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छत्तीसगढ़ : क्या निजी हाथों से मुक्त होगी शिवनाथ नदी?
छत्तीसगढ़ : क्या निजी हाथों से मुक्त होगी शिवनाथ नदी?
Date : 23-Aug-2019

आलोक प्रकाश पुतुल
अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार ने 1998 में 290 किलोमीटर लंबी इस नदी का एक हिस्सा अनुबंध के आधार पर 22 सालों के लिये एक निजी कंपनी रेडियस वॉटर को सौंप दिया था।
पिछले पखवाड़े कांग्रेस पार्टी के एक विधायक ने मुख्यमंत्री को शिवनाथ नदी का अनुबंध खत्म करने के लिये एक पत्र लिखा।
इसके बाद ये जानकारी सामने आई है कि शिवनाथ नदी के निजीकरण का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 2012 में ही इस नदी पर काबिज़ निजी कंपनी रेडियस वॉटर का कामकाज 2035 तक बढ़ा दिया है।
इसके पीछे तर्क ये दिया गया कि नदी से लगे हुए इलाके में चार और बड़े उद्योग लगने वाले हैं, जिसके लिये पानी की ज़रूरत होगी। इसी के अनुरुप रेडियस वॉटर को अपने काम को और विस्तार देने का निर्देश दिया गया।
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी ने बीबीसी से कहा, दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में जनहित में नदी के अनुबंध का करार किया था। हमारी सरकार ने अनुबंध को 15 साल और बढ़ा कर जनहित में ही निर्णय लिया है।
ये तब है, जब मार्च 2007 में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में ही विधानसभा की लोकलेखा समिति ने शिवनाथ नदी के निजीकरण को एक सप्ताह के भीतर रद्द करने और इसे लागू करने वाले अधिकारियों के खिलाफ एक सप्ताह के भीतर आपराधिक मामला दजऱ् करने की सिफारिश की थी।
रेडियस वॉटर का पक्ष
लेकिन 2018 तक सरकार में रही भारतीय जनता पार्टी ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
रेडियस वॉटर्स के निदेशक कैलाश सोनी का दावा है कि उनकी कंपनी को शिवनाथ नदी का कोई मालिकाना हक नहीं मिला है।
उन्होंने बीबीसी से कहा, मैं अब इस मामले में बोलने के लिये अधिकृत नहीं हूं। ये सारा कुछ मीडिया का किया धरा है। मैं इस व्यवसाय में इसलिये आया था कि इससे समाज सेवा होगी। लेकिन मुझे बदनाम किया गया।
शिवनाथ नदी पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में गठित लोकलेखा समिति के अध्यक्ष रवींद्र चौबे अब राज्य सरकार में विधि एवं विधायी कार्य, कृषि और जल संसाधन जैसे विभागों के मंत्री हैं।
उन्होंने बीबीसी से कहा, आप समझ सकते हैं कि मैं उस समय लोकलेखा समिति का अध्यक्ष था। उस रिपोर्ट को हमने 2007 में ही विधानसभा में रखा था। अब इस पर कोई भी टिप्पणी करना मेरे लिये ठीक नहीं है।
पानी के मोल नदी
असल में छत्तीसगढ़ के इस नदी को निजी हाथों में सौंपने का काम कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल में ही हुआ था। तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था और वह मध्यप्रदेश का हिस्सा था। साल 1996 में दुर्ग जिले के एक उद्योग मेसर्स एचईजी लिमिटेड ने राज्य सरकार की औद्योगिक केंद्र से अतिरिक्त पानी की मांग की थी।
औद्योगिक इलाकों में पानी की आपूर्ति का जिम्मा औद्योगिक केंद्र पर ही थी।
कंपनी की इस मांग के बाद राज्य सरकार के औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर ने संसाधनों का हवाला दे कर कंपनी को प्रस्ताव दिया कि दोनों मिल कर शिवनाथ नदी पर एनिकेट का निर्माण कर लेते हैं।
