विचार / लेख

बाबा जो संगीत के काशी-काबा थे
बाबा जो संगीत के काशी-काबा थे
Date : 06-Sep-2019

नीलेश द्विवेद

‘सिर्फ संगीत के बारे में ही मेरे टूटे-फूटे शब्दों में मैंने थोड़ा कुछ कहा। अब चलता हूं। रात हो गई है। यह सब जो कहा, वह मेरा चरित्र सुनाने के लिए नहीं। आप लोग देखिए संगीत साधना के लिए कितने कष्ट उठाना पड़ते हैं।’
ये अल्फाज़ किसके हैं किसके नहीं, यह जानने से पहले ‘संगीत’ ‘साधना’ और ‘कष्ट’ (संघर्ष) इन तीन लफ्जों के सफर पर चलते हैं। संगीत, वह तो शायद पैदाइशी ही उसके साथ नत्थी था। लेकिन साधना और कष्ट का सफर अभी शुरू होना था। उम्र यही कोई आठ साल। लेकिन इसके भी दो-तीन साल पहले जब स्कूल जाना शुरू ही किया था कि तभी किताब-कॉपियों के बजाय बीच रास्ते में पडऩे वाले शिव मंदिर के सितार की डोरियों ने अपनी तरफ खींच लिया। बस फिर क्या था। घर से यह कहकर निकलता कि पाठशाला जा रहा हूं। लेकिन रास्ते में शिव मंदिर में रम जाता। साधु-संन्यासियों के साथ संगीत की संगत करता और फिर स्कूल की छुट्टी होने पर दूसरे साथियों के साथ घर की राह पकड़ लेता।
अब के त्रिपुरा के एक छोटे से कस्बे शिवपुर में रहने वाले उस बच्चे की महीनों तक यही दिनचर्या रही। फिर एक रोज भांडा फूट गया। स्कूल के हेडमास्टर ने घर आकर मां (सुंदरी) से शिकायत कर दी, ‘आपका बेटा पाठशाला नहीं आता।’ ‘ऐसा कैसे हो सकता है। मैं तो उसे रोज स्कूल भेजती हूं,’ मां ने ज़वाब दिया। फिर बेटे के पिता (सदू खां) से बोलीं, ‘स्कूल नहीं जाता तो कहीं और जाता होगा। आप जाकर देखो।’
और इस तरह पिता अपने बेटे की खोज-खबर लेने निकल गए। रास्ते में देखा कि बेटा शिव मंदिर में साधुओं के साथ बैठा है। एक साधु सितार बजा रहा है और बेटा ठेका (बड़े भाई आफताब तबला बजाते थे, उन्हीं को सुनकर थोड़ा सीख लिया था) लगा रहा है। पिता खुद सितार बजाते थे। लिहाज़ा बेटे को दूर से देखकर चुपचाप घर लौट आए। बेटे की मां को बताया और समझाया भी, ‘शंकर के मंदिर में ठेका लगा रहा है। एक साधु के सितार के साथ। मारना-वारना मत उसे।’
लेकिन सख््त मिजाज मां के कान में उनके आखिऱी लफ्ज शायद पड़े ही नहीं थे। वह गोली से छूटती घर से निकली और शिव मंदिर से बेटे को पकडक़र ले आई। हाथ-पैर बांधकर एक कोने में पटक दिया। जमकर पीटा और तीन दिन तक खाना नहीं दिया। ‘कष्ट’ से उस बच्चे का शायद यह पहला परिचय था। फिर तीन दिन बाद सबसे बड़ी बहन (मधुमालती) मायके आई तो उसने छुड़ाया। अपने घर ले आई। मगर उस बच्चे का मन उचट गया था। वह घर लौटा मगर लौटने के लिए नहीं ‘साधना के सफर’ पर निकलने के लिए।
