामिल किये जाने की संभावना नहीं है किन्तु कोटा विधानसभा के कुछ क्षेत्र नये जिले में आएंगे।
 नये जिले में पेन्ड्रा और मरवाही को अलग-अलग अनुभाग में बांटा जा सकता है। जिला मुख्यालय बिलासपुर पहुंचने में कई दूरस्थ गांवों के लोगों को पूरा एक दिन लग जाता है। जिला स्तर के अधिकारी भी इस क्षेत्र का दौरा करने से कतराते हैं। भौगोलिक दूरी, दुर्गम और पहुंचविहीन गांवों से भरे यह इलाका अब विकास की नई ऊंचाईयों को छू सकता है।

बिलासपुर जिला इस विभाजन के बाद छोटा हो जायेगा। हालांकि इससे वर्तमान का सिर्फ एक अनुभाग पेन्ड्रा ही अलग होने जा रहा है, पर यहां की अधिकांश आबादी नये जिले में चली जायेगी। मुंगेली जिले के गठन के बाद अचानकमार अभयारण्य का अधिकांश हिस्सा बिलासपुर से कट चुका है, नये जिले में अभयारण्य के बाकी हिस्से भी जा सकते हैं। फिलहाल शिवतराई तक का हिस्सा बिलासपुर के पास है। जिले में तखतपुर-कोटा, बिल्हा, मस्तूरी, बिलासपुर अनुभाग शेष रहेंगे। धार्मिक नगरी रतनपुर के बिलासपुर का हिस्सा बने रहने की संभावना है।
 जिला छोटे हो जाने के बावजूद बिलासपुर का महत्व बरकरार रहेगा। पेन्ड्रारोड में रेल कनेक्टिविटी है किन्तु वहां बहुत सी एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती हैं। हालांकि नया जिला बनने के बाद रेलवे वहां अपनी सुविधा का विस्तार कर सकता है। कटनी, दिल्ली रूट का यह प्रमुख स्टेशन है। पर्यटन स्थल अमरकंटक के लिए पर्यटक यहीं पर उतरते हैं। बिलासपुर संभागीय मुख्यालय भी है। पहले से पांच जिले बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा, मुंगेली और रायगढ़ इसके अधीन हैं अब छह जिले हो जायेंगे। कोटा, मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके में कांग्रेस की अच्छी पकड़ रही है। हालांकि पार्टी से अलग होने के बाद जोगी परिवार को मतदाताओं ने तवज्जो दी है। विधानसभा, लोकसभा में किसी तरह का बदलाव फिलहाल नहीं होना है तथापि अलग जिला पंचायत के गठन हो जाने पर स्थानीय लोगों को राजनीति में भागीदारी का अधिक मौका मिलेगा। 

मुख्यमंत्री बघेल ने केवल एक जिले की घोषणा अपने 15 अगस्त के उद्बोधन में की है। हालांकि सारंगढ़, चिरिमिरी-मनेन्द्रगढ़, प्रतापपुर-वाड्रफनगर, पत्थलगांव, अम्बागढ़ चौकी, पृथक भाटापारा जिला बनाने की मांग लगातार होती रही है। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस का रुख इन मांगों पर सकारात्मक भी रहा है। इन स्थानों में अब जिला बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है। मनेन्द्रगढ़-चिरिमिरी में इसे लेकर एक बैठक भी नागरिक मंच ने 16 अगस्त को रखी है। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर व माधव राव सप्रे की समृद्ध स्मृतियां 
घोषित नया जिला पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अमरकंटक की तलहटी पर बसा है। नर्मदा नदी, सोन नदी का उद्गम स्थल भी इसी की सीमा पर है। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्मृतियों को पेन्ड्रा जीता है। सन् 1918 में यहां के सेनेटोरियम में वे अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए काफी दिनों तक रुके। संयुक्त मध्यप्रदेश के प्रथम समाचार पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन माधवराव ‘सप्रे’ ने पेन्ड्रारोड से सन् 1900 में शुरू किया था। यह करीब तीन साल तक छपा। दोनों विभूतियों की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए इलाके के कई संस्थान और समितियों को उनका नाम दिया गया है। यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रदेश को पहला मुख्यमंत्री अजीत जोगी के रूप में इसी क्षेत्र से मिला। 

 

 

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