विचार / लेख

असम को कहां ले जाकर छोड़ेंगे?
असम को कहां ले जाकर छोड़ेंगे?
Date : 07-Sep-2019

मनीष सिंह'

असम में गैंडे मिलते हैं, असम में बीहू डांस होता है, असम में ब्रम्हपुत्र बहती है, असम में चाय बागान हैं, ये तो सब जानते हैं। मगर ये नहीं जानते हैं कि भारत में पांच सौ से अधिक ट्राइब हैं, उसमें से आधे नार्थ ईस्ट में हैं, उसके आधे आसाम में हैं। अपनी-अपनी भाषा, इलाके, कल्चर भारत की विविधता का सबसे रंगीन गुलदस्ता कोई है तो आसाम है। हिमालय के फुटहिल में ये जनजातियां सदियों से, गुनगुनाते मौसम में खेती-पाती करते खुश थे।
फिर अंग्रेज आ गए, चाय बागान लाए, पीछे पीछे आए मजदूर। व्यापार, बिजनेस बढ़ा और लोग आए, चारोंओर से। आदिवासियों के बीच बसते गए।। जमीने कब्जाई, असमी चुप रहे।
फिर हुआ भारत विभाजन, ईस्ट बंगाल से बहुतेरे हिन्दू आए, बस गए। असमी चुप रहे। फिर हुआ पाकिस्तान विभाजन, फिर लाखों शरणार्थी आए। अब असमियों को गुस्सा आना शुरू हुआ। असम की असमी पहचान खतरे में थी। बंगाली भाषी प्रजाति उनके बगीचे में गाजर घास की तरह फैल रही थी, उनके रिसोर्स कब्जिया रही थी।
सेवेंटीज में आंदोलन शुरू हुआ, घुसपैठिए भगाने के लिए। छात्रों ने मोर्चा उठाया। जबरदस्त हड़ताल हुई। पब्लिक कफ्र्यू का कॉन्सेप्ट था। पुलिस कहती थी, बाहर घूमो, जनता कहती हम बंद रहेंगे।
1983 में भयानक दंगे हुए। हिन्दुओं ने मुसलमानों को मारा, मुसलमानों ने मुसलमानों को मारा, हिन्दुओं ने हिन्दुओं को मारा। असल धर्म कुछ भी हो किसी का, असमियों ने मिलकर गैर असमियों की खबर ली। होते-होते राजीव पहुंचे। छात्रों से समझौता किया। कहा कि घुसपैठियों की पहचान की जाएगी। कांग्रेस ने सत्ता से रिजाइन किया, और छात्रों को सरकार बनाने दी। शांति हो गई। प्रफुल्ल मोहंती यंगेस्ट सीएम हुए। ये 1985 की बात है।
मोहंती को सत्ता मिली, घुसपैठ भुला गए। मगर जिन्हें सत्ता नहीं मिली थी, वो कैसे भूलते। तब हिन्दू हित वाले दो सीट लेकर उदास बैठे थे। बंग्लादेशी शरणार्थी कहने से ही मुस्लिम मुस्लिम महकता है।  मुद्दा एकदम मुफीद था। हर खासोआम को इत्तला दी गई कि असम में 2 करोड़ से ऊपर मुसलमान शरणार्थी हैं। सब हिन्दुस्तान को खतरा हैं। सबको कान पकड़ कर हमई भगाएंगे । बरसों तक ये राग चला।
मोहंती की सत्ता वक्त के साथ चली गई। उनके साथी निराश थे सो थोक में भगवा पटका डाल लिया। सत्ता मिल गयी। घुसपैठ का मुद्दा फिर गरम हुआ। उधर कोर्ट ने भी तेजी दिखाई, और रजिस्टर बनवाना शुरू किया।
अब नए भारत में, चूहे निकालने के लिए घर गिराना तो जरुरी होता है। सो पूरा असम इस चक्की में पिसा। सबको अपने दादा-परदादा के कागज-पत्तर दिखाने पड़े। पहली बार में 1.9 करोड़ फेल हुए।  फिर 40 लाख, फिर अब 19 लाख बाकी है। एक राउंड और बचा है। शायद बारह-तेरह लाख बचेंगे। दो करोड़ का ढोल फट गया है।
दिक्कत ये है कि बचे 10-12 लाख में अधिकांश बंगाली भाषी हिंदू निकलेंगे। क्या इन हिन्दुओं को बंगाल की खाड़ी में डुबोया जाएगा। अखण्ड हिन्दू भारत के मिष्टी भाषी बंगाली हिंदू, काली और दुर्गा के उपासक, हकाल कर हिंदुस्तान से बाहर भेजे जाएंगे, हे राम।
डिटेंशन कैम्प बन रहे हैं, मगर गैस चेम्बर्स की किसी योजना की जानकारी नहीं है। संघ नेताओं की बयानबाजी सुनें, तो हिन्दू बक्शे जाएंगे। तो भैया, असमी फॉर आसाम वाले आंदोलन की तो तुरही बज  गई। मांगा गुड़, लाएं ढेला।  भगवा पटका पहने पूर्व गण परिषदी, अपने असमियों को क्या मुह दिखाएंगे।
उधर डिटेंशन सेंटर बनाकर दस बारह लाख लोगों कहां बंद करेंगे। उनको खिलाएगा कौन? ध्यान रखिए, ये दस-बारह लाख लोग अभी तो ट्रिब्यूनल के सामने पेश होंगे। उन्हें ट्रिब्यूनल अवैध अप्रवासी घोषित करेगा। फिर हाईकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट। एक आदमी एक केस है। अभी बरसों चलेगा। तब तक पटका धारी आपके टैक्स से इनको रोटी दाल खिलाएंगे। या फिर एक घर-एक रोटी का अभियान छेड़ेंगे।
इस तमाशे में असमियों की मांग अभी पूरी नहीं हुई। उनकी अगर सुनना मजबूरी बन गई, तो एक ही विकल्प बचेगा, असम का विभाजन। बंगाली बहुल और असमी बहुल दो प्रदेशों में। ऐसा निपटाया है कि हर कोई लूजर है। जात धर्म क्षेत्रीयता की लड़ाई में यही होता है। प्रदेश हो या देश टुकड़े होते हैं।
तो जनाब, आसाम में गैंडा है। सुना है एनआरसी का ये गैंडा देशभर में घुमाने का प्लान है। गाड़ी की आरसी, लाइसेंस, इंश्योरेंस,हेल्मेट खोज निकालें हो, तो दादे-परदादे का बर्थ सर्टिफिकेट भी लगे हाथ खोज लीजिए। कौन जाने, किसी को आपके भेस में रोहिंग्या दिख रहा हो।

 

 

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