विचार / लेख

 छात्रय नहीं क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सिरमौर...
छात्रय नहीं क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सिरमौर...
Date : 23-Aug-2019

डॉ. राकेश गुप्ता

अगर यह मानें कि हमारे भीतर थोड़ा सा हिस्सा हर शख्स ने बनाया है जिससे हमारी जिन्दगी जुड़ी हुई है तो जन्मदिन का उत्सव केवल किसी की खुशियों में शामिल होना या शुभकामनाओं का प्रतीक नहीं है। यह उत्सव है हमारे भीतर मौजूद उस इंसान का। और अगर वह प्रदेश का मुख्यमंत्री हो तो यह प्रदेश के हर नागरिक का उत्सव है। कैस मौजूद होता है मुख्यमंत्री प्रदेश के हर नागरिक के भीतर वह प्रतीक है, उस राज्य की अस्मिता और पहचान का, उसकी सत्ता म ें जनता की भागीदारी का, कमजोर के लिए न्याय की आशा का, तो उसके जन्मदिन पर नागरिक उत्सव मनायेंगे अपनी अस्मिता, भागीदारी और आशाओं का।
आज जब देश में एक विशाल बहुमत की सरकार काबिज है और वह अपने बहुमत को संविधान के बरक्स खड़ा करके, पूरे राज्य तंत्र को अपने में केन्द्रित करने का प्रयास कर रही है, तो हमें जरूरत है ऐसी राजनीति की, जो इनके सामने डटकर खड़े हो सके, संविधान के मूल्यों के लिए। संविधान के आधारभूत ढांचे में सबसे महत्वपूर्ण है हमारी संघीय व्यवस्था। आखिर संविधान ने हमारे देश को ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ या राज्यों का संघ कहा है।
यह संघीय ढांचा आश्वासन देता है, हर नागरिक को कि भारत के इस विशाल जन समुद्र में वह अपनी पहचान और अस्मिता के साथ सुरक्षित है। यह संघीय ढांचा समन्वय बनाती है उसके रोजमर्रा की जिन्दगी और बड़े राष्ट्रीय सरोकारों के बीच, कि कहीं उसका वह निजी दायरे की अवहेलना न हो। आज जब एक राजनीतिक दल और उसका शीर्ष नेतृत्व खुद को बहुमत और देश समझने लगे हैं, तो वो केन्द्र और राज्य के बीच भी वही अंतर संबंध देख रहे हैं जो उनके राष्ट्रीय क्षेत्रीय के बीच है। इससे संघीय ढांचा और संवैधानिक मर्यादा को चोट पहुंचती है। ऐसे में लोगों की निगाहें टिकी हैं, ऐसे प्रभावशाली क्षेत्रीय जन-नेताओं पर, जो इसका प्रतिरोध कर सकें और यदि उनके बीच ऐसा कोई नेतृत्व मौजूद हो तो वे उस नेता में अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाओं और आशाकाओं को ढूंढते हैं।
दक्षिण और पूर्वी अंचलों के गैर हिन्दी भाषी राज्य हमेशा से इस संघीय व्यवस्था की अगवाई करते रहे हैं पर अब भूपेश बघेल और अमरिन्दर सिंह जैसे नेताओं ने भी इसमें अपने लिए बड़ी भूमिका चुनी है। ऐसे में भूपेश बघेल का जन्मदिन अवसर है। छत्तीसगढ़ के लोगों की अस्मिता और आशाओं की संघर्ष का उत्सव मनाने का। राज्य के गठन के 18 वर्ष बाद राज्य की भाषा त्यौहार और प्राकृतिक धरोहर को पहली बार उचित सम्मान मिले तो शायद लोग पहली बार राज्य के भीतर को महसूस कर रहे हैं और अगर यह नेतृत्व किसी राष्ट्रीय दल से आये तो यह लोकतंत्र संघीय ढांचा और संवैधानिक व्यवस्था के लिए और भी अच्छा है।
एक आदिवासी बहुल राज्य में यदि विश्व आदिवासी दिवस को राजकीय अवकाश की मान्यता मिले और वनोपज के समर्थन मूल्य और उन पर खरीदी की जाने वाली वनोपजों की संख्या में दुगुनी की बढ़ोतरी हो, ‘हाट बाजार क्लीनिक’ जैसी योजनाओं को लागू किया जाये और वन अधिकार को नीतिगत मूल्य बनाया जाए तो शायद संघीय व्यवस्था मजबूत हो रही है।
भूपेश बघेल के व्यक्तित्व में ठेठ ग्रामीण छत्तीसगढिय़ा रमता है जो छत्तीसगढ़ के तमाम रंगों के साथ उभरता है। देश पर सबसे ज्यादा ग्रामीण राज्यों में से एक और धान का कटोरा कहलाने वाले अंचल में यदि किसानों को ऋण माफी के साथ धान को 2500 रूपये का समर्थन मिले और ‘नरवा, गरवा, घुरवा और बारी’ जैसे ग्रामीणों सरोकारो ं को राजनीतिक सूत्र बनाया जाए तो निश्चय ही संघीय व्यवस्था मजबूत हो रही है। जब राजिम कुंभ का नाम छत्तीसगढ़ संस्कृति के अनुरूप ‘माघी पुन्नी मेला’ किया जाता है तो यह जीत है मूर्त को अमूर्त पर और लोगोंं की क्षेत्रीय भावनाओं की, जो उनके उत्सवों की उनके जीवन और प्रकृति से जोड़ते हैं।
भूपेश बघेल का जन्मदिन उत्सव है संघीय व्यवस्था का, छत्तीसगढ़ की जनता अपनी क्षेत्रीय अस्मिता पर अपने पुर्नअधिकार को दोहरात े हुए उसकी पुष्टि करेगी।

 

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