लोकलेखा समिति की रिपोर्ट बताती है कि इसके बाद औद्योगिक केंद्र विकास निगम के अफसरों ने साजिश करते हुये मेसर्स एचईजी लिमिटेड को इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया।
इसी दौरान रेडियस वॉटर्स लिमिटेड नामक निजी कंपनी से संबंधित कैलाश इंजीनीयरिंग कार्पोरेशन लिमिटेड ने राज्य सरकार को सूचना दी कि उन्होंने एनिकेट में स्वचालित तरीके से बंद होने और खुलने वाले टिल्टिंग गेट्स का पेटेंट करवाया है।
लोकलेखा समिति की रिपोर्ट
इसके बाद औद्योगिक केंद्र विकास निगम ने इसी टिल्टिंग गेट की अनिवार्यता का हवाला दे कर निविदा निकाली।
यानी औद्योगिक केंद्र विकास निगम ने तय कर दिया कि यह निविदा हर हालत में रेडियस वॉटर्स लिमिटेड को ही मिले।
इतना ही नहीं औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर ने शिवनाथ नदी पर बनाई गई अपनी पूरी अधोसंरचना और लगभग पाँच करोड़ रुपये की संपत्ति इसी निजी कंपनी को सौंप दी।
इस तरह छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी का 26 किलोमीटर का हिस्सा उद्योगों को पानी उपलब्ध कराने के नाम पर 1998 में 22 सालों के लिये इस निजी कंपनी को सौंप दिया गया।
इस पूरे मामले की जांच करने वाली विधानसभा की लोकलेखा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, जल प्रदाय योजना की परिसम्पत्तियां निजी कंपनी को लीज़ पर मात्र एक रुपये के टोकन मूल्य पर सौंपा जाना तो समिति के मत में ऐसा सोचा समझा शासन को सउद्देश्य अलाभकारी स्थिति में ढकेलने का कुटिलतापूर्वक किया गया षडय़ंत्र है, जिसका अन्य कोई उदाहरण प्रजातांत्रिक व्यवस्था में मिलना दुर्लभ ही होगा।
दस्तावेजों से एक के बाद एक षडयंत्रपूर्वक किए गए आपराधिक कृत्य समिति के ध्यान में आये, जिसके पूर्वोदाहरण संभवत: केवल आपराधिक जगत में ही मिल सकते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई शासकीय अधिकारी उद्योगपति के साथ इस प्रकार के षडय़ंत्रों की रचना कर सकता है, यह समिति की कल्पना से बाहर की बात है।
समझौते से उठे सवाल
बीबीसी के पास जो दस्तावेज़ उपलब्ध हैं, उसके अनुसार जिस इलाके से उद्योगों को प्रति माह 3.6 एमएलडी पानी की आपूर्ति औद्योगिक केंद्र कर रहा था, नदी का 22.7 किलोमीटर का हिस्सा मिलने वाले दिन से ही रेडियस वॉटर्स ने 4 एमएलडी पानी उपलब्ध कराने की गारंटी सरकार को दे दी।
औद्योगिक केंद्र विकास निगम को अधिकतम 2.4 एमएलडी पानी की ज़रूरत थी लेकिन कंपनी के साथ यह अनुबंध किया गया कि औद्योगिक केंद्र विकास निगम उद्योगों के लिये पानी ले या न ले, किसी भी स्थिति में रेडियस वाटर को वह 4 एमएलडी पानी की क़ीमत का भुगतान करेगा।
दिलचस्प ये है कि औद्योगिक केंद्र विकास निगम, उसी शिवनाथ नदी के मुरेठी केंद्र से प्रति क्यूबिक पानी के लिये सिंचाई विभाग को 1 रुपये का भुगतान कर रहा था।
लेकिन रेडियस वॉटर्स को प्रति क्यूबिक 12.60 रुपये की दर से भुगतान करने का फैसला लिया गया।
भुगतान की यह दर लगातार बढ़ती चली गई और इस समझौते को लेकर उठने वाले सवाल भी।
नदी घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय कहते हैं, अपना ही पानी सरकार अधिक कीमत दे कर निजी कंपनी से खरीदती रही, यह अपने आप में अनूठा उदाहरण है। इसके अलावा रेडियस वाटर ने नदी से पानी लेने पर प्रतिबंध लगा दिया। मछुआरों के मछलियां पकडऩे पर उनके जाल काट दिये गये। नदी से सिंचाई करने वाले किसानों के पंप कंपनी ने जब्त कर लिये। हालत ये हो गई कि आम लोगों के लिये नदी से पीने का पानी लेने तक पर रोक लगा दी गई।
