संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 सितंबर : नए ट्रैफिक नियमों के तहत  कुछ शुरुआती बलि जरूरी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 सितंबर : नए ट्रैफिक नियमों के तहत कुछ शुरुआती बलि जरूरी
Date : 01-Sep-2019

देश में आज से नया ट्रैफिक कानून लागू हो गया है जिसमें अब तक महज जुर्माना देकर बच जाने वाले मामले भी कैद दिलवा सकते हैं। कानून कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा कड़ा लग सकता है लेकिन हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोगों को दूसरों की जान की कीमत पर भी जिस तरह और जिस हद तक ट्रैफिक तोडऩा सुहाता है, उसके चलते यह बात साफ है कि कड़े कानूनों बिना लोगों में नर्म कानूनों की कोई इज्जत नहीं रहती है। सड़क पर नियम तोडऩे के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि तोडऩे वाले की जिंदगी खतरे में पड़े या न पड़े, सड़क पर के दूसरे लोगों की जिंदगी जरूर खतरे में पड़ जाती है। अभी बहुत से लोगों को यह अंदाज नहीं है कि आज से उनके सिर पर किस तरह का खतरा मंडरा रहा है अगर उन्होंने नए ट्रैफिक नियमों को तोड़ा। 

आज से अगर कोई व्यक्ति परिवार के किसी नाबालिग को अपना कोई वाहन देकर कहीं भेजते हैं, या अपनी जानकारी में जाने देते हैं, या किसी नाबालिग की चलाई गाड़ी में खुद बैठकर जाते हैं, तो इसका चालान अब सिर्फ जुर्माने से पूरा नहीं होगा। अगर यह स्थापित हो जाता है कि उनकी जानकारी और उनकी सहमति से, या उनकी मौजूदगी में कोई नाबालिग वाहन चला रहा था, तो वाहन के मालिक को भी 25 हजार रूपए तक जुर्माना हो सकता है, और तीन बरस तक की कैद भी हो सकती है। ऐसे नाबालिग बच्चों के पालकों को भी यही सजा हो सकती है अगर उनकी जानकारी में वाहन का ऐसा इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा ऐसे नाबालिग बच्चों को 25 वर्ष की उम्र तक लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। आज हमारे आसपास ऐसे नाबालिग बच्चे हजारों की गिनती में दिखते हैं, लेकिन आज अगर उनमें से किसी का भी मामला बनता है, तो वह मामला लोगों के डरावने सपनों से भी अधिक नुकसानदेह और खतरनाक साबित होगा। इस नए कानून के मुताबिक साबित हो जाने पर जज को कैद तो सुनाना ही होगा, जुर्माने के साथ-साथ। इसके अलावा भी कई दूसरे किस्म के नियम तोडऩे पर पहले के मुकाबले अधिक बड़े जुर्माने और अधिक कड़ी कैद रखी गई है, जो कि पूरी तरह जायज है। 

नए ट्रैफिक नियमों में एक बात को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है कि मोबाइल फोन के कैसे इस्तेमाल को फोन माना जाएगा, और कैसे इस्तेमाल को रास्ता दिखाने वाला उपकरण। आज देश भर में टैक्सी चलाने वाले तमाम लोग मोबाइल फोन पर रास्ता देखते हुए चलते हैं, और पते पर पहुंचते हैं। टैक्सी वालों से परे भी लोग फोन को नेविगेशनल उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं, और रास्ता ढूंढते हैं। ऐसे में फोन के कैसे-कैसे इस्तेमाल को नियम तोडऩा माना जाएगा, यह अभी साफ नहीं है। फोन पर बात करने के तरीके भी अब बदल गए हैं। लोग फोन को कान से लगाए बिना ब्लूटूथ से बात कर लेते हैं। बहुत से लोग फोन से ही ब्लूटूथ से संगीत भी सुनते रहते हैं। यह एक मामला ट्रैफिक पुलिस के लिए भी एक झंझट खड़ी कर सकता है क्योंकि एक ही मोबाइल फोन के कई तरह के उपयोग होते हैं, और उनमें से कुछ किसी नियम को नहीं तोड़ते हैं। 

फिलहाल कड़े नियमों को लागू करने के लिए अगर ट्रैफिक पुलिस का पर्याप्त इंतजाम नहीं होगा तो वैसे नियम किसी काम के नहीं होंगे। आज नर्म नियम भी लागू नहीं हो पा रहे हैं, कल कड़े नियमों का वही हाल होगा। कड़े नियमों में बस में क्षमता से अधिक मुसाफिर ले जाने पर ड्राइवर-कंडक्टर के लिए कैद का इंतजाम है, लेकिन बसों और ट्रकों का नियम तोडऩा परिवहन और ट्रैफिक अफसरों के साथ एक संगठित भ्रष्टाचार के तहत होता है, ऐसे में नियमों को लागू न करने के लिए हफ्ता या महीना बंधा होता है, कड़ा कानून बड़ा हफ्ता करवा देगा, लेकिन क्या उस पर कोई अमल भी हो पाएगा? हमारा ख्याल है कि बढ़ती हुई गाडिय़ों, बढ़ते हुए ट्रैफिक, और नई बनती सड़कों पर तेज होती रफ्तार को देखते हुए सरकार को एक तरकीब इस्तेमाल करनी चाहिए। जब गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन होता है, तो उसका ही कुछ हिस्सा ट्रैफिक पुलिस बढ़ाने के लिए सीधे ही एक मद में चले जाना चाहिए, और निजी गाडिय़ां जिस रफ्तार से बढ़ती हैं, उस रफ्तार से अपने आप ट्रैफिक पुलिस भी बढ़ जानी चाहिए, या निगरानी कैमरे और रफ्तार पकडऩे वाले राडार बढ़ जाने चाहिए। गाडिय़ां आज बढ़ जाएं और ट्रैफिक पुलिस कई बरस बाद बढ़े, तो वैसा इंतजाम बरसों पीछे घिसटता ही रहेगा। इससे पार पाने के लिए रजिस्ट्रेशन के दिन ही फीस का एक हिस्सा ट्रैफिक पुलिस के लिए चले जाना चाहिए।

सड़कों को बाप की जागीर मानकर चलने वाले लोगों पर नए बढ़े हुए जुर्मानों की तगड़ी मार शुरू होनी चाहिए, और ट्रैफिक पुलिस को रोज मीडिया के मार्फत यह उजागर भी करना चाहिए कि कितने लोगों पर कितना जुर्माना हुआ है। जुर्माने से परे ड्राइविंग लाइसेंस जब्त करने, गाड़ी जब्त करने, और जेल भेजने वाली धाराओं में अदालत भेजने का काम भी होना चाहिए। कुछ शुरुआती बलि से हो सकता है आगे चलकर हालात सुधरें, और सड़कों पर बेकसूर मौतें न हों। 
-सुनील कुमार

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