संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 अगस्त : नेताओं की संपन्नता और लोकतंत्र की विपन्नता...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 अगस्त : नेताओं की संपन्नता और लोकतंत्र की विपन्नता...
Date : 24-Aug-2019

नेताओं की संपन्नता और लोकतंत्र की विपन्नता...

अभी एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के बड़े नामी-गिरामी वकील पी.चिदंबरम को सीबीआई ने एक ऐसे मामले की जांच करते हुए गिरफ्तार किया है जिसमें उन पर और उनके बेटे पर यह तोहमत है कि चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते हुए एक विदेशी कंपनी के भारत में पूंजीनिवेश को सरकार के नियमों में ढील दिलवाने के एवज में बेटे की कंपनी ने करोड़ों का फायदा पाया था। कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध कह रही है, और देश की मौजूदा दिक्कतों की तरफ से जनता का ध्यान हटाने की हरकत भी। अब जो भी हकीकत हो, चिदंबरम को देश के सबसे बड़े कई वकीलों की पूरी फौज हासिल है, इसलिए यह तो कहा नहीं जा सकता कि वे इंसाफ पाने की कोशिश करने लायक नहीं हैं। और सरकार कोई भी हो, विपक्ष का यह आरोप तो गुफाकाल से अब तक चले आ रहा है कि सरकारी जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से की जा रही है। चाहे वह केन्द्र सरकार हो, या फिर कोई राज्य सरकार हो। 

फिलहाल हमारा सोचना यह है कि संपन्न नेताओं को तो देश की सबसे महंगी कानूनी सेवा हासिल करके अपने को बचाने का पूरा मौका हासिल रहता है, गरीब, अगर नेताओं के बीच ऐसा कोई शब्द होता हो तो, नेता कैसे ऐसी महंगी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं? यह बात इसलिए भी सोचनी होती है कि बिहार में लंबे समय से जेल में कैद लालू यादव से लेकर हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौटाला तक बहुत से ऐसे भ्रष्ट साबित नेता हैं जिन पर करोड़ों से लेकर सैकड़ों करोड़ तक की कमाई की तोहमत लगी हुई है, जुर्म साबित हो चुका है। अब जाहिर है कि जिस नेता के पास इतनी कमाई होगी, उसके वकील अदालतों में इंसाफ को इधर-उधर मोडऩे की तमाम तिकड़में कर सकते हैं, और अपने मुवक्किल को अधिक से अधिक समय तक बाहर रख सकते हैं, उनकी सजा को कम से कम करवाने के लिए पहाड़ हिला सकते हैं। अब यह लिखना अप्रासंगिक होगा कि नेताओं की ऐसी दौलत जांच एजेंसियों से लेकर, सुबूतों तक, गवाहों तक, और अगर बिकाऊ हों तो जजों तक को खरीद सकती है, और जो न बिके उसे निपटा भी सकती है। 

नेताओं की दौलत की एक दूसरी ताकत को भी समझने की जरूरत है जो लोकतंत्र को जूते मार-मारकर लहूलुहान करने की ताकत रखती है। दौलतमंद से चुनाव जीतना अगर नामुमकिन नहीं, तो तकरीबन नामुमकिन तो हो ही जाता है। जिस चुनाव में खर्च की सीमा से 25-50 गुना अधिक खर्च करना इस देश की आम चुनावी संस्कृति हो चुकी है, वहां पर अदने और आम उम्मीदवार भला कैसे बराबरी से मुकाबला कर सकते हैं? इसलिए एक बात बहुत जाहिर है कि राजनीतिक जीवन में, संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाले लोगों की अपनी खुद की संपन्नता की एक सीमा तय होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि जब अरबपति लोग संसद को और दसियों करोड़ वाले लोग विधानसभा को, और खरबपति लोग कर्नाटक विधानसभा को भरने लगते हैं, तो देश के आम गरीबों की बहुसंख्यक आबादी की जलती-सुलगती दिक्कतें न तो उनकी समझ में आ सकती हैं, और न ही उनकी प्राथमिकता हो सकती है। इसलिए संसद की बहस धीरे-धीरे खोखली होती चल रही है, और गैरगरीब होती चल रही है। और ठीक इसी के मुताबिक राज्यों की विधानसभाएं भी संसद को मिसाल मानकर चलती हैं, या नहीं चलती हैं। 

यह सिलसिला देश का कानून पता नहीं कभी शुरू कर पाएगा या नहीं क्योंकि संपत्ति इस देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है जिसे शायद किसी चुनाव कानून से छीना नहीं जा सकेगा, लेकिन पार्टियों पर यह रोक नहीं है कि वे एक सीमा से अधिक संपन्नता के लोगों को अपने उम्मीदवार न बनाए। यह बात कुछ लोगों को परले दर्जे की बेवकूफी की लग सकती है कि जब कुछ बड़ी पार्टियां अथाह दौलत जुटाने और फिर उसे खर्च करने को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना चुकी हैं, तब भला कौन सी पार्टी दौलतमंद नेताओं और उम्मीदवारों से परहेज कर सकती है। लेकिन हम एक विचार के रूप में इस बात को सामने रखना चाहते हैं कि देश की संसद और विधानसभाओं में संपन्नता की एक सीमा रहनी चाहिए क्योंकि इस देश की बहुसंख्यक आबादी की विपन्नता असीमित है। यह बात इसलिए भी जरूरी है कि हाल के बरसों में हमने जिस अंदाज में सांसदों और विधायकों की थोक में खरीदी देखी है, दौलत की वह ताकत भी खत्म होनी चाहिए। कुछ दशक पहले एक दलबदल कानून बना था जिसके तहत एक तिहाई से कम विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोडऩे पर दलबदल के दायरे में अपात्रता पाते थे, लेकिन अब इस कानून को महंगे जूतों तले इतना कुचल दिया गया है कि एक तिहाई का एक कहीं पड़ा हुआ है, तो तिहाई कहीं और। इसलिए राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, और चुनावों में अगर पैसों की ताकत पर काबू नहीं पाया जा सका, तो लोकतंत्र को किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकेगा। इसकी शुरुआत कोई ऐसी पार्टी कर सकती है जिसमें यह हौसला हो कि अपने दस करोड़ से अधिक दौलत वाले नेताओं से कहे कि या तो बाकी दौलत पार्टी या देश को दें, या फिर किसी चुनाव के टिकट न मांगें। 

-सुनील कुमार 

 

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