घर आकर देखा तो मां बीमार थी। लेकिन उस वक़्त उसके सिर पर कोई और धुन सवार थी इसलिए मां की बीमारी का उसे ख़्याल तक न आया। उसी रात जब वह सोई थी तो चुपचाप उसके पल्लू से बंधी संदूक की चाबी निकाली। धीरे से संदूक का ताला खोला। छोटी सी मु_ी में जितने रुपए (10-12 रुपए थे शायद) समा सके, लिए। कुछ कपड़े गठरी में बांधे और घर से निकल गया। रात को ही नज़दीक के मानकनगर स्टेशन पहुंच गया। वहां से बिना टिकट नारायणगंज होते हुए अगले दिन सियालदाह और वहां से पैदल कलकत्ता। हाथ में एक गठरी और सिर्फ आठ रुपए। शाम हो चुकी थी। भूख भी तेज लगी थी। गंगा किनारे उडिय़ा (ओडिशा के) लोगों की बनाई दाल-पूड़ी मिलती थी। दो पैसे की ली और भूख शांत की।
अब पानी पीना था। लेकिन गांव से आए उस बच्चे को नल-वल का कुछ पता नहीं था। इसलिए गंगा का खारा पानी पीकर ही गला तर किया और वहीं घाट पर गठरी को सिरहाना बनाकर सो गया। लेकिन जब सुबह उठा तो गठरी नदारद। उसमें रखे रुपए भी। बच्चे का धीरज टूट गया। रोने लगा। पास खड़े सिपाही को देखा तो उससे मदद मांगी। लेकिन उसने डांटकर भगा दिया। सो रोते-रोते पास ही दूसरे घाट में जा पहुंचा जहां कई साधु धूनी रमाए बैठे थे। वहीं एक साधु ने ढांढस बंधाया। गंगा में नहाने को कहा। नहाकर लौटा तो अपने पास से थोड़ी सी भस्म निकालकर दी। और कहा, ‘सीधे चला जा। पीछे मत देखना।’ और यकीन मानिए उसने फिर पीछे मुडक़र नहीं देखा। बस आगे, आगे और आगे ही बढ़ता गया।
गंगा के किनारे से कुछ आगे पहुंचा तो एक अन्न क्षेत्र (लंगर) मिल गया। यहां खाने-पीने का इंतज़ाम हो गया। पास ही केदारनाथ डॉक्टर का दवाखाना था। उस रोज उसी के चबूतरे पर सो गया। कुछ दिनों तक यही दिनचर्या चली। लंगर में खाना। पास के नल पानी और बाकी का वक्त दवाखाने के चबूतरे पर बीतता। एक दिन केदारनाथ डॉक्टर के हत्थे चढ़ गया। वे पूछ बैठे, ‘ये लडक़े कौन है तू?’ ‘मैं घर से भागकर आया हूं, साहब। गाना-बजाना सीखना है। आपका कोई परिचित उस्ताद हो तो मिलवा दीजिए न।’ उस बच्चे ने भोलेपन से जवाब दिया। लेकिन पलटकर उसे फिर झिडक़ी मिली, ‘काहे का गाना-बजाना? आवारा कहीं का। उस्ताद चाहिए। चल भाग यहां से। नहीं तो लगाऊं जूता।’
लेकिन वह भागा नहीं। भागने के लिए थोड़े ही घर से भागा था। सो डटा रहा। दवाखाने में कुछ बच्चे आते-जाते थे। डॉक्टर के पास। उनसे भी वह बार-बार एक ही विनती करता, ‘किसी उस्ताद से मिलवा दो। गाना-बजाना सीखना है।’ कोई सुनता, कोई नहीं सुनता। कोई दो-एक पैसा दे जाता। फिर एक दिन एक लडक़ा बोला, ‘मैं एक उस्ताद से सीखता हूं। तू कहे तो तुझे भी वहीं ले चलता हूं।’ उसकी तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई। झट तैयार हो गया और उस लडक़े के साथ हो लिया। लडक़ा पहले उसे अपने घर ले गया। वहां उसे अपने पिता वीरेश्वर बाबू से मिलवाया। पूरी कहानी बताई तो वे अवाक् रह गए। इतनी सी उम्र और संगीत के लिए ऐसा जुनून। वे खुद संगीत सीखते थे। इसलिए उस बच्चे के सुरों को परखा। जब वीरेश्वर बाबू पूरी तरह मुतमइन हो गए तो उसे अपने गुरु नूलो गोपाल (गोपालचंद्र भट्टाचार्य) से मिलवाने उनके घर की ले चले। 

