संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 सितंबर : लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष के बीच खेमेबाजी का नाम नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 सितंबर : लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष के बीच खेमेबाजी का नाम नहीं
Date : 03-Sep-2019

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भीतर बड़ी खींचतान चल रही है, मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, और प्रदेश के एक और बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच जैसे झगड़े की खबरें आ रही हैं, उनसे भाजपा बड़ी खुश है। अभी सोशल मीडिया पर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की साथ जाते एक तस्वीर पर किसी भाजपा नेता ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कमलनाथ को विसर्जन के लिए ले जाते हुए ज्योतिरादित्य।

अब तनातनी के बीच यह बात तो सचमुच मजेदार है लेकिन दोनों पार्टियों के बीच कटुता इतनी है कि कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि इस अपमानजनक टिप्पणी पर भाजपा नेता के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाएगी। अब एक ट्वीट में मजे की बात पर अगर एफआईआर हो गई है, तो यह नौबत लोकतंत्र के भीतर सार्वजनिक जीवन में जहर घुलने का एक सुबूत है। यह बात महज मध्यप्रदेश में नहीं है छत्तीसगढ़ में भी बात-बात पर कांगे्रस और भाजपा के लोग एक-दूसरे के खिलाफ रिपोर्ट लिखा रहे हैं, और चूंकि कांग्रेस सत्ता पर है, उसकी रिपोर्ट अधिक आसानी से लिख ली जा रही है। यह सिलसिला सार्वजनिक जीवन और राजनीति से दरियादिली और बड़प्पन, शिष्टाचार और हास्यबोध सबके खत्म हो जाने का है। और यह कुछ अधिक ही रफ्तार से हुआ है। लोग भ्रष्टाचार या चरित्रहनन के गंभीर आरोपों को लेकर तो एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत करते, रिपोर्ट लिखाते, मानहानि का मुकदमा करते आए हैं, लेकिन हँसी-मजाक भी अगर अदालतों तक पहुंच जाएगी, तो फिर लोग वकीलों के मार्फत ही एक-दूसरे से बात करेंगे।

देश की हवा में पिछले बरसों में लगातार घटियापन बढ़ा है और नफरत फैलाने की कोशिशें कामयाब हुई हैं। लोगों का बर्दाश्त खत्म हो गया है और अभिव्यक्ति की आजादी पर लोगों का भरोसा महज उस सीमा तक रह गया है कि वह उनकी अपनी अभिव्यक्ति हो। दूसरों के बोलने को लेकर लोगों का बर्दाश्त नहीं रह गया है। ऐसे में पश्चिम के कुछ विकसित लोकतंत्र दिखते हैं जहां पर पैनी से पैनी बात दिल को चीरते हुए उतार दी जाती है, लेकिन लोग उसका जवाब शब्दों से ही देते हैं, घटियापन से नहीं। आज हिंदुस्तान में संसद से लेकर कई विधानसभाओं तक जुबान का स्तर गिरते चले जा रहा है, सोच भी गिरते चली जा रही है, सदनों के बाहर तो बहस का स्तर और भी गिरते चले जा रहा है, और लोग खुलकर बेइंसाफी की बातें करने लगे हैं। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन के लोगों के बीच बातचीत का रिश्ता ही न बचे यह ठीक नहीं है।

लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष के बीच बंटी हुई खेमेबाजी का नाम नहीं होता, बल्कि इन दोनों के बीच निरंतर अंतरसंबंधों का नाम होता है जो कि जनहित के लिए जरूरी भी होते हैं। आज की यह बात जुबान पर कुछ काबू रखने की नसीहत देने के लिए है, और कुछ अपना बर्दाश्त बढ़ाने के लिए भी है। रास्ता इन दोनों के बीच ही निकलेगा, निकलना चाहिए, और यह रास्ता अदालत तक जाने वाला नहीं होना चाहिए।
-सुनील कुमार

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