संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 अगस्त : हेलमेट का भंडारा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 अगस्त : हेलमेट का भंडारा...
Date : 18-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लोगों को मुफ्त में हेलमेट दे रही है। उसे ये हेलमेट अलग-अलग सामाजिक या कारोबारी संगठनों की तरफ से मिल रहे हैं, और वह कार्यक्रम करके इन्हें लोगों में बांट रही है। आज आम लोगों की एक मोटरसाइकिल भी औसतन 50 हजार रूपए की है। राजधानी एक महंगा और संपन्न शहर होने से यहां दसियों हजार मोटरसाइकिलें लाख रूपए से ऊपर की भी हैं। एक संपन्न शहर के संपन्न लोगों को उनकी खुद की हिफाजत के लिए जागरूक करने के लिए पुलिस और समाज मिलकर खर्च कर रहे हैं, जो कि एक बेतुकी मशक्कत है। कुछ सौ रूपए के ऐसे हेलमेट की मदद उन गरीबों के लिए तो ठीक है जो इसे खरीद नहीं सकते। लेकिन जिनके पास चलाने के लिए स्कूटर या मोटरसाइकिल है, उनके पास हेलमेट के लिए ही पैसे न होने का क्या तर्क है?जो लोग अपनी खुद की जिंदगी के लिए ऐसे लापरवाह हैं, उन्हें मुफ्त में हेलमेट देना पुलिस या संगठनों के पैसों की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है। इस किस्म से जुटाया गया पैसा या सामान बेबस और गरीब लोगों की मदद में ही इस्तेमाल करना चाहिए, बेशर्म और लापरवाह लोगों की मदद में नहीं।

दरअसल दुपहिया पर चलने वालों के लिए हेलमेट उनकी अपनी हिफाजत का सामान है। लोग महंगी गाडिय़ां खरीद लेते हैं, महंगा पेट्रोल खरीदते हैं, गाड़ी का बीमा भी करवाते हैं, लेकिन अपनी खोपड़ी को टूटने से बचाने के लिए हेलमेट नाम का बीमा करवाने की फिक्र अगर उन्हें नहीं है, तो उन्हें कोई तोहफा देने के बजाय उन पर जुर्माना लगाना चाहिए। कोई बिना हेलमेट दुपहिया चलाए तो उससे सड़क पर बाकी लोगों की जिंदगी खतरे में नहीं पड़ती। इसलिए जिन्हें मरने का शौक है, उन्हें मौत के पहले जुर्माने से भला क्यों परहेज होना चाहिए? 

दरअसल हिन्दुस्तान में कई बातों को समाजसेवा मान लिया जाता है। किसी परिवार के मरीज अस्पताल में रहें, और परिवार के दस हट्टे-कट्टे रिश्तेदार अस्पताल में खड़े रहें, लेकिन खून की जरूरत पडऩे पर बाहर का दानदाता ढूंढें, तो वह दान नहीं है, वह लोगों की गैरजिम्मेदारी को बढ़ाने की एक सामाजिक गैरजिम्मेदारी है। उस परिवार के लोगों को खुद खून देने की अक्ल देना खून देने से बेहतर है। इसी तरह शहरी सड़कों पर हर बरस कम से कम दर्जन-दो दर्जन बार तरह-तरह के धार्मिक मौकों पर भंडारे लगते हैं। किसी पूजापाठ के बाद आस्थावान धर्मालु लोग सड़क किनारे पंडाल लगाकर दोना-पत्तल का इंतजाम करके लोगों को तरह-तरह का खाना खिलाते हैं। वहां से निकलते हुए खाते-पीते घरों के लोग भी स्कूटर-मोटरसाइकिल रोक-रोककर जमकर खाने लगते हैं, और खिलाने वालों को लगता है कि वे गरीब और भूखों को खिला रहे हैं। शहरों में दुपहियों पर घूमने वाले मेहनतकश हो सकते हैं, गरीब हो सकते हैं, लेकिन भूखे तो बिल्कुल ही नहीं हो सकते। इसलिए खाते-पीते लोगों को खिलाने से न तो किसी धर्म का भला होता है, और न ही मुफ्तखोरी के आदी हो चुके हिन्दुस्तानियों का इससे कुछ भला होता है। 

रायपुर पुलिस को खुद यह लग सकता है कि वह हेलमेट बांटकर लोगों की जिंदगी बचाने का काम कर रही है। लेकिन यह एक बहुत ही गैरजरूरी, महंगा, और बेतुका काम है। जिन लोगों की ताकत एक हेलमेट के दाम से अधिक जुर्माना पटाने की है, उन्हें भला कोई सामान मुफ्त में क्यों दिया जाए? मुफ्त में देना ही है तो साइकिलों पर रात-बिरात चलने वालों की साइकिलों पर रिफलेक्टर टेप लगाने जैसा कोई सस्ता और जरूरी काम किया जाए, किसी बहुत ही गरीब और असहाय के हित में कोई काम किया जाए, शारीरिक अक्षम गरीबों के तिपहियों के लिए कुछ किया जाए। जिस तरह राह चलते गैरगरीबों पर सरकार या समाज का पैसा बर्बाद किया जा रहा है, वह अब तक लापरवाह और गैरजिम्मेदार चले आ रहे लोगों को मुफ्तखोर भी बना देने का काम है, जिसकी कोई तारीफ नहीं की जा सकती। इन लोगों पर मोटा जुर्माना लगाकर उन्हें यह एहसास कराने की जरूरत है कि एक हेलमेट पर खर्च, और उसका इस्तेमाल करके वे रोजाना के जुर्माने से बच सकते हैं, और सिर बचाने में उनकी दिलचस्पी हो तो बचाएं, वरना उनके सिर के बारे में उनका परिवार सोचे। पुलिस को तो कानून को लागू करने की फिक्र करनी चाहिए, हेलमेट का ऐसा भंडारा किसी का भी भला नहीं कर रहा है। 
-सुनील कुमार

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