नूलो गोपाल कलकत्ता के जाने-माने ध्रुपदिए थे। ख्याल भी गाते थे। पथुरिया घाट के राजा यतींद्र मोहन के दरबारी गायक थे। वहां उनके ठाट देख वह बच्चा पहले तो सहम गया। फिर संभला और अपनी पूरी कहानी बताई। संगीत के लिए उस बच्चे की छटपटाहट देख नूलो गोपाल भी पसीज गए। मगर अपनी तरफ से थोड़ा और ठोकने-बजाने की गरज से उन्होंने कहा, ‘12 साल तक साधना करनी पड़ेगी। कर पाएगा?’ ‘जन्म भर सीखूंगा’, उस बच्चे ने सपाट सा ज़वाब दिया। और यहां से अब ‘संगीत, साधना और संघर्ष’ तीनों उस बच्चे के साथ कदमताल करने लगे।
गुरुजी के घर पर उसकी दिनचर्या बदल गई थी। अब वह ज़्यादातर वक्त सुर साधता था। एक हाथ में तानपूरा, दूसरे से तबले पर ठेका। एक पैर से मात्रा गिनना और दूसरे से ताल देना। ऐसे ही गुरुजी ने 360 तरह के पलटे (अलंकार) सिखाए। चार-पांच साल ऐसे ही चला। धैर्य की परीक्षा में जब वह पास हो गया तो आगे की संगीत शिक्षा शुरू हुई। गुरु ने उसे तबला और मृदंग भी सिखाया। बच्चा अब 15 बरस का हो चुका था। इसी बीच एक रोज ढूंढते-ढूंढते उस लडक़े के बड़े भाई नूलो गोपाल के घर पहुंच गए। गुरुजी से विनती की और छोटे भाई को साथ ले गए। घरवाले चाहते थे कि वह वहीं रुक जाए। इसलिए आठ साल की लडक़ी से उसकी शादी करा दी। लेकिन उसका तो पहले ही संगीत से गठजोड़ हो चुका था।
इसलिए शादी की ही रात फिर भाग निकला और सीधा गुरुजी के घर जा पहुंचा। लेकिन तब तक गुरुजी उसका साथ छोड़ गए थे। प्लेग की बीमारी ने उन्हें दुनिया से दूर कर दिया था। बच्चा फिर बेसहारा था। पर तभी नूलो गोपाल के दामाद किरण बाबू ने उसे अमृतलाल दत्त (हाबू दत्त) से मिलवा दिया। ये स्वामी विवेकानंद के भाई लगते थे। कई वाद्य यंत्र बजाना जानते थे। उस लडक़े ने पूरी आपबीती उन्हें बताई। उन्हें लडक़े में तड़प दिखाई दी और उन्होंने उसे अपना शागिर्द बना लिया। इस तरह हाबू दत्त के साथ उसकी वाद्य यंत्रों की शिक्षा शुरू हुई। उन्हीं ने मिनर्वा थिएटर में नौकरी दिला दी। उससे खर्चा-पानी निकलने लगा। ऐसे ही दिन-ब-दिन, साल-दर-साल वक्त बीतता गया।
ईडन गार्डन के बैंड मास्टर लोबो बाबू और उनकी पत्नी से उसने वायलिन सीखा। फिर रामपुर के अहमद अली और उनके पिता आबिद अली से सरोद। संगीत सीखने के लिए वह लडक़ा रामपुर में आबिद अली के घर पर ही रहा। कच्चा मकान। मिट्टी की दीवारें और उस लडक़े के रहने का ठिकाना? पाखाने के पास का एक कमरा, जहां बदबू के कारण दो मिनट ठहरना भी मुश्किल। मगर उस लडक़े का जीवट ही था कि कई दिनों तक वहीं रहकर वह अपनी संगीत साधना करता रहा। बाद में अहमद अली की मां को उस पर तरस आया और उन्होंने उसे रहने के लिए कुछ ठीक सी जगह दी। लेकिन तभी मकान में काम लग गया। उसे ईंट-चूना तक ढोना पड़ा। बीमार पड़ गया मगर टूटा नहीं।
