संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 अगस्त : किसी के मूल्यांकन के इस सदी के नए पैमाने
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 अगस्त : किसी के मूल्यांकन के इस सदी के नए पैमाने
Date : 25-Aug-2019

किसी के गुजरने पर उसके बारे में अच्छी बातें कहना तो ठीक है, लेकिन तारीफ के चक्कर में कई लोग कुछ मौकों पर लोगों की तारीफ करते-करते उनकी एक बुरी तस्वीर ही पेश कर डालते हैं। कल पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली गुजरे जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहुत करीबी थे, और भाजपा के हर शासनकाल में जो एक प्रमुख मंत्री रहे, संसद में विपक्ष के नेता भी रहे, भाजपा के बड़े पदाधिकारी भी रहे, सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील रहे, और कुल मिलाकर यह कि पिछले तीस बरस से वे लगातार खबरों में रहे। उनका सबसे महत्वपूर्ण जिम्मा केन्द्रीय वित्तमंत्री का था, और हमेशा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए कि किसी जाने वाले का मूल्यांकन उसके ऐसे सबसे महत्वपूर्ण काम को लेकर किया जाए। 

कल अरूण जेटली के गुजरने पर आई खबरों को देखें, तो एक खबर बड़े खुलासे से छपी है कि वे किस तरह दुनिया के कुछ सबसे महंगे ब्रांडों के शौकीन थे। दुनिया की सबसे महंगी घडिय़ां, सबसे महंगे पेन, और जाहिर है कि बाकी सामान भी उसी किस्म के सबसे महंगे। कुछ खबरों में इन सामानों के ब्रांड लिखे हुए थे कि वे किस तरह भारत के अमीरों की पसंद के सामानों से भी अधिक महंगे सामान खरीदते थे, उनसे पहले खरीदते थे। अरूण जेटली देश के सबसे महंगे वकीलों में से थे, और जाहिर है कि वे अपनी इस कानूनी कमाई से ही अरबपति थे, और सामानों को खरीदने का उनका अपना एक जायज जरिया था, और हक था। भारत का कोई भी कानून नेताओं को अपनी जायज कमाई अपने पर खर्च करने से नहीं रोकता, और वामपंथियों को छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों के भी ऐसे कोई नियम-कायदे नहीं है, ऐसी कोई संस्कृति नहीं है कि राजनीति में आए हुए लोग किफायत में जिएं। इसलिए जेटली के लिए अलग से कोई पैमाना नहीं बनाया जा सकता कि वे ऐसी खर्चीली जिंदगी के शौकीन क्यों थे। 

लेकिन मीडिया से यह उम्मीद तो की जानी चाहिए कि गरीबों से लबालब, और गरीबी से भी लबालब इस देश का वित्तमंत्री हिन्दुस्तान की आम जनता की जिंदगी को समझ सके, उसकी तकलीफदेह हकीकत से वाकिफ रहे। जेटली के बारे में जितनी बातें सामने आई हैं, वे बताती हैं कि वे पूरी जिंदगी दिल्ली में ही बसे रहे, और पार्टी या सरकार में उनकी कोई जिम्मेदारी ऐसी नहीं रही जिससे कि उनका वास्ता गरीबों से पड़ता रहा हो। ऐसे में उनके वित्तमंत्री के कार्यकाल को लेकर यह सोचना चाहिए था कि उनकी आर्थिक नीतियां, उनकी टैक्स नीतियां देश की नीचे की आधी आबादी का कितना भला करने वाली थीं? मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गज भी उनके बारे में ऐसी यादें लिख रहे हैं या बोल रहे हैं कि वे कितने अच्छे वक्ता थे, उन्हें संसद में उठने वाले मुद्दों की कितनी समझ थी, वे कितने काबिल वकील थे, उन्हें टैक्स मामलों की कितनी समझ थी, लेकिन जिसके कार्यकाल के सबसे बड़े महत्व का काम वित्तमंत्री का रहा हो, उसने गरीब और मध्यम वर्ग के लिए कौन सी नीतियां बनाईं, कौन से कार्यक्रम बनाए इसके बारे में श्रद्धांजलियां और संस्मरण दोनों ही मौन हैं। 

यह एक नया हिन्दुस्तान है जिसमें जमीनी हकीकत हाशिए पर है, और मीडिया को पसंद आने वाले मुद्दे, राजनीतिक रूप से और चुनाव में दुहे जा सकने वाले भावनात्मक मुद्दे, धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को करने, बढ़ाने, और स्थायी करने वाले मुद्दे इतने हावी हो गए हैं कि जमीनी मुद्दों को अब सोच में भी जगह मिलनी बंद हो गई है। लोग किसी का मूल्यांकन करते हुए उसकी करोड़ों की घडिय़ों और करोड़ों के पेन के ब्रांड गिना रहे हैं, लेकिन उसके कार्यकाल में गरीबों की हालत क्या हुई इस बारे में चर्चा नहीं कर रहे। यह हिन्दुस्तान की नई बौद्धिक हकीकत है कि किसी की निजी कामयाबी, किसी की निजी संपन्नता का जिक्र उसके सामाजिक, राजनीतिक, और सरकारी-संसदीय जिम्मेदारियों से अधिक महत्व रखने लगा है। किसी की बोलने की शैली उसकी बातों से अधिक महत्व रखने लगी है। अरूण जेटली अकेले ऐसे नहीं हैं जिनका मूल्यांकन ऐसे नए पैमानों पर हो रहा है, इन दिनों अधिकतर लोगों का मूल्यांकन ऐसे ही पैमानों पर होता है जो कि मौजूदा सरकार को सुहाए, ताकतवर पार्टियों और तबकों को सुहाए, और किसी अप्रिय चर्चा का खतरा रखने वाले पैमानों को पहले ही ताक पर धर दिया जाए। 
-सुनील कुमार

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