संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 सितंबर : रूपकुंवर को सती करने के 30 बरस बाद भी राजस्थान में वही मर्दाना सोच जारी है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 सितंबर : रूपकुंवर को सती करने के 30 बरस बाद भी राजस्थान में वही मर्दाना सोच जारी है
Date : 07-Sep-2019

राजस्थान के सबसे चर्चित सती-प्रकरण, रूपकुंवर के मामले की सुनवाई 32 बरस तक चलते-चलते अब जयपुर की विशेष अदालत में आखिरी दौर में दिख रही है। अगले हफ्ते इस पर सुनवाई आगे बढ़ेगी, इस बीच उसे सती बनाने के लिए आरोपी ठहराए गए गिरफ्तार 45 लोगों में से 25 लोग रिहा हो गए हैं, 6 लोग मर गए हैं, और 6 लोग लापता हैं। बाकी लोगों का भी पता नहीं फैसले तक क्या होगा। कुल मिलाकर रूपकुंवर के सती होने के बाद डेढ़ पीढ़ी गुजर चुकी है, और इस अदालत के फैसले के बाद हो सकता है कि एक-डेढ़ पीढ़ी और लग जाए तब जाकर सुप्रीम कोर्ट से कोई आखिरी फैसला हो। लेकिन इस एक मामले पर लिखना आज का मकसद नहीं है, एक दूसरा मामला और आया है जिसकी वजह से इस पर लिखने की जरूरत लग रही है। अभी राजस्थान मानवाधिकार आयोग राज्य सरकार के लिए एक आदेश जारी किया है और कहा है कि वह लिव इन रिलेशनशिप पर रोक लगाए। आयोग का कहना है कि ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाएं रखैल जैसी होती हैं। 

रूपकुंवर को सती किए गए 30 बरस से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन राजस्थान में मर्दाना सोच का वही हाल है जो कि 30 बरस पहले था। पति के मर जाने के बाद पत्नी को साथ में जिंदा जला देना, और यह जाहिर करना कि उसने अपनी मर्जी से जान दी है, और फिर उस तथाकथित त्याग को महिमामंडित करना, यह पूरे देश में राजस्थान के ही बस का है। इसके साथ-साथ इस प्रदेश में जो मानवाधिकार आयोग बनाया गया है वह सुप्रीम कोर्ट के हाल ही के बरसों के कई फैसलों के खिलाफ जाकर बात कर रहा है, और साथ रहते गैरशादीशुदा जोड़ों में से लड़की या औरत को रखैल जैसी गाली देना किसी भी मानवाधिकार आयोग के लिए तो शर्मनाक बात है ही, किसी भी सभ्य समाज में भी ऐसी भाषा मंजूर नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने साथ रहने वाले जोड़ों के हक पूरी तरह से कानूनी माने हैं, और इसके लिए शादी की बंदिश पूरी तरह गैरजरूरी करार दी है। देश का कोई भी कानून बालिग लोगों को साथ रहने से नहीं रोकता, और देश के महानगरों में यह एक आम बात है। ऐसे में इक्कीसवीं सदी का कोई मानवाधिकार आयोग ऐसी ओछी और घटिया बात न सिर्फ कहे, बल्कि सरकार को ऐसा आदेश जारी करे, यह बात अपने आपमें इस आयोग को भंग कर देने के लिए पर्याप्त आधार है। सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इसका संज्ञान लेना चाहिए, और इस आयोग को तुरंत भंग करना चाहिए, वैसे तो राजस्थान की कांग्रेस सरकार खुद भी यह काम कर सकती है, फिर चाहे इसके लिए जो वैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़े। 

हिन्दुस्तान के बहुत से हिस्से में महिला के लिए ऐसी ही हिकारत की जुबान इस्तेमाल होती है। रखैल शब्द की बुनियाद रखने से जुड़ी हुई है। जिस तरह कोई मर्द अपने पास किसी सामान को रख सकता है, उसी तरह औरत-मर्द के रिश्तों में यह मान लिया जाता है कि मर्द ने औरत को रख लिया है। यह समझने की जरूरत है कि इस भाषा में रखैला जैसा कोई शब्द क्यों नहीं है जबकि कई मामलों में कोई महिला अधिक संपन्न हो सकती है, और वह अपने साथी मर्द का खर्च उठा सकती है। ऐसा होने पर भी गाली जैसा शब्द महज औरत के लिए ही गढ़ा जाता है, और गढ़े जाने के सैकड़ों बरस बाद वह औरत के खिलाफ 21वीं सदी में भी प्रचलित रहता है। 

राजस्थान मानवाधिकार आयोग को देश भर में खूब धिक्कारा जाना चाहिए, और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील करनी चाहिए कि वह इस आयोग को बर्खास्त करे। 
-सुनील कुमार

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