संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23  अगस्त : राजकीय तामझाम सामंती सोच, लोकतांत्रिक नहीं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 अगस्त : राजकीय तामझाम सामंती सोच, लोकतांत्रिक नहीं...
Date : 23-Aug-2019

बिहार में अभी वहां के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र गुजरे तो किसी भी राज्य की आम परंपरा के मुताबिक उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार नसीब हुआ। यह एक अलग बात है कि उनका नाम भ्रष्टाचार के मामलों में उलझा हुआ था, लेकिन मौत के बाद तो कानून के लंबे हाथ भी इंसान तक नहीं पहुंच सकते इसलिए परंपरा अधिक कायम रहती है, कानून धरे रह जाता है। इस मौके पर एक अटपटी बात यह हुई कि राजकीय सम्मान के एक हिस्से की तरह बंदूकों से सलामी दी जाती है, और सलामी की 22 रायफलों में से एक से भी धमाके की गोली नहीं चली। मुख्यमंत्री और राज्य के तमाम बड़े लोग वहां मौजूद थे, और उनकी मौजूदगी में पुलिस की रायफलों और कारतूसों का यह हाल सामने आया है। 

हमें इस बात पर जरा भी अफसोस नहीं है कि किसी को सलामी देने के लिए चलाई जाने वाली गैरजरूरी गोलियां काम न करें। अगर ये चलतीं, तो सिवाय प्रदूषण फैलाने के और कुछ नहीं करतीं। यह एक पूरे का पूरा सामंती सिलसिला है कि किसी को इस तरह की सलामी दी जाए। सरकार इस तरह किसी का सम्मान करने का फैसला करे, वह भी भला क्या सम्मान होगा? सम्मान तो किसी नेता का वह हो सकता है कि उसके अंतिम संस्कार में लोग खुद होकर पहुंचें। सरकार से सामंती सोच का खात्मा होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के राजभवन में जब एक सभागृह बनाया गया, और उसका नाम दरबार हॉल रखा गया, तब भी हमने उस भाषा के खिलाफ लिखा था कि लोकतंत्र में दरबार शब्द अपमानजनक है, और इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब म्युनिसिपल की बिल्डिंग महल की तरह बनाई गई, तब भी उस डिजाइन के खिलाफ हमने लिखा कि जिस स्थानीय संस्था की बुनियादी जिम्मेदारी जनसेवा की है, उसे खुद महल की तरह की इमारत में क्यों बैठना चाहिए? पिछले बरसों में कई बार हमने यह सलाह दी थी कि जिला कलेक्टरों का पदनाम बदलकर जिला जनसेवक रखना चाहिए जिससे उन्हें उनकी भूमिका और उनकी जिम्मेदारी का अहसास रहे। इस कुर्सी पर बैठे लोग अंग्रेजों के वक्त लगान कलेक्ट करते रहे होंगे, लेकिन आज तो वे कलेक्ट करने से अधिक जनता पर खर्च करने के लिए बिठाए गए हैं, लेकिन वह सामंती पदनाम उसी सोच के साथ अब तक चले आ रहा है। 

सत्ता को जिस किस्म का तामझाम जिंदा रहने तक, और गुजर जाने पर भी राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की शक्ल में सुहाता है, वह सारा तामझाम जनता के पैसों पर पूरा होता है। और तामझाम की लत ऐसी होती है कि एक गंजेड़ी के धुएं के दायरे में बैठे लोग भी गांजा पीने लग जाते हैं, लोग सत्ता के किसी भी पहलू के सामंती तामझाम को देखकर खुद भी उसी में घिर जाते हैं। यह सब कुछ उस गरीब जनता के पैसों पर होता है जो कि सरकारी रियायती राशन मिलने पर जिंदा रह पाती है। अभी पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राजधानी नवा रायपुर में बनने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री बंगलों की योजना दिखाने ले जाया गया, तो वे इस बात पर भड़क गए कि सीएम के लिए बंगला 16 एकड़ पर क्यों बन रहा है? उन्होंने इसे घटाकर 6 एकड़ करने कहा। हिन्दुस्तान में आमतौर पर सत्ता पर बैठे लोग किसी किफायत की बात नहीं सोचते जबकि सत्ता के अधिकतर सुख केवल सत्ताकाल के लिए रहते हैं, और बाद में उनमें से अधिकतर सुख छोडऩे पड़ते हैं। ऐसे में भी कुछ लोग सत्ता सुख को हर-हमेशा का मान बैठते हैं और अपने जाने के बाद सलामी की बंदूकों की हसरत भी लिए जाते हैं, फिर चाहे उन बंदूकों के कामयाब या नाकामयाब कारतूसों की आवाज या सन्नाटा सुनने के लिए वे न भी रहें। 

सत्ता पर बैठे लोगों को ऐसी सामंती सोच से बचना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है, और सबसे गरीब जनता का पेट काटकर जुटाई जाती है। सत्ता या विपक्ष, जहां कहीं नेता हों, या राजभवन में हों, या बड़ी अदालतों में हों, तमाम ताकतवर लोगों को अपनी हसरतों से ऊपर लोकतांत्रिक मूल्यों को रखना चाहिए, और जनता के पैसों के मामले में अधिक से अधिक किफायत बरतना चाहिए। यह बात सुनने में कम ही ताकतवर लोगों को अच्छी लगेगी, लेकिन हम हर कुछ महीनों में किसी न किसी मौके पर यह बात याद दिलाते रहते हैं कि यह गांधी का देश है जिन्होंने  किफायत की मिसाल पूरी दुनिया के सामने रखी थी, यह नेहरू का देश है जिन्होंने अपनी निजी संपत्ति देश को दान कर दी थी, यह लालबहादुर शास्त्री का देश है जो गरीबी में जिए, और गरीबी में ही मर गए। यह देश सरकारी सादगी से जीने वालों को याद रखता है, उन्हीं का सम्मान करता है। अब जगन्नाथ मिश्र गुजर चुके हैं, इसलिए उनके बारे में कोई कड़वी बात कहना हिन्दुस्तानी संस्कृति के खिलाफ माना जाएगा, लेकिन फिर भी हम तो यह बात कहेंगे ही कि राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सलामी की 22 बंदूकें मान लीजिए चल भी गई होतीं, तो क्या उन 22 धमाकों से जगन्नाथ मिश्र को भ्रष्टाचार में मिली कई साल की कैद की खबर दब गई होती? 
-सुनील कुमार

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