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लाख चाहने के बाद भी चीन हांगकांग में कोई सैन्य कार्रवाई क्यों नहीं कर सकता?
लाख चाहने के बाद भी चीन हांगकांग में कोई सैन्य कार्रवाई क्यों नहीं कर सकता?
Date : 06-Sep-2019

अभय शर्मा

बीते हफ्ते चीनी सेना की एक नई टुकड़ी बख्तरबंद वाहनों के साथ हांगकांग की सडक़ों पर दिखाई दी थी। इसके बाद से यहां सैन्य कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है।

नए प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध में और लोकतान्त्रिक सुधारों की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के बीच बीते हफ्ते चीनी सेना की एक नयी टुकड़ी हांगकांग पहुंची। इसे लेकर चीनी विदेश मंत्रालय का कहना था कि यह केवल उस नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है जिसके तहत वहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की टुकड़ी की अदला-बदली की जाती है। सरकारी मीडिया एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक इस टुकड़ी में शामिल सैनिकों को हांगकांग की स्थिति और वहां के कानूनों के बारे में बेहतर प्रशिक्षिण दिया गया है। लेकिन फिर भी यह आशंकाएं जताई जा रही हैं कि चीन अपनी सेना के जरिये हांगकांग के प्रदर्शनकारियों को डराना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है।
हांगकांग लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था। 1997 में ब्रिटेन ने स्वायत्तता की शर्त पर उसे चीन को सौंपा था। तब चीन ने ब्रिटेन से वादा किया था कि वह ‘एक देश-दो व्यवस्था’ के सिद्धांत के तहत काम करेगा और हांगकांग को अगले 50 सालों के लिए अपनी सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था बनाए रखने की पूरी आजादी होगी। ब्रिटेन के हांगकांग छोडऩे के समय चीन ने यह भी कहा था कि हांगकांग में उसकी सेना की उपस्थित काफी कम और प्रतीकात्मक ही रहेगी।
लेकिन 2017 में चीन की सरकार ने हांगकांग में पीएलए की उपस्थिति को काफी बढ़ा दिया। उसने एक विशेष कमांडो दल भी वहां भेज दिया और ब्रिटिश आर्मी की करीब एक दर्जन से ज्यादा बैरकों का इस्तेमाल भी चीनी सेना आधिकारिक रूप से करने लगी। एक अनुमान के मुताबिक इस समय हांगकांग की इन बैरकों में करीब पांच से दस हजार चीनी सैनिक रहते हैं। इन बैरकों में बख्तरबंद वाहनों और ट्रकों की भी अच्छी-खासी तादाद बताई जाती है। यानी साफ़ है कि अब हांगकांग में चीनी सेना की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं है। कई जानकारों का यह भी मानना है कि चीन ने यह कदम 2014 के ‘अंब्रेला मूवमेंट’ से सबक लेते हुए उठाया था जिसका सीधा मकसद भविष्य में इस तरह के प्रदर्शनों को रोकना और लोगों में डर बनाना था।
ब्रिटेन के हांगकांग छोड़ते वक्त यह भी तय हुआ था कि चीनी सेना हांगकांग में उपस्थित तो रहेगी, लेकिन कभी भी उसके आतंरिक मामलों में दखल नहीं देगी। चीन ने अभी तक इस नियम का पालन किया है। इससे संबंधित कानून में यह भी कहा गया है कि हांगकांग में सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने और आपदा की स्थिति से निपटने के लिए चीनी सेना की मदद ली जा सकती है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब हांगकांग की सरकार इसके लिए चीनी सरकार से अनुरोध करेगी।
कई जानकार कहते हैं कि अब इस कानून का कोई विशेष महत्व इसलिए नहीं रहा क्योंकि हांगकांग की सरकार अब पूरी तरह से चीन के प्रभाव में रहती है। ऐसे में चीन जब चाहेगा तब हांगकांग की सरकार उसे सैन्य कार्रवाई की अनुमति दे देगी। हांगकांग की यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के दिग्गज नेता मार्टिन ली अमेरिकी न्यूज़ एजेंसी एनपीआर से कहते हैं, ‘अगर, बीजिंग अपने सैनिकों को हांगकांग में तैनात करना चाहेगा तो उसे बहुत हल्के से हांगकांग की सरकार से यह कहना होगा कि आप हमारी सहायता के लिए हमसे अनुरोध करें। मैं यकीन से कहता हूँ, हांगकांग की सरकार की मुखिया कैरी लैम बीजिंग को न कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगी।’
