विचार / लेख

 शिशु का आत्मालाप
शिशु का आत्मालाप
Date : 01-Sep-2019

बस 4 ही दिन बचे थे मुझे इस दुनिया में आने को। बड़ी डॉक्टर ने बता दिया था कि 26 अगस्त को, जब अपनी मां के पेट में आए मुझे पूरे 40 हफ्ते हो जाएंगे। उसी दिन वे ऑपरेशन करके मुझे इस दुनिया में लाकर मां की गोद में पहुंचा देंगे। पहली बार मां बनने की खुशी में मां का चेहरा चमक रहा था। मेरी खुशी का भी ठिकाना नहीं था कि मुझे भी अब अपने हाथ-पैर पसारने का मौका मिलेगा।
दादी ने अपने मन में सोच रखा था कि वे मुझे ‘अमन ’  कहकर पुकारेंगी। उधर नानी को भरोसा था कि मैं उनकी ‘तमन्ना’ बनकर इस दुनिया में आने वाली हूं।
सब जरूरी सामान लेकर मां 20 को ही अस्पताल आ गईं थीं। मेरे छोटे-छोटे नरम कपड़े; फूलों वाले तौलिए; कम्बल; और पता नहीं क्या -क्या। उन्हें लगता था कि कहीं मैं आने की उतावली न कर बैठूं।
बड़ी डॉक्टर सुबह आकर मां की जांच करतीं और बतातीं- सब ठीक है। यह सुनकर मैं मां के पेट में मुस्कुरा उठता। पर दो दिन बाद ही दोपहर को मुझे मां के पेट में सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी। बड़ी डॉक्टर तो सुबह की जांच करके अपने घर जा चुकी थी। मेरा दम घुट रहा था। मां के पेट से मेरा जल्दी से जल्दी बाहर आना जरूरी था। पर ऑपरेशन कौन करे। बड़ी डॉक्टर का घर दूर था। फोन नहीं। देश की सुरक्षा की बात थी। फोन सब बंद थे। डॉक्टर को लेने एंबुलेंस दौड़ी। उधर मां के पेट में मेरी सांसे तेजी से टूट रही थीं। डॉक्टर के आने तक मां के पेट में खामोशी छा गई थी। डॉक्टर आईं। उन्होंने पूरी तरह ख़ामोश हो गए मेरे शरीर को बाहर निकाला।
एक टीवी चैनल पर खबर आई कि स्थिति में सुधार हो रहा है। मेरा शरीर, दुनिया और जिंदगी की सुंदरता महसूस किए बिना मां के गर्भ से धरती के गर्भ में आ गया। मेरी डॉक्टर को जल्दी खबर करके बुलाया नहीं जा सका क्योंकि देश की सुरक्षा का प्रश्न था।
मुझे मालूम है कि मेरी मां, मेरी कब्र पर बिना लिखे भी यह अधूरा वाक्य हमेशा पढ़ेंगी कि इस धरती पर मेरा जीवित आना नहीं हो पाया क्योंकि।
( इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक पत्रकार के अनुभवों को आधार बनाकर)
(दविंदर कौर उप्पल ने इसे फेसबुक पर पोस्ट किया )

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