इसी तरह पांच-छह बरस बीते। यहां वह ज़्यादा कुछ नहीं सीख पाया था। इसलिए रामपुर के ही दूसरे उस्तादों के दरवाजे खटखटाए। पर कोई सिखाने को राजी न हुआ। एक बार तो हताशा ऐसी हुई कि जान देने पर आमादा हो गया। मगर मस्जिद के मौलवी ने रोक लिया। उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद उसे एक चिट्ठी दी और कहा, ‘नवाब हाजिद अली से मिल लो।’ वे खुद गायक थे। वीणा बजाते थे। उन्होंने उस लडक़े को सुना और उसके कायल हो गए। तुरंत अपने दरबारी कलाकार वजीर खां को बुला भेजा। उनके कहने पर वजीर खां ने उस लडक़े को अपना शागिर्द तो बना लिया लेकिन ढाई साल तक सिखाया कुछ नहीं। इस बीच वह रोज गुरुजी के घर जाता। वहां सेवा-टहल करता लेकिन वे शायद उसे भूल ही चुके थे।
हालांकि वज़ीर खां के शागिर्द की हैसियत मिलने से रामपुर के दूसरे उस्तादों ने उसे कुछ-कुछ सिखाना शुरू कर दिया था। सो तालीम आगे बढ़ती रही। इसी बीच उस लडक़े के घर से उस्ताद वज़ीर खां के पास ख़बर आई, ‘इसकी पत्नी ने फांसी लगाकर जान देने की कोशिश की है। इसे वापस भेज दें’ तब कहीं जाकर गुरुजी को उसकी याद आई। उन्होंने अपने बेटों-शागिर्दों को टेर दी, ‘अरे बाबू (बंगालियों को वे लोग बाबू कहते थे) कहां हैं? प्यारे मियां, मंझले साहब, छोटे साहब। बाबू कहां है?’ ‘ये तो दिन में 12 बजे तक यहीं रहता है हुज़ूर।’ उन सबने ज़वाब दिया। ‘अरे, तुम लोगों ने अभी तक इसे कुछ सिखाया या नहीं।’ उस्ताद ने पूछा तो उन्हें सीधा सा ज़वाब मिला, ‘आपका हुक्म नहीं था। इसलिए कुछ नहीं सिखाया।’
‘चलो कोई बात नहीं। अब आज से तालीम शुरू।’ उस्ताद का हुक्म हुआ। और इस तरह उसकी तालीम का अगला दौर शुरू हो गया। रात-रात भर सिर्फ उस्ताद, शागिर्द और संगीत। इनके सिवा कोई चौथा न होता। दिन में मौका मिलने पर उस्ताद के बेटे भी सिखा देते। सालों तक यही सिलसिला चलता रहा। फिर एक रोज उस्ताद का हुक्म हुआ, ‘देश में घूमो। शिक्षा, दीक्षा और परीक्षा- यह तीन बातें मानें ही विद्या है। गुणीजनों से सुनो और उन्हें सुनाओ।’ उस्ताद का हुक्म सिर-आंखों पर। लडक़े ने फिर कलकत्ते की राह पकड़ ली। भवानीपुर में संगीत सम्मेलन था। उसे भी बजाने का न्यौता मिला था। लेकिन बड़े-बड़े उस्तादों के बीच मौका मुश्किल से मिला। पर जब मिला तो लोग चार घंटे तक अपनी जगह से हिल नहीं पाए।
सुनने वालों ने पहली तान से पहचान लिया कि यह वज़ीर खां की तालीम है। इसी महफिल में एक श्यामलाल खत्री भी थे। मैहर (मध्य प्रदेश) के राजा बृजनाथ सिंह के परिचित। उन्होंने इस युवक में उस्तादों वाली झलक देख ली थी। वे चाहते थे कि यह युवक अब मैहर आकर शागिर्द तैयार करे। वह युवक पहले तो राज़ी नहीं हुआ। क्योंकि उस्ताद ने सिर्फ घूमने का हुक्म दिया था। सिखाने का नहीं। सो श्यामलाल के बताने पर राजा ने इसका भी बंदोबस्त कर दिया। वज़ीर खां के पास अपने दीवान को भेजकर उनसे उस युवक के लिए हुक्म निकलवा दिया। इधर श्यामलाल ने उसे यह भी समझाया कि राजा को खुद बहुत शौक है गाने-बजाने का। तो अंत में उसे राज़ी होना ही पड़ा और मैहर की राह पकड़ ली।