बीते महीने कैरी लैम के एक सलाहकार ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि यदि विरोध प्रदर्शन हांगकांग को खतरे में डालते हैं और ज्यादा अशांति होती है तो पीएलए को बुलाने की संभावना है। कुछ जानकार भी जल्द चीनी सेना के मोर्चा संभालने की आशंका जाहिर करते हैं। ये लोग कहते हैं कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पहले प्रदर्शनकारियों की मांग केवल नए प्रत्यर्पण विधेयक को वापस लेने की थी जिस पर हांगकांग की सरकार सहमत हो चुकी है। लेकिन इसके बाद अब प्रदर्शनकारियों ने लोकतांत्रिक सुधारों की मांगे रख दी हैं जिनके लिए चीन की सरकार कभी तैयार नहीं होगी। ऐसे में आने वाले समय में प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भडक़ने की संभावना काफी ज्यादा है। इससे निपटने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन इस समय हांगकांग में सेना का इस्तेमाल करने से बचना चाहेगा। इनके मुताबिक चीन द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सेना तैनात किए जाने का मतलब साफ़ तौर से ‘एक देश, दो व्यवस्थाओं’ के सिद्धांत की हत्या करने जैसा होगा। और फिर इसके परिणाम उसे किसी एक नहीं बल्कि कई मोर्चों पर देखने को मिलेंगे।
एबीसी न्यूज के चीन मामलों के संवाददाता बिल बर्टल्स के मुताबिक हांगकांग में सैन्य कार्रवाई के बाद चीन की ताइबान को लेकर मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। 1949 में चीनी गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से ताइवान का शासन अलग संचालित होता रहा है, लेकिन चीन अभी भी इसे अपना क्षेत्र ही मानता है। वह काफी समय से ताइवान पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास कर रहा है। चीन वहां के लोगों को लुभाने के लिए उनके सामने हांगकांग की प्रगति को उदाहरण के तौर पेश करता है। वह उनसे कहता आ रहा है कि वह ताइवान का चीन में विलय कर उसे ‘एक देश, दो व्यवस्थाओं’ के सिद्धांत के तहत रखेगा।
जानकारों के मुताबिक अब अगर चीन हांगकांग के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करेगा तो ताइवान को लेकर उसकी दशकों पुरानी मुहीम को तगड़ा झटका लगेगा। अभी जो ताइवानी नागरिक उसके समर्थन में दिख रहे हैं फिर वे भी उससे दूर चले जाएंगे।
विदेश मामलों के जानकार इस बारे में एक और बात बताते हैं। इनके मुताबिक चीन द्वारा हांगकांग में सैन्य कार्रवाई किये जाने के बाद उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ सकता है। ये लोग कहते हैं कि हांगकांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा है इसलिए ब्रिटेन का इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है। वह चीन की इस हरकत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ दोनों से कार्रवाई करने को कह सकता है। इस वजह से ये दोनों चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगा सकते हैं।
इसके अलावा सेना के इस्तेमाल की वजह से चीन की उस विदेश नीति को भी झटका लगेगा, जो वह बीते एक दशक से दुनिया के सामने पेश करता आ रहा है। इसके तहत चीन का कहना है कि वह महाशक्ति बनने के बाद भी दुनिया भर में शांति से व्यापार और विकास को ही प्राथमिकता देगा। वह इस नीति पर चलते हुए ही ‘वन बेल्ट वन रोड’ (बीआरआई) परियोजना के तहत 60 से ज्यादा देशों में अपने व्यापार को बढ़ा रहा है। उसने इन देशों को बड़े कर्ज भी दिए हैं।
काफी समय से ऐसी खबरें भी आती रही हैं कि चीन इन देशों को भारी भरकम कर्ज के जाल में फंसाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेना चाहता है। जानकारों की मानें तो हांगकांग में सैन्य कार्रवाई करने के बाद बीआरआई के तहत आने देशों में चीन को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। ये देश तब उससे दूरियां बनाना शुरू कर सकते हैं। (सत्याग्रह)

 

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