शिवनाथ नदी को निजी कंपनी को सौंपे जाने का विरोध देश भर में हुआ। लेकिन कंपनी से करार के कारण सरकार इससे बचती रही।
साल 2000 में अलग राज्य बनने के बाद भी निजी कंपनी के ख़िलाफ़ विरोध में कमी नहीं आई। इसके बाद अप्रैल 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने रेडियस वॉटर्स के साथ अनुबंध खत्म करने की घोषणा की। उन्होंने संबंधित विभाग से कहा कि विधि विभाग और महाधिवक्ता से सलाह ले कर इस मामले में तत्काल कार्रवाई की जाये।लेकिन उसी साल राज्य में कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और अजीत जोगी की घोषणा धरी रह गई।
लोकलेखा समिति की धूल खाती सिफारिशें
सत्ता में आई रमन सिंह की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मामले की विधानसभा की लोकलेखा समिति से जांच कराने की घोषणा की और कांग्रेस पार्टी के विधायक रवींद्र चौबे की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया।
लोकलेखा समिति ने मामले की विस्तृत जांच की और 16 मार्च 2007 को यह रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई। राज्य की सर्वोच्च समिति द्वारा की गई इस जांच में कई गड़बडिय़ां पाई गईं।
लोक लेखा समिति ने विधानसभा में अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए सिफारिश की कि रेडियस वॉटर्स लिमिटेड के साथ औद्योगिक केंद्र विकास निगम के अनुबंध और लीज़-डीड को एक सप्ताह में निरस्त करते हुए समस्त परिसम्पत्तियां एवं जल प्रदाय योजना का आधिपत्य छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकाल निगम द्वारा वापस ले लिया जाए। इसके अलावा संबंधित सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध षड्यंत्रपूर्वक शासन को हानि पहुँचाने, शासकीय सम्पत्तियों को अविधिमान्य रूप से दस्तावेजों की कूटरचना करते हुए एवं हेराफेरी करके निजी संस्था को सौंपे जाने के आरोप में एक माह के भीतर एफआईआर दजऱ् करने के निर्देश दिये गये।
सिफारिश में कहा गया कि इस आपराधिक षडयंत्र में सहयोग करने और छलपूर्वक शासन को क्षति पहुँचाते हुए लाभ प्राप्त करने के आधार पर रेडियस वॉटर्स लिमिटेड के मुख्य पदाधिकारी के विरुद्ध भी अपराध दर्ज कराया जाए। लेकिन लोकलेखा समिति की रिपोर्ट फाइलों में धरी रह गई।
कांग्रेस पार्टी की सरकार
इस रिपोर्ट के कुछ सप्ताह बाद भाजपा सरकार ने विधि विभाग को एक नोट भेज कर पूछा कि अब जबकि विधानसभा में जांच रिपोर्ट पेश हुये एक सप्ताह से अधिक का समय गुजर चुका है, तब क्या समिति का निर्णय अब भी लागू होगा?
फाइलें सरकार के अलग-अलग विभागों में घूमती रही और 11 सालों में भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
उल्टे जिन अफसरों के खिलाफ इस मामले में कार्रवाई होनी थी, उन्हें लगातार पदोन्नति मिलती रही। हालत ये हुई कि इस मामले में लोकलेखा समिति द्वारा मुख्य रुप से जिम्मेवार ठहराये गये आईएएस अधिकारी गणेश शंकर मिश्रा को भाजपा सरकार ने सेवानिवृत्ति के बाद भी सहकारिता विभाग का आयुक्त बनाये रखा।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, अब जबकि राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, तब तो सरकार को लोकलेखा समिति की सिफारिश पर तुरंत अमल करना चाहिये। देश में पहली बार किसी नदी के निजीकरण की इस कलंक से छत्तीसगढ़ को मुक्त करना है तो तत्काल सरकार को निजी कंपनी के साथ अपने अनुबंध को ख़त्म कर देना चाहिये।

 

 

 

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