उस दूर्गा पूजा की सप्तमी का दिन था जब वह युवक मैहर के दरबार में राजा बृजनाथ सिंह के सामने बैठा था। चंद घंटों बाद ही राजा खुद उसका पहला शागिर्द बन चुका था लेकिन, वह उनसे कुछ लेने को राजी नहीं था। कहता था, ‘मैंने तय किया है कि विद्या दान कर के किसी से कुछ नहीं लूंगा। क्योंकि संगीत सीखने में मैंने बहुत कष्ट सहे हैं।’ राजा ने भी उसकी बात काटी नहीं। बस दरबार में एक ओहदा देकर 150 रुपए की तनख्वाह तय कर दी। लेकिन इस ओहदे और तनख्वाह से ज़्यादा शायद मैहर की आबो-हवा उस युवक को खूब रास आई थी। इसलिए वह हमेशा के लिए यहीं का होकर रह गया। वह भी कुछ इस तरह कि छह सितंबर 1972 को इसी मैहर की मिट्?टी से हमेशा के लिए जा मिला।
यह कोई और नहीं बल्कि अलाउद्दीन खां साहब हैं। ‘हैं’ इसलिए क्योंकि अलाउद्दीन खां बस एक शख्स का नाम नहीं है। बल्कि वह एक जीती-जागती परंपरा हैं। ऐसी परंपरा जो उनके बेटे-बेटियों- अन्नपूर्णा देवी, अली अकबर खान, पौत्र- आशीष खान तथा शागिर्दों- पंडित रविशंकर, पन्नालाल घोष, निखिल बनर्जी, सरन रानी और इनके भी शिष्यों से होती हुई आज तक लगातार बहती जा रही है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पितामह सरीखे उस्ताद अलाउद्दीन की जि़ंदगी के कई कहे-अनकहे किस्से कुछेक साल पहले आई ‘मेरी कथा’ नाम की किताब में दजऱ् हैं। यह वे किस्से हैं जो कई बेतकल्लुफ सी महफिलों में ख़ुद अलाउद्दीन खां साहब ने अपने बच्चों/शागिर्दों को सुनाए थे। बाद में इन्हीं किस्सों को जस का तस किताब की शक्ल में पाबंद कर दिया गया।
इन्हीं किस्सों में एक यूं भी है कि उस्ताद अलाउद्दीन खां सरोद, सितार, सुरबहार, वायलिन, जैसे 200 से ज्यादा भारतीय और पश्चिमी वाद्य यंत्र बजा लेते थे। कहते हैं जिस वाद्य यंत्र पर वे हाथ रख देते थे वहीं उनका गुलाम हो जाता था। ध्रुपद और ख़्याल भी गाते थे। इसके बावज़ूद दंभ का लेशमात्र भी उनको छू तक नहीं पाया।
पूरी जि़ंदगी वह बाबाओं की तरह रहे शायद इसलिए या फिर अपने शागिर्दों को बच्चों की तरह प्यार करते थे इस वज़ह से, लोग उन्हें ‘बाबा’ कहते थे। और जब उन्होंने शरीर छोड़ दिया तो उन्हें ‘संगीत का काशी-काबा’ मानने और कहने लगे। और यही वज़ह है कि आज यह कहना भी बहुत ज़्यादा न होगा कि अगर संगीत, साधना और संघर्ष का मिलाजुला कोई नाम होता तो वह उस्ताद अलाउद्दीन खां होता। (सत्याग्रह)

 

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