संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 अगस्त : स्वीडन दूर बहुत है लेकिन उससे कुछ सीख सकते हैं..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 अगस्त : स्वीडन दूर बहुत है लेकिन उससे कुछ सीख सकते हैं..
Date : 28-Aug-2019

स्वीडन की एक रिपोर्ट है कि वहां के नेताओं को सरकार की तरफ से न तो सरकारी कारें मिलतीं, न ही ड्राइवर मिलते, न ही उनके दफ्तर बहुत बड़े होते। हजार फीट से छोटे दफ्तर में वे काम करते हैं, और बस या ट्राम में सफर करते हैं। सिर्फ प्रधानमंत्री को एक कार मिलती है और वहां के नेताओं को आम नागरिकों की तरह ही मुकदमों का सामना करना पड़ता है उनके बचाव के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। स्वीडन प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 12वें नंबर पर है। इसका अंदाज लगाने के लिए यह भी समझ लेना ठीक है कि हिन्दुस्तान इस लिस्ट में 145वें नंबर है, बांग्लादेश से महज चार नंबर ऊपर। एक औसत हिन्दुस्तानी के मुकाबले एक स्वीडिश नागरिक की आय 25 गुना अधिक है। और ऐसे गरीब हिन्दुस्तान में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए नेता भी मानो दबी-कुचली जनता को पूरी तरह निचोड़कर अपने लिए ऐशोआराम जुटा लेना चाहते हैं। 

लेकिन स्वीडन अकेला ऐसा देश नहीं है जहां नेता सादगी से जीते हैं, और आम नागरिकों की तरह रहते हैं। हिन्दुस्तान के पड़ोस के भूटान को देखें तो प्रधानमंत्री साइकिल पर घूमते दिखते हैं, और योरप के बहुत से देशों में प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्री साइकिलों पर आते-जाते हैं। जिन अंग्रेजों की गुलामी से उबरकर हिन्दुस्तानियों ने आजादी पाई थी, उन अंग्रेज सांसदों और मंत्रियों को भी ऐसी शानोशौकत नहीं मिलती जैसी कि आज हिन्दुस्तानी नेता पाते हैं। नेता तो नेता हिन्दुस्तान में सत्ता पर बैठे हुए अफसर भी अधिक से अधिक सुविधा जुटा लेने को अपनी पहली जिम्मेदारी मानते हैं, और उसके बाद अगर वक्त बच जाए तो फिर सरकारी काम करते हैं। सरकार के तमाम नियम रहते हुए एक-एक अफसर के पास कई-कई सरकारी गाडिय़ां रहती हैं, और उनके बंगलों पर काफिला सा खड़ा दिखता है। नेता और अफसर एक-दूसरे की ऐसी निजी हसरतों की हिफाजत करते चलते हैं क्योंकि इसके लिए दोनों को एक-दूसरे के दस्तखतों की, इजाजत की, या कम से कम अनदेखी की जरूरत पड़ती है। लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार में गृहमंत्री के बंगले का एक बदनाम अदना सा अफसर टैक्सी का ऐसा इस्तेमाल करके उसका भुगतान कर रहा था जिसमें एक दिन में वह गाड़ी हजारों किलोमीटर चलना बताई गई थी। यह बात अपने आपमें जाहिर है कि जो लोग ऐसा बेजा इस्तेमाल करते हैं, वे बुनियादी रूप से भ्रष्ट भी रहते हैं, और जनता के पैसों का नुकसान तो होता ही है, सरकार की कमाई को घटाकर भी ये अपनी कमाई बढ़ाने की साजिश करते रहते हैं। 

पिछली रमन सरकार के वक्त जब नया रायपुर में बहुत बड़े-बड़े दफ्तर बनाए जा रहे थे, बहुत बड़े-बड़े बंगलों की योजना बनाई जा रही थी तब भी हमने इस बात को लिखा था कि इस सरकार के हाथ में यह अनोखा मौका है कि वह किफायत बरतकर हमेशा के लिए प्रदेश का खर्च घटाए। हमने यह सुझाव भी दिया था कि मंत्रालय जैसे बड़े मंत्रियों-अफसरों के दफ्तरों की जगह पर सबके कमरे छोटे बनाए जाएं, और हर मंजिल पर कई तरह के मीटिंग-कमरे बना दिए जाएं जिन्हें कि अधिक लोगों से मिलने के लिए खोला जा सके, इससे निर्माण की लागत भी घटेगी, और बाद में बिजली का भारी-भरकम खर्च भी घटेगा। लेकिन सरकार की सोच ऐसी रहती है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से पूरा करने के बजाय अपने घर-दफ्तर को बेहतर बनाने को प्रदेश का सम्मान मान लेती है, प्रदेश की जनता का सम्मान भी मान लेती है जिसका पेट काटकर यह शान-शौकत होती है। 

पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में जिस तरह सरकारी अफसरों ने कहीं सरकारी बंगले में स्वीमिंग पूल बनवाया, तो कहीं राजधानी के अपने दफ्तर में लाखों का झूला लगवा लिया, दस-दस, बीस-बीस लाख रूपए के सोफा लगवा लिए, और बंगलों पर करोड़ों रूपए अघोषित खर्च करवा लिया, उस पर एक बड़ी जांच होनी चाहिए, और उसकी भरपाई ऐसे नेताओं और अफसरों से होनी चाहिए। कहने के लिए तो यह ऐसा गरीब प्रदेश है जिसमें करीब आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और जो रियायती चावल की वजह से दो वक्त खा पाती है। दूसरी तरफ ऐसी गरीब आबादी के बीच सामंती और राजसी ऐशोआराम के टापू बनाकर नेता और अफसर रहते हैं, जो कि पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, पूरी तरह गैरकानूनी भी है। 
-सुनील कुमार

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