संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 अगस्त : देश की अदालतों का रूख लोकतंत्र के लिए खतरा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 अगस्त : देश की अदालतों का रूख लोकतंत्र के लिए खतरा...
Date : 29-Aug-2019

2018 में पुणे के भीमा कोरेगांव सालगिरह के मौके पर हुई हिंसा के बाद उसे भड़काने के आरोप में या उस सिलसिले में देश में कई जगहों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनमें छत्तीसगढ़ की एक वकील और एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज भी शामिल थीं। इस मामले में आंदोलनकारियों के पीछे नक्सलियों-माओवादियों के होने का आरोप भी लगाया गया था। गिरफ्तार लोगों में से एक वर्नन गोंजाल्वेज की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कल बाम्बे हाईकोर्ट के एक जज ने उनसे सवाल किया कि उन्होंने वॉर एंड पीस नाम का लियो ताल्सतॉय का उपन्यास घर पर क्यों रखा था जो कि किसी दूसरे देश के युद्ध से संबंधित है। यह विश्व विख्यात उपन्यास पूरी दुनिया में बड़े सम्मान से देखा जाता है, और साहित्य की दुनिया की कोई भी लाइब्रेरी इसके बिना पूरी नहीं हो सकती। इसके नाम को लेकर मुकदमा दर्ज करने वाली पुलिस की बेवकूफी तो एक बार अनदेखी की जा सकती है कि वह साहित्य की समझ नहीं रखती, लेकिन सरकारी वकील से तो कम से कम साक्षर होने की उम्मीद की जाती है। और इन सबसे ऊपर हाईकोर्ट के जज की भारी ताकतवर कुर्सी पर बैठने वाले से ऐसी समझ की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह ताल्सतॉय के इस महान उपन्यास को राज्य के खिलाफ बगावत के मुकदमे में जब्त आपत्तिजनक सामग्री मानकर आरोपी से यह पूछेगा कि उसने यह किताब क्यों रखी थी? इसका एक सीधा सा जवाब अदालत के बाहर की दुनिया दे सकती है कि यह आदमी पढ़ा-लिखा था, उसे साहित्य की समझ थी, और अपने दिमाग का इस्तेमाल वह सोचने-समझने के लिए करता था, इसलिए विश्व के महान साहित्य को पढऩे का यह खतरनाक जुर्म कर बैठा था। दुनिया के इतिहास का यह पहला मौका होगा कि एक उपन्यास को रखने का जुर्म लोकतंत्र में राजद्रोह मान लिया जाए, और जज भी पुलिस की समझ को आगे बढ़ाते हुए साहित्य को रखने के जुर्म की वजह पूछने लगे। 

हिन्दुस्तान में वक्त कुछ अधिक ही खराब आ गया है। कल की एक खबर है कि पटना हाईकोर्ट के एक जज ने अपने एक फैसले में उसी हाईकोर्ट के जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिखा है, और अभी खबर आ रही है कि उस जज से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने काम छीनकर कमरे में बिठा दिया है। एक दूसरी खबर तीन दिनों से हवा में थी, और देश की राजधानी दिल्ली के पत्रकार उसके लिए आंदोलन भी कर रहे थे कि देश में मीडिया की आजादी और मीडिया से जनता की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए बनाई गई प्रेस काऊंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन, सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज ने कश्मीर में केन्द्र सरकार द्वारा मीडिया पर लगाई गई पाबंदी की हिमायत की है। देश के पत्रकारों और विचारकों ने जब इसके खिलाफ जमकर आवाज उठाई, तो प्रेस काऊंसिल ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दखल-याचिका में अपना रूख बदला। इसी दौरान कल ही सुप्रीम कोर्ट में जब कश्मीर पर बहुत सी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई चल रही थी, तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की अपील पर अदालत ने उन्हें अपनी पार्टी के एक भूतपूर्व विधायक और प्रमुख नेता की सेहत पूछने के लिए कश्मीर जाने की इजाजत दी, लेकिन साथ-साथ कहा कि वे वहां और कोई काम नहीं करेंगे। हैरानी इस बात की है कि जिस सुप्रीम कोर्ट को आज सरकार से यह जवाब-तलब करना था कि वह कश्मीर में ऐसी अंतहीन पाबंदियां क्यों लगा रही है, कब तक लगाए रखेगी? लेकिन अदालत मानो अपनी ओर से ही सरकार की लगाई बंदिशों को न्यायोचित मानते हुए देश के एक बहुत ही जिम्मेदार वामपंथी नेता को एक व्यक्ति से मिलने के अलावा बाकी कुछ भी करने के लिए मना कर रही है, मानो वह कश्मीर के राजभवन का एक विभाग हो। 

देश भर में जगह-जगह बहुत सी अदालतों में साम्प्रदायिक बयान सामने आ रहे हैं, तमिलनाडू के एक हाईकोर्ट जज ने ईसाई शैक्षणिक संस्थाओं के खिलाफ भयानक साम्प्रदायिक बयान अदालत में या फैसले में दिया है, और कहीं पर हिन्दू धर्म को स्थापित करने वाला फैसला उत्तर-पूर्व का एक हाईकोर्ट जज दे रहा है, तो कहीं कुछ और। यह देश के जागरूक और दिमागदार लोगों को सोचना है कि क्या इस देश की ऊंची अदालतें सरकार या सरकारों के विभागों की तरह काम करेंगी? एक प्रदेश में हाईकोर्ट का हाल ऐसा था कि सरकार की मर्जी के खिलाफ कोई फैसला नहीं होता था, और लोग व्यंग्य में उसे शासकीय उच्च न्यायालय कहने लगे थे। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले ही यह लिखा था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अपने रिटायरमेंट के बाद सरकारी पुनर्वास पाने के लिए सत्ता को सुहाते फैसले न दें, इसके लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि जज जिस-जिस राज्य में काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें कोई वृद्धावस्था पुनर्वास न दिया जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो सत्ता की मेहरबानी पाने के लिए देश के बहुत से जज अपनी अदालतों को शासकीय उच्च न्यायालय, या शासकीय सर्वोच्च न्यायालय साबित करने के लायक संदेह खड़े करते रहेंगे। फिलहाल पिछले दो-चार दिनों के भीतर के ये तमाम अदालती रूख देश के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बता रहे हैं कि विश्व का एक महानतम उपन्यास रखना लोकतंत्र में राजद्रोह समझा जा रहा है, और जज भी वैसा ही मानते हुए सवाल कर रहा है!
-सुनील कुमार

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